कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
मुहम्मद साहिब
उद्यान बन्धवरुण मंडल कामाक्षा देवीमलागनि गर्भावस्था कामानि वसि २ योगिनी मोक्षदायनी जठराग्नप्रवेशे नाभिस्थानं कुंडलिनी शक्तिः रक्तवर्ण अधोमुखी जगन्माता योगिनी गर्भपुटम् ॥ ॐ तीसरी कुण्डलिनी शक्तिका स्थान है । यह कुण्डलिनी शक्ति सँदूरके रङ्गकी है । यह सर्पके स्वरूपकी है । उसका मुँह नीचेको है, अग्नि उसका देवता है । कोहरनी शक्ति है । ब्रह्मा ऋषि है । कूर्म कला है । उद्यानबन्ध वरुण मण्डल और कामाक्षा देवी है । मल अग्नि है । गर्भकी अवस्था है । सम्भोग कामनामें रहनेवाली योगिनी मोक्षकी देनेवाली है । जठराग्निके भीतर है । नाभिमें इसका स्थान है । इसका नाम कुण्डलिनी देवी है । तँवेकी कला है । समस्त संसारकी माता योगिनी गर्भपर है । यह कुण्डलिनी देवी समस्त उत्पत्तिका कारण है । इसके मुँहसे जो सर्पके सद्गुण फूँकारका शब्द होता है । इस फोंकार ओँकारकासे शब्द बहिर्गत होता है और इस ओँकार शब्दसे हृदय हरा-भरा होता है । और हृदयके हरा-भरा होनेसे समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति होती है । ऊपरका भाग सूर्य है यह कुण्डलिनी देवी एक डब्बेमें रहती है । नीचेके डब्बेके भागमें चाँदका स्थान और कुण्डलिनीकी फूँकारसे प्राण अपान वायु हिलती है । इस वायुके हिलनेसे समस्त संसार जीवित रहता है । और उस नाभिके स्थानमें दोनों वायु लड़ती हैं । इस लड़ाईसे जो अग्नि उत्पन्न होती है उसको जठराग्न कहते हैं । यह देवी बड़ी सुन्दर है ।
ॐ द्वितीयम् स्वाधिष्ठानचक्रं लिंगस्थानं पीतवर्ण रजोगुण आकारं ब्रह्मा देवता सावित्री शक्तिः तेजारुण ऋषि. ३ धारणाप्यदं देहजाग्रतावस्था परा वाचा ऋग्वेद आचार्यः लिंगगता भूमिका सायुज्यता हंसो वाहनः षण्मात्रा बं भं मंयं रं लं ६ अंतर मात्रा ६ वहिर्मात्रा ६ काम १ कामाक्षा २ तेजोसि ३ तक्षासा ४ चेष्टता ११ मैथुन देवता १० अजपाजाप षट् सहस्र ६००० घटिका १६ पल ३२ अक्षर २४ पूजा मानसिका सोहंभावेन पूजयेत् अत्र गंधादि समर्पयामि नमः ॥
ॐ दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र वह लिंग स्थानमें हैं । उसका रंग पीला है । रजोगुण स्वरूप है, ब्रह्मा देवता है, सावित्री शक्ति है, वरुण ऋषि है, सम्भोग कामनाकी अग्नि है, तेजारुण ऋषि है । समस्त धारणा शरीरकी रक्षक है, जाग्रता-वस्था है । परा वाचा है । ऋग्वेद है । कर्म कर्ता लिंग है । उसकी गता भूमिका सायुज्यता है । हंसवाहन है । अक्षर मात्रा है । बं भं मं यं रं लं ये भीतरली छः मात्राएं हैं । बाहरी छःमात्रा हैं वे काम, कामाक्षा, तेजोसि, तक्षासा, चेष्टिता, मथुन देवता ये हैं अजपा जाप षट् सहस्र है । सोलह घड़ी तथा तीसपलमें हैं ही । अक्षरचार हैं सोहम्भावसे मानसी पूजा है । सुगन्धियों इतर इत्यादिके साथ मैं पूजता हूँ उसके
लिये नमस्कार है। ॐ प्रथमाधारचक्रं गुदा स्थानं रक्तवर्णं देवता सिद्धिः बुद्धिः शक्ति कूर्म ऋषि मूषक वाहन अपान वायु कूर्म कला अंकोचन मुद्रा मूल बंध चतुरदल ४ चतुरमात्रा ४ वं शं षं सं अंतर मात्रा ४ वहिर्मात्रा ४ आनंद १ योगानन्द खीरानन्द ३ श्रीपरमानंद ४ अजपा जाप षट्शतानि ६०० घटिका ४ पल ३२ अक्षर ४ पूजा मानसिका सोहंभावेन पूजयेत् अत्र गंधादि समर्पयामि नमः ॥ ॐ प्रथम आधारचक्र है यह गुदाके स्थानमें है लाल रंग है। उसका देवता गणेश है। सिद्धिबुद्धि शक्ति है। कूर्म ऋषि है। मूल बंध है। चार पत्ते हैं। चार मात्रा हैं। बं शं षं सं भीतरी चार मात्रा। बाहरी चार मात्रा, आनन्द, योगानन्द, वीरानन्द और श्रीपरमानन्द हैं। अजपाजाप छः सौ है। यह चार खड़ी तथा बत्तीसपलमें होता है। अक्षर चार है। पूजा मानसी है सोहम् भाव करके पूजें यों कहे कि, इत्र गन्ध इत्यादिसे मैं पूजता हूँ ॥
महासमुद्र अर्थात् समस्त स्थानपर जलही जल परिपूर्ण हो रहा है और दूसरा कुछ नहीं। यह जलस्थान जलरञ्ज गोसाईंका है।
ब्रह्माण्ड ।
पूर्व कहा हुआ स्वरूपही समस्त ब्रह्माण्डका भी है। इसीको तीन लोक भव-सागर कहते हैं। इसीमें उत्पत्ति स्थिति तथा विनाशका समस्त कौतुक हो रहा है। इस कौतुकको बड़े कौतूकीने बनाया है। जिसके भेदको भवसागरके रहनेवाले नहीं जान सकते। जितने खिलाड़ी हैं उन सबमें यह खिलाड़ी बड़ाही बलिष्ठ है। किसी तांत्रिकका तंत्र अथवा कौतुकीका कौतुक इसके आगे जा नहीं सकता। इस कारण संसारमें जितने जादूगर हैं सब इसके चरे बन गये। जो जादूगर उसके सामने खड़ा होता है, उसीको वह दबालेता है। सबको अपने अधीन बना लेता है। ऐसेही तौरीतमें लिखा है कि, जब मूसा बहुतेरे कौतुक दिखलाने लगा, तब फिरऊन बादशाहने अनेक जादूगरोंको बुलवाया, उन जादूगरोंने अनेक सर्प उत्पन्नकर दिये। तब मूसाने अपना सोंटा चलाया वह सोंटा बहुत बड़ा अजगर बन गया। उसने जादूगरोंके समस्त सर्पोंको खालिया। समस्त जादूगर मूसाके सामने न ठहर सके, भाग गये। इस प्रकार समस्त कौतुकवाले इस विशाल कौतुकी की सेवावंदनामें रहते हैं। जिसको सत्यगुरु मिल जावे वह वास्तवमें उसके पञ्जेसे बच निकले। दूजी कोई युक्ति नहीं। इस ब्रह्माण्डका स्वरूप जो बनाया गया उसमें पहला चित्र इस प्रकार नहीं बनाया गया। कारण यह कि, उक्त स्थान-पर्यन्त कोई भी भाग्य शाली पहुँच नहीं सकता है। जितने सिद्ध साधु हैं वे तीन स्थान पर्यन्त पहुँचते हैं। अर्थात् सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, जो सायुज्य मृक्ति