कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
मानुषीके गर्भसे बाबा घासीराम सांप
उतनेही समयमें बच्चा पूरे उड़ने योग्य हो जाता था । यूरोपके लोग इस पक्षीके इस दिनको हिलसेन डेस कहते हैं । बच्चेके उड़नेपर वायु फिर पूर्वके समान उड़ता है ।
मृत्युकी सूचना देनेवाली ।
उत्तरी एफ्रिकामें बकरीका दूध पीनेवाली चिड़ियोंमें एक ऐसी चिड़िया है जो कि, शुद्ध अंग्रेजी भाषामें कहती है कि, (WHIP POOR WILL) चाबुक मारो, विचारको मारैगा । यह बात मनुष्यकी बोलीमें बोलती है । प्रत्येक मनुष्य इन तीनों शब्दोंको अलग अलग समझता है ? जो कोई इस बातसे अनभिज्ञ हो वह अवश्यही जान सकेगा कि, आदमी बोल रहा है । वहाँके रहनेवाले कहते हैं कि, ये शहीदोंकी आत्माएं हैं जो पक्षियोंके स्वरूपमें प्रगट होती हैं । यदि पक्षी किसीके घरपर बैठकर आवाज करें तो जाना जाता है कि, अवश्यही इस घरका कोई मनुष्य मर जायगा ।
विशेष वक्तव्य — सहस्रों प्रकारके पक्षी हैं जिनकी बुद्धिमानीका विवरण असम्भव है । बड़े बड़े तथा छोटे छोटे अनगिनित हैं । चार खान चौरासी लाख योनिके सारे जीव बुद्धिमानीमें मनुष्योंके समान हैं कितनेही उनसे भी अधिक हैं । उनका हिसाब कौन लगा सकता है ।
पक्षियोंके बाद सहस्रों प्रकारके पतङ्ग और भँवरे इत्यादि भी बुद्धि सावधानीसे भरे हुये हैं । कहाँतक कौन लिख सकता है । इङ्ग्लैण्डवासियोंमें से कितनों हीने इसकी जाँचमें अपनी सारी आयु बितादी है । फिर भी ठीक ठीक पता नहीं लगा । वेभी परमेश्वरी कौतुकोंका यथार्थ भेद नहीं पासके । हां, उन लोगोंने अपने परिश्रमानुसार बहुत कुछ जान लिया है अङ्ग्रेजी भाषामें ऐसी अनेक पुस्तकें हैं जिनसे मनुष्य पशुओं तथा कीड़े मकोड़ोंकी बाबतमें बहुत कुछ जानकारी हासिल कर सकता है ।
मखियाँ ।
इन मखियोंकी दो सौ पचास जातियां निश्चित की गई हैं । इनके दो विभाग हैं । एक प्रकारकी मखियां हैं जो भूमिमें छिद्र बनाके रहती हैं, दूसरी वे हैं जो मधु एकत्रित किया करती हैं । वे छत्ते बनाकर इधर उधर मधु ढूँढ़ा करती हैं । फूलोंके रसको अपने पाँवोंमें लाती हैं उनके पिछले पाँवोंपर बड़े बड़े बाल होते हैं । वे जिन कोठरियोंको बनाती हैं उनमें फूलोंका रस भरती हैं । उनके समीप और स्थान होता है दूसरी कोठरियोंमें वे अण्डे देती हैं । उन्हीं रसोंको खाती पीती हैं ।
मक्खियों पर विज्ञ ।
प्टामेक्स नामक एक बहुत बड़ा विद्वान् हुआ है जो कि, बराबर छप्पन वर्षतक मक्खियोंकी चाल ढालको देखकर भली भाँति निश्चय करता रहा । किलिक्स नामक एक बहुत बड़ा तत्ववेत्ता हुआ है जिसकी सारी उमर यही सब जाननेमें बीती । पोरों देशके कितनेही वैज्ञानिक इनका स्वभाव देखकर उनकी जाँच करते हुए इनकी बातें लिखते रहे थे ।
डाक्टर वाटथार्वी तथा फ्रानसिस हिउबर — प्राचीन कालके वैज्ञानिक जैसे डाक्टर वाट थार्वी—फ्रानसिस हिउबर इत्यादि सन् १२५२ ई० तक जाँचते देखते रहे ।
मधुमक्खियोंकी तीन जातियां — उन्होंने जान लिया कि मधुमक्खियोंके छत्तेमें तीन जातिकी मक्खियां बसती हैं । प्रथम तो परिश्रमी मक्खियां हैं । दूसरी सुस्त तथा निकम्मी मक्खियां हैं । तीसरी राजकुमारी तथा बेगमें हैं । जो बेगम मक्खियां हैं वे अण्डे देती हैं जो बेकाम तथा सुस्त नर मक्खियां हैं उनके सम्भोगसे अण्डे उत्पन्न होते हैं । परिश्रमी मक्खियां प्रत्येक दौड़ धूपके काय्यं किया करती हैं, मधु इकट्ठा करना उन्हींका कार्य है ।
इनके अग्रमें एक विचित्र प्रकारका सूँड होता है । जिसमें मधु भर लाती हैं । सूँडमें चालीस पेच होते हैं, उनके चारों ओर बहुत सुन्दर बाल उगे होते हैं । सूँडोंके पाँच भाग होते हैं, वे भाग इस प्रकार होते हैं कि, दो भाग तो उनके दोनों ओर और एक भाग उनके बीचमें होता है । बीचके भागमें मधु इकट्ठा होता है । सूँडके चारों ओरके बाल जिह्वाके समान हैं जिससे मधु चाटा जाता है । सूँड जो कुछ अपनी ओर खींचे उसको सुरक्षित रीतिसे लाकर मधुके खजानेमें एकत्रित कर देती हैं । इसके सुन्दर मुँह अनेक कार्यके लिये बने हुये हैं । इसकी छः टाँगें होती हैं । दो बिचली टाँगें छोटी होती हैं, शेषकी चार टाँगें बहुत लम्बी होती हैं अगली टाँगोंमें प्यालेके समान कुछ गड़हे मधु एकत्रित करनेके लिये बने होते हैं । इसके एक पांवमें कॅटियांसी लगी होती है । जिससे मधुके छत्तेपर सरलतापूर्वक घूम फिर सकती हैं । इसके पेटमें तीन भाग होते हैं—एक तो मधु एकत्रित करनेकी थैली, एक मोमकी थैली और तीसरी विषकी थैली होती है, जो थैली मधु एकत्रित करनेके लिये है सूँडसे मधु लेकर उसमें रख छोड़ती है । यह उसके आगे और नीचे बनी रहती हैं । उसके आगे एक थैली बनी है । उसकी राहसे उसमें मधु पड़ता है, वह मधुमक्खीका भोजन है, वह पेटमें जाकर हजम हो जाता है उसीसे उसका जीवन है जो भोजन करती है, उसको जब वह बाहर निकालती है तो मोम हो जाता है ।