कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर क्रोध करना ब्रह्माका गायत्रीको झूठी साक्षी देनेको कहना और गायत्रीका ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना सावित्री उत्पत्तिकी कथा
जोई ज्ञानी होय हमारा । काम क्रोध तें होय निनारा ॥
तूस्ना लोभहि देइ बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥
उनको ध्वान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥
नाम ध्यान हंसा घर जाई । कहा देत अस करों बडाई ॥
उनपे जम का परै न छाहीं । तास हंसा लोकहि जाई ॥
निरञ्जन वचन ।
कहैं निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हा जान तुम्हारी बानी ॥
जुरत महात्म सबै बताऊँ । नाम तुम्हारे पन्थ चलाऊँ ॥
तुम तौ एक पन्थ परकासा । हम बारह पन्थ काल जग फांसा ॥
जग के जीव सबै भरमाऊँ । ज्ञानवंत को करम दिढाऊँ ॥
मार जीव को करे अहारा । कथै ज्ञान तुम्हरी टकसारा ॥
करे काम बिस सब भाई । चार वरन ले एक मिलाई ॥
कुलको त्याग होय सो न्यारा । चार वरनको एक विचारा ॥
ज्ञान हमार रहै तन छाई । ते सब जीव काल ले खाई ॥
वे तो तुमरी करिहैं हांसी । ते जीवनपर हमारी फांसी ॥
फिर फिर आवै जमकी खानी । वे सब सरन हमारी ज्ञानी ॥
कैसे पहुँचै पुरुषकी सरनी । ज्ञान संधि हमहू दे बरनी ॥
ज्ञानी वचन
कहे ज्ञानी सुन कैल विचारा । हंस हमार होय नहिं न्यारा ॥
निसवासर रहै लौ लीना । शब्द विचार होय नहिं भीना ॥
हंस हमार सब्द अधिकारा । पुरुष परताप को करे सम्हारा ॥
नाम जपै अरु सुर्त लगाई । मिले कर्म लागे नहिं काई ॥
शब्द मानि होय सब्द सख्या । निश्चे हंसा होय अनूपा ॥
उनको नाम भक्ति की आसा । ताते निरख चलैं विस्वासा ॥
निरञ्जन वचन ।
ज्ञानी मोर अपरबल ज्ञाना । वेद किताब भरम हम माना ॥
इनको माने सब संसारा । कलि में गंगा मुकती द्वारा ॥
देहीं दान जो उतरे पारा । ऐसे सुमृति कहैं विचारा ॥
यहि विधि जग जीव भुलाहीं । जरा मरन सब बंध बंधाहीं ।
सूतक पातक वेद विचारा । पूछ वेदसे करहि सँहारा ॥
एकादशी मुक्तिकी भाई । जोग जग्य करवे अधिकाई ॥
ज्ञानी बचन ।
सुनहु काल ज्ञानकी संधी । छोरों जीव सकलकी फंदी ॥
जब निज बीरा हंसा पावै । जोग बरत तप सबै नसावै ॥
वेद किताबका छोड आसा । हंसा करे सब्द विस्वासा ॥
ताके निकट काल नहि आवे । निज बीरा जो सुरत लगावें ॥
बीरा पाय होय जमपारा । शब्द सन्धि परखै टकसारा ॥
जोग बरत तपहू है छारा । अद्भुत नाम सदा रखबारा ॥
जेत हंस सरन हम आई । भक्ति करे तो मिटै धुआई ॥
निरंजन बचन ।
अब तुम ज्ञानी भली सुनाई । मेरो उरझो सुरझौ नहि जाई ॥
जो जीवनको भगति दिठैही । शब्द भेद तुमताहि लखैहो ॥
पावै शब्द होय अभिमानी । कैसे लोकै जैहै प्रानी ॥
सब्द पाय नहि करै विचारा । कैसे पहुँचे लोक तुम्हारा ॥
सब्द पाय कर करम जगावै । कैसे ज्ञानी निज घर पावै ॥
सब्द पाय कर चले न राहा । ज्ञानी कहाँ मुक्तिकी थाहा ॥
ज्ञानी बचन ।
तब ज्ञानी बाल मुख बानी । सुनियो काल निरंजन आनी ॥
हंसा भगति जो करे हमारी । राखो सदा सब्द निज धारी ॥
काम क्रोध अहंकार बिकारा । इनका तजिहैं हंस हमारा ॥
सब्द हमारा छोडे फंदा । पहुँचे लोक मिटै जमदन्दा ॥
बीरा नाम पुरुष का सारा । निरमल हंस होय उजियारा ॥
आवागवन बहुरि नहि होई । काल फांस तज न्यारा सोई ॥
पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । अरें काल तोको तज डारा ॥
निरंजन बचत ।
निरंजन बोले गरब सो भाई । मोरे फंद तोर को जाई ॥
करम जंजीर बधा संसारा । जोई हम जग जाल पसारा ॥
तीन लोक जोइन औतारा । आवागवनमें फिर फिर पारा ॥
उपजै विनसै रहै भुलाई । देव रिषी मुनि सकलो खाई ॥
सिद्ध साधु अरु बडे जु ज्ञानी । बाँध बाँध कर तोपि समानी ॥
करम रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पमारा ॥