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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

विश्वासकी झलक जीवकी हालत

अग्रनाम ।

सोमः पुनान ऊर्मिणा व्योवारं विधावति, अग्रेवाचः पवमानः कनिन्द्रत् ॥
अग्रे सिन्धूनां पवमानोऽतिपतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः । हरिर्मित्रस्य सदनं
षु सीदति मर्मजानो विभि- सिन्धुभिर्वृषा ॥

उग्रनाम ।

उच्चातेजातमंधसोदिर्विसधभूम्या ददे उग्र शर्म महि खवः ॥ सामवेद
उत्तर अ० ॥ प्र० ५ ॥ मन्त्र १ ॥

युध्वाहिवृत्रहंतमंहीरिद्रंदपरावताः । अर्वाचीनोमघनसोमपीतय उग्रक्रुध्यै-
हिराग साम १ ॥ प्र० ४ ॥ मन्त्र ९ ॥

आवृंदंवृत्राहाददे जातः पृच्छातद्विमातरंक उग्रके शृणीरे ॥

सामवेद अ १० ॥ प्र० ३ ॥ मन्त्र ३ ॥

इस तरह वेदोंमें भी कबीर, अग्र, उग्र, और मुनीन्द्र शब्द आजाते हैं ऐसी
रीतिसे वेद भी बाकी नहीं रह जाते ।

कबीर शब्दके अर्थ ।

‘कबीरैकोत्तरशतक’ इस नामके ग्रन्थमें कबीर शब्दके अर्थकी निरुक्ति
१०३ श्लोकोंमें की है इसकी और वरामजीने बड़ी सुन्दर भाषा की है उसके
कुछ एक श्लोक यहाँ भी उद्धृत करते हैं ।

श्रीपार्वत्युवाच- अक्षर त्रितय स्वामिन् कबीर इति को भवेत् ॥

किं देव उपदेवो वा तन्मे ब्रूहि जगत्पते ॥

पार्वतीजीका प्रश्न-ऐ स्वामीजी ! जो तीन अक्षर कबीर हैं वो कबीर
कौन हैं तथा किन देवताओंमेंसे हैं ।

श्रीमहादेव उवाच-कोब्रह्मा प्रोच्यते बीचं विद्यमानो विशिष्यते ॥

रमन्ते सर्व भूतानि यत्कवीरस्य चोच्यते ॥

महादेवजीका उत्तर (क) ब्रह्म (ब) प्रगट, (र) समस्त जीवोंमें समान-
रूपसे रम रहा है ऐसेको कबीर कहते हैं ।

कश्चैवकेवलं ब्रह्म विशेषं बीजमव्ययम् ॥

अंतर्वहिरमन्ते च यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

(क) ब्रह्मरूप है, । (ब) अमर बीजरूप है । (र) भीतर बाहर
सब स्थानोंमें समभाव है, उसको कबीर कहते हैं ।

क सुखसागरो दाता बीजं ज्ञान तथैव च ॥

रहित आदिनान्तेन यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

(क) का अर्थ—सुख रूप समुद्रका देनेवाला है। (ब) ज्ञानका देनेवाला है। (र) उसका आरम्भ अन्त कुछ नहीं, ऐसेको कबीर कहते हैं।

कस्तुकायापतिश्चैववीशेषः समतिजयः ॥

रकारो रतिसर्वस्य यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

(क) समस्त शरीरोंका स्वामी है, प्रत्येक स्थानमें वर्तमान है। (बी) सबका विजयकर्ता है। (र) सबका प्यारा है उसको कबीर कहते हैं।

कस्तु वायुरजश्चैव विज्ञानं ज्ञानमीर्यते ॥

रसना ध्यायते नाम्ना यत्कवीरः स चोच्यते ।

(क) वायु और जलके साथ मिलकर एक रूप हो रहा है। (ब) ज्ञानरूप हो रहा है अर्थात् लद्दुनी विद्यासे पूर्ण है। (र) जिह्वा द्वारा रटा जाता है। जिसमें एकता है, जल, वायु, ज्ञान और ध्यान उसकी प्रशंसा करते हैं परन्तु वह उन सबसे जुदा है उसको कबीर कहते हैं।

कः पियूषरसाधीशो वीतृष्णामोहनाशकृत् ॥

रक्षिताऽखिललोकानां यत्कवीरः स चोच्यत ॥

जो (क) स्वच्छ अमृत स्वरूप है। (बी) कांक्षा स्वाद और बुरे ध्यानोंको दूर करनेवाला है। (र) सबकी रक्षा और सतर्कता करनेवाला है, उसको कबीर कहते हैं।

कः करुणामयः सिन्धू, विर्मुक्तो मनसी स्थितः ।

रसास्मरचयोगेषु यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

जो (क) केवल एक दयाका समुद्र है। (बी) मुक्तिको देनेवाला है। (र) समाधि करानेवाला है, उसको कबीर कहते हैं।

कः कामाद्यखिलादीनां वीबिहंगो जितेंद्रियः ।

रमाय निगमाश्चैव यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

(क) जो अच्छी कामनाको पूर्ण करने वाला है। (ब) बिहङ्ग एक पक्षीका नाम है। वह चित्त, मन और इन्द्रीके बन्द करनेके निमित्त होता है और समस्त मनुष्योंको मुक्ति प्रदान करने वाला है। समस्त संसारमें एक प्रकारका है। उसे कबीर कहते हैं।

कः कन्दर्पो वीर्ययुक्तो दयामुक्तोह्यनामयः ॥

सत्यरत्नसमायुक्तो यत्कवीरस्स चोच्यते ॥

जो (क) कामरूप कामनासे पृथक्, दयाकरके समझ, नाम और रूपसे रहित, सत्यरूपी रत्नसे मिला हुआ है उसे कबीर कहते हैं।