कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
अनागत वक्ताके कृत्य
सबको निकम्मा समझते हैं । इसी विषयपर कबीर साहिबने एक शब्द लिखा है —
पण्डित कौन कोबधि तोहि लागे । तू राम न जपै अभागे ॥
वेद पुराण पढ़े क्या होए क्या खच्चर सिरमारा ।
रामनामकी सुद्ध न जानी बूडचो सब परिवारा ॥
वेद पुराण सुनैका यह मत सब घट चीन्हों रामा ।
सब घट ब्रह्म एककर जाना सुफल होय तेरो कामा ॥
नारद कहै व्यास मुख भाषै शुकदेव पूछो जाई ।
कहैं कबीर एक राम जाने बिन बूडी सब ब्रह्मणाई ॥
ए पण्डित ! यह तुझे क्या कुबुद्धि लग गई कि, जिससे ए अभागे ! तू राम राम नहीं कहता । तूने इतने वेदशास्त्र पढ़े हैं, क्या उनसे तुमने कुछ भी सार ग्रहण नहीं किया ? यौही रट रट कर शिर खालीकर डाला । तूने राम नामका रहस्य न समझा । सारा कुटुम्ब पंडित होकर पढ़ पढकर ही संसार सागरमें डूब गया वेदपुराण सुननेमें क्या है जिस रामकी रामायण सुनते हो उसको सबमें व्यापक देखो, सबमें एकही राम देखो, भेद भाव मत मानो, सब काम सफल हो जायेंगे । यदि मेरी बातमें सन्देह हो तो नारद और व्याससे पूछलो । वे भी यही बतायेंगे भलेही शुकदेवसे पूछलो । कबीर तो यही कहते हैं कि, बिनारामके जाने सब पंडिताई डूब गई क्योंकि, सब ब्राह्मणपना उसीमें है ।
अध्याय १२ ।
विश्वास ।
चित्त जिधरको फिरता है उसको बुद्धि मान लेती है । वह बात मिथ्या हो, अथवा सत्य हो सत्यके रूपसे दिखाई देती है । बुद्धि और विश्वास दोनों मिथ्या हैं विश्वास, मिथ्या और निष्कारणको कारणवाला बना लेता है । सारे विश्वास अविद्यामें सत्य हो रहे हैं । पर लुढ़नी विद्यामेंही सबकी यथार्थ अवस्था जानी जाती है । जिस बात अथवा जिस भस्मपर विश्वास होगया हो वही सच्चा तथा ठीक माना जाता है । यदि विचार करके देखा जाय तो यही स्वर्ग नरक दोनोंका कारण तथा बन्ध मोक्षका पिता है ॥
विश्वासकी झलक ।
वैरागी लोग विष्णु तथा रामकृष्णका पूजन करते और आठ प्रकारकी मूर्तिपूजाको सत्य जानते हैं और इस मूर्तिपूजासे अपनी कामना पूर्ण करते
हैं। मूर्तिको पूजकर उस मूर्तिवालेसे मिलकर कृतकार्य होते हैं। कोई रामकृष्णको अपना ईश्वर कोई अपना पुत्र करके पूजता है कारण यह कि, पुत्रसे विशेष प्रेम होता है। प्रेम बढ़ानेके निमित्त कोई छोटा पुत्र अथवा युवक करके मान लेता है। जैसा मानता है वैसाही देखता है। एक गोकुली गोसाईं जो सांसारिक था पति पत्नी दोनों कृष्णचन्द्रको अपना पुत्र करके पूजते थे उस साधुके छः पुत्र और छः बहूवें थीं। एक चुड़हारी आई उसकी छः बहूओंने चूड़ी पहनी। सब बहूवें चूड़ी पहन चुकीं तब उनकी सास चूड़ीका मूल्य देने लगी। जब उनकी सास छः स्त्रियोंके चुड़ियोंका मूल्य देने लगी तब चुड़िहारीने कहा कि, मैंने सात स्त्रियोंको चुड़ियाँ पहनाई हैं। तब सासने कहा कि, मेरी तो छः बहूवें हैं तूने सातवीं किस स्त्रीको चुड़ियाँ पहनाईं? दोनोंमें झगड़ा हुआ। उस चुड़िहारीने दाम नहीं लिया कहा कि, मैं सातका मूल्य लूँगी। वह चुड़िहारी खाली हाथ अपने घर चली गई। जब रातको वह महा अधिकारी गोसाईं सोया तब राधिकाजी स्वप्नमें आकर उनके सामने खड़ी हुई कहने लगी कि, बाबा ! तुम चुड़िहारीको दाम क्यों नहीं चुका देते क्या मैं तुम्हारी बहू नहीं हूँ ? तुम्हारी छः बहूओंके साथ सातवीं मैंने भी चूड़ी पहनी थी। मैं भी तुम्हारी बहू हूँ। तुम चुड़िहारीको मूल्य देदो। जब राधाजीने ऐसा कहा तो प्रातः काल होतेही इस साधुने उस चुड़िहारीको बुलाकर सातों बहूओंकी चुड़ियोंका मूल्य दे दिया। कारण यह कि, वह गोसाईं कृष्णको अपना पुत्र मानकर अपनेको पतिपत्नी नन्द यशोदा जानते थे।
एक नवाब वृन्दावनमें गए। वहाँ जो उन्होंने कृष्णके गुण तथा उनका विवरण सुना तो वे उनपर आसक्त हो गए। अपने राज्यको छोड़कर योगी हो गए। उसकी सैन्य तथा नौकर चाकर रोते पीटते घरको पलट गए। वह नवाब एक साधुका शिष्य होकर वृन्दावनमें रहने लगा। गुरुने इस नवाबका नाम मीरमाधव रक्खा। वह मीरमाधव जो भोजन दे खाले इधर उधर पड़ा रहे। एक दिवस मीरमाधव भूखे ही ठाकुर मन्दिरके पिछवाड़े पड़े थे। जब अर्धनिशा हुई तब कृष्णचन्द्र थालीमें भोजन और लोटेमें जल लेकर मीरमाधवके सामने गए। भोजन तथा जल रखकर कहा कि, खाओ। तब कृष्णचन्द्र तो चले गए। मीरमाधवने भोजन किया तथा जल पिया। जब प्रातःकाल हुआ तब ठाकुरका पूजारी उठा, बर्तन भाँडे सभाँलने लगा। पर थाली और लोटा न पाया, उसे ढूंढने लगा। जब ठाकुरके मन्दिरके पीछे गया तब मीरमाधवके सामने सउ