कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
चौथी किताब कुरानका वृत्तान्त आठ वेदोंका वर्णन, निरञ्जनका पंथ
चौपाई ।
धरमदास चित्त चेतहु जानी । कहों बुझाय अगरकी खानी ॥
पुरुष अजावन रहे विदेहा । तत्त्व बिहीन सुरति सनेहा ॥
चारि करी सिंहासन जोरा । पांचऐँ आप मध्य अंजोरा ॥
चारि करी चारिउ परवाना । स्वाती युक्त भीतर अकुलाना ॥
समय-करी करी महा परिमल, वास सुवासकी खानि ।
तेज करीन परगट भई, चिता आनि समानि ॥
चौपाई ।
पुरुष आंचित चिता जब कीन्हा । उपज्योशब्द सुरतिको चीन्हा ॥
रहे गुप्त परगट भई काया । स्वासा सार शब्द निरमाया ॥
शब्दहिते है पुरुष अस्थूला । शब्दहिते है सबको मूला ॥
शब्दहिते बहु शब्द उचारा । शब्दै शब्द भया उजियारा ॥
शब्दहिं पारस शब्द अधारा । शब्दहिते भौ सकल पसारा ॥
शब्दहिं रूप गुरु कर धारा । सोई शब्द जिवके रखवारा ॥
प्रथम शब्द भया अनुसार । निहतत्त्वी यक कमल सुधारा ॥
नीहतत्त्वीपर आसन कीन्हौ । रचना रची सकल तब लीन्हौ ॥
रच्यौ पुहुप रचना मनि भारी । सहस्र अठासी दीप सुधारी ॥
अच्छै वृक्ष एक रचा बनाई । अग्रवास तहैं रही समाई ॥
समय-पेड पात रस फूलमें, प्रगटी वास अनूप ।
पारस गिहतत्त्वहि पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥
पेड पात फल फूलमें, प्रगटी वास अनूप ।
प्रसन्न होत निहतत्त्व पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥
चौपाई
जब पारस सुरति भये स्थाना । अगर प्रताप निमिष उरआना ॥
पुहुप प्रसन्न होत उजियारा । स्वासा पारस बचन सुधारा ॥
पुरुष प्रसन्न नाम उच्चार । श्वासापर सब रचनि सुधारा ॥
स्वासा पार शब्द गुँजारा । पांच अमीको भयो बिस्तारा ॥
पांच अमीको जो विसतारा । ताहि अमी सब लोक सुधारा ॥
स्वासा पुहुप अगरकी खानी । सोलह सुतकी भई उत्पानी ॥
पांच अमी साहबके अंगा । पांचों तत्त्व ताहि परसंगा ॥
स्वासा नेह सबै उपजाया । बानी बानी बरन बनाया ॥
सत्य सार सबहिनको मूला । भयऊ सत्य सो सब अस्थूला ॥
स्वासासार सत्य कर भाऊ । अमी आदि उपजी तेहि नाऊ ॥
सत्यसार स्वासा संभारी । अमी आदि पारस तहैं धारी ॥
स्वासा आदि सुरङ्ग बखाना । रंग अमीकर भा बंधाना ॥
स्वासा अजर नाम अनुमाना । परगट अमी सो कहों सुजाना ॥
अदल नाम स्वासा परकाशा । उपजी अमी अमान सुबासा ॥
स्वासा निरञ्जन भया अनुसार । अधर अमीका भा विस्तारा ॥
स्वासा पांच परगट विस्तारा । पांच अमीको भयो पसारा ॥
पांच अमी पांचों अधिकारा । पांचों तत्व तेहि संग सुधारा ॥
पांच अमी सब लोक पसारा । पांचों तत्व गुप्त अनुसार ॥
समय-पांच अमीते पांच भये, पांच नाम अधिकार ।
सनै सनैही सब भया, अमी तत्व विस्तार ॥
चौपाई
सोरह स्वासा सार सुहाया । सोरह सुतकी प्रगटी काया ॥
सोरह सुतकी सोरह नाला । एकते एक अमान रिसाला ॥
पुहुप नाम स्वासा अनुसारि । उपजी सुरति हंसपति भारी ॥
सुरति समानी प्रभुकी देहा । बाहर भीतर एक सनेहा ॥
पांच अमीकी प्रकटी देहा । सुरति कीन्ह तेहि मांहि सनेहा ॥
जेतिक पुरुष खान निरमाया । पांच अमीते सबकी काया ॥
पांचों अमी सुरतिके अंगा । नाल सात उपजी तेहि संग ॥
सात नाल संग एकै भाऊ । सातो सुरत पुरुष परगटाऊ ॥
सात नालकर एके भाऊ । सातौं रहै पुरुषके ठाऊ ॥
पुरुष सुरति कहैं अगुवा कीन्हा । सातौं नाल सौंप तेहो दीना ॥
सातौं नाल सुरति जब पाई । ताहि नालमों रही समाई ॥
छिन बाहर छिन भीतर आवै । देह विदेह दोऊ दरसावै ॥
अमरतार निःअच्छर कियेऊ । सोऊ पुरुष सुरति कह दियेऊ ॥
सत्तपुरुष निज सुरति सनेही । पारस आदि रची सबदेही ॥
समय-अधर निहछर संग लिये, सेत ध्वजा फहराय ।
पलटि समानि सुरति पुरुष, रहि सो अछप छिपाय ॥
सोलह सुतकी उत्पत्ति-चौपाई ।
सुरत सनेह प्रभु इच्छा कीन्हीं । सोरह सुत उपजावे लीन्हीं ॥