कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
निरंजनका आद्याको शाप देना आद्याका निडर होना विष्णुका गौरसे श्याम होनेका कारण आद्याका विष्णुको ज्योतिर्कादर्शन कराना
जो पुनि गहो हंसकी बांही । बांध रसातल पठाऊँ तांही ॥
निरंजनवचन ।
जब तुम रूप दिखावा मोही । तब हम पुरुष न चीन्हा तोही ॥
परथम ज्ञानी हम नहि जाना । बन्धु जान कीन्हा अभिमाना ॥
ज्ञानी वचन ।
धरमदास तब सों हम आये । गढ रैदास मो धारा पाये ॥
परथमहि सतयुग लागा भाई । नृप हरचन्द भये तहां राई ॥
तहाँ जाय शब्द गूहराई । जो चीन्हा सो लोक पठाई ॥
सतयुग सत्तनाम मोर नाऊँ । देही धर हम मनुष्य कहाऊँ ॥
धरमदास वचन ।
धरमदास सुनि टेके पाई । तुम प्रताप सकल सुधि आई ॥
काल चरित्र सकल हंम जाना । पुरुष लीला सबही पहिचाना ॥
जब आपुन आये भौ माहीं । हंस काज जो भयो अब भाई ॥
श्री कबीर साहिब और निरंजनकी गोष्ठी समाप्त ।
प्रमाण अनुरागसागरका ।
धर्मदास वचन ।
हे प्रभु मोहि कृतारथ कीन्हा । पूरणभाग्य दरश मुहि दीन्हा ॥
तुव गुण मोसन वरणि न जाई । मो अचेत कहैं लीन्ह जगाई ॥
सुधा वचन तुव मोहि प्रियलागे । सुनतहि वचन मोहमद भागे ॥
अब वह कथा कहो समझायी । जिहि बिधि जगमें प्रथमें आई ॥
कबीरसाहबका सत्यरुषकी आज्ञा पाकर जीवोंको चितानेके
लिये चलना निरञ्जनसे भेंट होना और उससे
बात चीत करके आगे बढ़ना ।
कबीर वचन ।
धरमदास जो पूछयो मोही । जुग जुग कथा कहों मैं तोही ॥
जबहीं पुरुष आज्ञा कीन्हा । जीवन काज पृथ्वी पग दीन्हा ॥
करि परनाम तबहीं पगु धारा । पहुँचे आय धरम दरबारा ॥
परथम चलेउ जीवके काजा । पुरुष प्रताप सीसपर छाजा ॥
तेहि जुग नाम अचिन्त कहाये । आज्ञा पुरुष जीव पहुँ आये ॥
आवत मिल्यो धरम अन्याई । तिन पुनि हमसो रार बढ़ाई ॥
मो कहैं देखि धरम ढिग आवा । महा क्रोध बोले अतुरावा ॥
जोगजीत इहैंवा कस आबो । सो तुम हमसों वचन सुनावो ॥
कै तुम हमको मारन आओ । पुरुष वचन सो मोहि सुनाओ ॥
जोगजीत वचन ।
तासों कह्यो सुनो धर्म राई । जीव काज संसार सिध्दाई ॥
बहुरि कह्यो सुनु अन्याई । तुम बहु कीन्ह कपट चतुराई ॥
जीवन कहैं तुम बहुत भुलावा । बार बार जीवन संतावा ॥
पुरुष भेद तुम गोपित राखा । आपन महिमा परगट भाखा ॥
तप्त शिलापर जीव जराबहु । जारि बारि निज स्वाद कराबहु ॥
तुम अस कष्ट जीव कहैं दीन्हा । तर्बहिं पुरुषमोहि आज्ञा कीन्हा ॥
जीव चिताय लोक लै जाऊँ । तोरे कष्टतें जीव बचाऊँ ॥
ताते हम संसारहिं जायब । दे परवाना लोक पठायब ॥
धर्मराय वचन ।
यह सुनि काल भयंकर भयऊ । हम कहैं त्रास दिखावन लयऊ ॥
सत्तर जुग हम सेवा कीन्ही । राज बडाइ पुरुष मुहिं दीन्ही ॥
फिर चौंसठ जुग सेवा ठयऊ । अष्ट खंड पुरुष मुहिं दयऊ ॥
तब तुम मारि निकारे मोही । योगजीत नहिं छांडों तोही ॥
अब हम जान भली विधि पावा । मारों तोहि लेउँ अब दावा ॥
योगजीत वचन ।
तब हम कहा सुनो धरमराया । हम तुम्हरे डर नाहिं डराया ॥
हम कहैं तेज पुरुष बल आही । अरे काल तुव डर मोहि नाहीं ॥
पुरुष प्रताप सुमिरि तिहिं बारा । शब्द अंगते कालहिं मारा ॥
ततछण प्रिष्टि ताहि पर हेरा । स्याम ललाट भयो तिहिं केरा ॥
पंख घात जस होय पंखेरू । ऐसे काल भोहिं पहुँ हेरू ॥
करे क्रोध कछु नाहिं बसाई । तब पुनि परेउ चरण तर आई ॥
धर्मराय वचन ।
छंद—कह निरंजन सुनो ज्ञानी, करो विनती तोहि सों ।
जान बंधु विरोध कीन्हों, घाट भयी अब मोहि सों ॥
पुरुष सम अब तोहि जानों नाहिं दूजी भावना ।
तुम बडे सर्वज्ञ साहिब, छमा छत्र तनावना ॥
सोरठा—तुमहु करो बखसीस, पुरुष दीन्ह जस राज मुहिं ॥
षोडश महैं तुम ईश, ज्ञानी पुरुष सु एक सम ॥