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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

सत्य पुरुषका प्रतिपादक पुरुषसूक्त

रखकर आना । ए ! इशककी दिलमें आग लगी हुई है दिलमें जितनी हवस हो उसे पूरा करले । जा तूने दुनियाँकी हवससे नापाक जाम भर रक्खा है उसको छोड़ने कीही भेंट भाट हो ए मेरे बीमार बुलबुल ! उसके छोड़ेसे सब आफत टल जायंगी । प्याला पीकर मनुष्यवर सिंडीके समान न हो, न दुनियाँकी ही हविश कर । जब नाले लगानेका वख्त आया तब सोता पड़ा है । ए ! अब रात बीत चुकी है, जग खबर ले जो तने बीज बोया है, उसीकी खेती फलती है इसमें पूर्ण प्रकरण तथा बुलबुलसे जीवात्माका संबोधन किया है ।

हेला (नदा) के अङ्गकी साखिया ।

कबीर देश दे हम वगरिया, ग्राम ग्राम सब खौरा ।
ऐसा जिवडा न मिला, ए जो फरक विछोर ॥ १ ॥
कबीर समझाए समझे नहीं, पर हाथ आप बिकाय ।
समझाए समझे नहीं, बाँधे यमपुर जाय ॥ २ ॥
कबीर जाए नाता आदिको, विसर गयो वह ठौर ।
चौरासीके विसपर, अखत औरकी और ॥ ३ ॥
कबीर वस्तु है गाहक नहीं, वस्तु सोगरव मोल ।
बिना दामको मानवा, फिरे सो डावों डोल ॥ ४ ॥
कबीर —यह जग तो झेडे गया, भया जोग नहिं भोग ।
तिल तिल झार कबीर लए, तलठी झारें लोग ॥ ५ ॥
सुरनर मुनि और देवता, सात द्वीप नौ खण्ड ।
कहै कबीर सब भोगिया, देह धरेको दण्ड ॥ ६ ॥
कबीर-लघुताई सबते भली, लघुताते सब होय ।
जस दुतियाको चन्द्रमा, शीष नवें सब कोय ॥ ७ ॥
कबीर—जो कोई मिला सो गुरुमिला, चेला मिला न कोय ।
छः लाख छानवे रमैनी, एक जीवपर होय ॥ ८ ॥
कबीर—श्रोता तो घरही नहीं, वक्त बदे सो बाद ।
श्रोत्रा वक्ता एक घर, तब कथनीको स्वाद ॥ ९ ॥
कबीर—सुन कागज छुवों नहीं, कलम गहों नहिं हाथ ।
चारों युगको महात्म, मुखहि जनाई बात ॥ १० ॥
कबीर—दुःख न था संसारमें, था नहिं शोग वियोग ।
सुखहीमें दुःखला दिया, बोली बोलें लोग ॥ ११ ॥

हम देश देश और गाम २ में फिर । सब जगहोंमें गये पर ऐसा कोई जीव

नहीं मिला जिसके दिलमें कोई फरकही न हो ॥१॥ हमने समझाया पर न समझे, दूसरेके हाथोंमें बिक गये, हमने बारंबार कहा कि, मानजा नहीं तो चौरासीमें भटकता फिरेगा, यम पकड़ कर लेजायगा पर अंतमें ऐसाही हुआ ॥ २ ॥ जब गर्भमें था तब भगवान्से पुकारता था कि, मैं तेराही हूँ पर जब वो ठौर छूट गया गर्भके बाहिर आया कि, हठवायुके लगतेही सब भूल गया । चौरासी लाख योनिके चक्करमें पड़ गया औरका औरही होगया ॥ ३ ॥ वस्तु हैं पर उसके खरीददार नहीं क्योंकि, उसकी कीमतें सबकुछ देना पड़ता है । जिसके पास देनेको दाम नहीं अथवा न देसके वो ढाँवा डोल फिरता है ॥ ४ ॥ यह संसार तो झाड़वामें ही रह गया न भोग कर सका एवम् न योग करसका । इसके जन्म लेनेका सार तो कबीर ने लेलिया है लोग तो छूछके पीछे लगे हुए हैं ॥ ५ ॥ सात द्वीप और इसके नौ खण्डोंमें के सुर नर मुनि और देवता सब भोगीही हैं क्योंकि, जिसप्रारब्धसे जो देह बनेगा उसका फल भोगना ही पड़ेगा ॥ ६ ॥ सबसे छोटा बनके रहना सबसे अच्छा है, उसीसे सब कुछ हो सकता है, जैसे कि, द्वितीयाके बालचांदको सबही प्रणाम करते हैं ॥७॥ जितने मिले सब गुरु मिले कोई भी चेला नहीं मिला, इस कारण छः लाख छानवे रमैनी एकही जीवपर गुजर रहीं हैं ॥८॥ जबतक श्रोता न समझे उस समयतक कथा कहना समयको व्यर्थ खोना है । जब श्रोता बक्ता दोनोंका एक विचार मिलजाय तबही कहनेका आनन्द है ॥ ९ ॥ सुन, न मैं कागज छूता हूँ न कलम पकड़ता हूँ । चारों युगोंकी बातें मुहसे कहनेकी बात है ॥१०॥ यदि शोच और वियोगका दुख न होता तो कोई शोच नहीं था, पर जब सुखमें इनसे दुख मिलता है, दुनियाँके लोग बोली बोलते हैं तो फिर इससे जयावा कोई दुख नहीं होता ॥ ११ ॥

शब्द — अन्तर मैल जो तीरथ न्हावे, उसे वैकुण्ठ न जाना ।

लोक पतीजै कछु नहिं होवै, नाहीं राम अयाना ॥

पूजा राम एक है देवा, सांचा नाम न गुरुकी सेवा ।

जलके न्हाए जो गति होवे, नित नित मेंडक न्हावे ॥

जैसे मेंडक तैसे वह नर, फिर फिर जूनी आवे ।

मन कठोर दोनीसे बना रस, नरक न पांचा जावे ॥

हर गानेसे जोबरे, हड़मिए सगरी सैन तराए ।

दिन नहिं रैन वेद नहि शासतर, तहाँ बसे निरंकारा ॥

कहैं कबीर नर ताको ध्यावो, बाहिरिया संसारा ॥

जिसके दिलमें बुरी वासनोंका मेल भरा हुआ है वो चाहे हजार तीरथ करे

बो वेंकुण्ठ नहीं जा सकता । चाहें लोग उसपर विश्वास करें कि, यह महात्मा हो गया इससे क्या है ? वो राम क्या अनजान है जिससे वो छिपजाय । एक रामकी पूजा तथा रामनाम एवं रामके लिये नमन करना ही सच्चा है । सिवा इसके कोई दूसरा देव नहीं है । इससे कल्याण हैं । यदि केवल स्नानसे ही कल्याण होजाय तो मँढक तो रातदिन पानीमें पड़ा रहता है क्यों न मुक्त हो जाय तो फिर २ मँढकही बना करता है । इसी तरह वो मनुष्य भी फिर २ कर योनियोंमें फिरता रहता है । मन तो कठोर पाप करनेमें लगा है फिर नरक क्या पांचमां (या ढाँटा) जायगा । भगवानके गुणानुवाद गानेसे तो वित्त अकुलाता है पर इसकके गन्धे गानाके सुनने में सारी रात बिता देता है । जहाँ सत्यपुरुष विराजते हैं वहाँ रात और दिन दोनों ही नहीं हैं, यानी वहाँ कालकी गति नहीं है, न वहाँ विधि-निषेधके शास्त्र ही हैं । कबीर साहिब कहते हैं कि, मैं तो उसीका ध्यान करता हूँ । यह संसार तो बाहिरिया बेकाम हैं मुझे इससे क्या लेना है ?

मैं किसको कहूँ, कोई न सुनता न मानता, सबकी बुद्धिपर परदा पड़ गया है । एक न भूला दो न भूला सारा संसार भूला पड़ा है, सब अचेत होगये, किसीकी बुद्धि ठिकाने नहीं रही । सब अंधेरीराजाके वशमें आगए इस राजाके मंत्रियोंकी जो दुष्ट बुद्धि है वह सर्व बुद्धिकोंका उपदेश दिया करती है । दोनों साधु जो विचार तथा विवेक हैं उनको मटियामेट किया चाहती है, वे दोनों अपनी बुद्धि-मानोसे बच निकले । कोई मनुष्य हो उसके हृदयके किसी कोनेमें छिपकर दोनों रह गये हों तो वह सोचे तथा समझे कि, जहाँ टका सेर घास मिठाई बिकती हो वहाँ कुशल नहीं है, यहाँके मनुष्य अंधे हैं इनमें तनिक भी सोच विचार नहीं । वे गुरु साधु तथा परमेश्वरको क्या पहचानें ? उनके निमित्त वासनाओंकी फाँसी खड़ी है सब उसके ऊपर लटककर मरते हैं, मर गए और निश्चय मरेंगे ।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह सब फँसनेवालोंके लिये फाँस बनाये गये हैं । सब दौड़ दौड़ कर आपसे आप इस जालमें फँसते हैं । जिसने तन मन धनसे प्रेम किया, मिटनेवाली वस्तुसे मंत्री जोड़ी वह मरेगा । जिस किसीको परमेश्वरने मंत्री प्रदान की वही समझे कि, उत्पत्तिके आरम्भमें केवल एक अण्डा वासनासे भरा हुआ उत्पन्न हुआ था । इसी कारण वह फूटा, आनन्द लेनेके निमित्त उसने सूक्ष्म शरीर धारण किया । यह शरीर कामक्रोधादिकके बंधनमें जबतक पड़ा है और जबलों सांसारिक आनन्दोंका ध्यान है, शरीरकी रक्षा चाहता है तबलों बंधनमें पड़ा रहेगा । मुसलमानी पुस्तकोंमें लिखा है कि, आदम जब अवनकी

वाटिकामें था तब आयुषके वृक्षके फलको खाता था । जब उसने गेहूँका दाना खाया तब उसको शौचकी आवश्यकता हुई । तब परमेश्वरने उसको वैकुण्ठसे बाहर निकालकर कहा कि, यह वैकुण्ठ शौच तथा लघुशंकादिककी जगह नहीं है । अब तू पृथ्वीपर जा ; इस प्रकार यह पृथ्वी मुक्तिकी कामना रखनेवालोंके निमित्त नहीं है ॥

पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड ।

ब्रह्माण्ड और पिण्डका एकही स्वरूप है तनिक भी विभिन्नता नहीं हैं । दोनों की एकसी अवस्था है तनिक भी घट बढ़ नहीं । पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंमें जल है इस जलके बीच विचित्र कौतुक बना है । यह ब्रह्माण्ड भवसागर कहलाता है । इसमें ऐसे कौतुक हैं जो मनुष्योंके अनुमानमें भी आ नहीं सकते । उत्पन्नके पूर्व जल था, इस जलमें एक बुल्ला उठा । अण्डेके स्वरूपमें वह जलपर उतराता फिरता था । सो जलही जल था । वह बुलबुलाभी जल था । जो कुछ जल तथा बुलबुलेमें था सो भी सब जलही था । जल और बुलबुले सब स्थानोंमें परमेश्वरकी आत्मा थी । वह बुलाबुला अर्थात् अण्डा फूट गया । यह ब्रह्माण्ड एक बड़ी नदी है । पिण्ड बूंद हैं, जो कुछ नदीमें है उसीके सामान बूँदमें हैं । नदी बूँद है, तथा बूँद नदी है । लोक तथा वेद इस नदीके दो किनारे हैं । भौति भौतिकी इच्छाएँ हैं, यहाँ श्वासमें जल भरा हुवा है । जब दोनों एक ठहरे तब उचित है कि, प्रथम अपने पिण्डकी अस्थिके जाननेका उद्योग करें । जब पिण्डकी सुध होजायगी तब समस्त ब्रह्माण्ड का समाचार जानलिया । जायगा । जिसने अपने पिण्डका वृत्तान्त नहीं जाना वह ब्रह्माण्डका तनिक भी वृत्तान्त नहीं जान सकता । जो अपनेको न जाने वह परमेश्वर को क्या जान सकता है ? दोनों का समाचार पारख गुरुके अतिरिक्त और कोई दूसरा बतला नहीं सकता । पाँव पाताल सो सातवीं पृथ्वी है । पाँवकी पीठ सो छठी पृथ्वी है । पाँवकी उँगलियाँ सोई असुर हैं । पैरके नाखून सो असुरोंकी सवारी हैं । अष्टालिङ्ग सो पाँचवाँ महातल है । एड़ी चौथा तलातल है । ठिगुनी सो तीसरा सुतल है । जाँघ, सोई तल है । जो पग हैं सोई पहला अतल है, यही भूमि है । लिङ्ग प्रजापति है । स्त्री तथा पुरुष जब दोनोंका वीर्य स्थलित होता है, तब पृथ्वी और आकाश मिलते हैं, तभी वीर्यवृष्टि होती है । चूतङ्गका सिरा सोई प्रभातकी उज्ज्वलताका आरम्भ है । जो पहले दिखाई देता है श्वेतरेङ्ग है । जो मोटी मांस है सो माया है । वह दयालु हैं । जो नाभिकी गम्भीरता है वो समुद्रका घेर है । उधर तो झड़ा अग्नि है । इधर बडवा अग्नि है । समस्त नसें नदियाँ हैं और जो पेट है बही