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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

१६ अध्याय । आद्या और निरंजन पर जीत

पूरा होता है। यदि विरुद्ध मिले तो उस स्त्रीका प्रेम अपने पतिसे नहीं होता। उसमें मन नहीं लगता। अपने उपपति को ढूँढ़ती फिरती है। वह जिसके साथ विवाही जाती है वह तो उसका पति नहीं। इस कारण कामाग्नि उसके हृदयको जलाती रहती है। तब मस्त फिरती है और धूर्त तथा व्यभिचारिणी हो जाती है। जब तक उसका पति नहीं मिलता तब तक उसके कामकी अग्नि शान्त नहीं होती।

मायाने अपने तीन स्वरूप बनाया है वे जड़ चैतन्य और वाणी हैं जड़ तो चाँदी सोना रत्न आदि हैं। चैतन्य स्त्री है वाणीमें समस्त वेद पुस्तकें और वाणी विद्या इत्यादि संयुक्त हैं। इन तीनों स्वरूपसे उसने समस्त संसारको अपने वशीभूत कर लिया है। बिना तात्पर्य समझे वेद और वाणी पढ़ पढ़ सभी मस्त होकर इस बाणीमें डुबकियां खा रहे हैं। इस वेद बाणी रूप समुद्रका भेद किसीने नहीं पाया। पढ़ा तो सही पर यथार्थ भेदको नहीं जान सका। इस कारण उनका पढ़ना निरर्थक हुआ। इससे कुछ मनकी स्वच्छता नहीं हुई। क्योंकि जो सत्य तात्पर्य है उसको नहीं सूझा न मनमें विचार आया।

(कबीर साहबकी) शब्द अङ्गकी साखी

कबीर—एक शब्द गुरु देवका, तामें अनंत विचार।

पण्डित थाके मुनि जना, वेद न पावें पार ॥

कबीर—आसा बासा सन्तकी, ब्रह्मा लखे न वेद।

षट् दर्शन खटपट करें, विरला पावें भेद ॥

कबीर दीपक जोइया, देखा अपरं देव।

चार वेदकी गम नहीं, तहां कबीरा सेव ॥

कबीर—ऐसी अद्भुत मत कथो, कथो तो धरो छिपाय।

वेद कुरानों ना लिखी, कथों तो को पतियाय ॥

कबीर—माँ मूँडूँ ता गुरुकी, जाते भरम न जाय ॥

आप बूड़े चहुँ वेदमें, चेले दियो बहाय ॥

कबीर—बाणी तो पानी भरे, चारों वेद हजूर।

करनी तो गारा करे, साहबका घर दूर ॥

कबीर—बाणी तो पानी भरे, चारो वेद हजूर।

चूको सेवा बन्दगी, किया चाकरी दूर ॥

उस बाणीने सर्व मनुष्योंके मनमें अभिमान और अहंकार भर दिया। जब मनुष्य कामनाके आधीन होता है तब वस्तुको इतनी हानि होती है : तप, सत्य, शौच, लक्ष्मी, लज्जा, बुद्धि, सुकृति और आयु।

विषयियोंके निमित्त पूर्व लिखित येही तीनों पदार्थ हैं जबतक संसारमें रहते हैं तबतक तो विषयवासना और शरीरके पालन पोषणमें लगे रहते हैं। मृत्युके पीछे वैकुण्ठमें आनन्द लूटते तथा अप्सराओंसे सम्भोगकी आशा रखते हैं। विषयी पुरुषोंकी विषय भोगसे कभी निवृत्ति नहीं होती। जैसे संसारमें वैसेही परलोकमें भी इसी वासनामें फँसे रहते हैं। वासनायें इनको उसी प्रकार नचाती फिरती हैं, जैसे कि, कलन्दर बन्दरको नचाता फिरता है उसी मनकी गतिसे सब मनुष्यों की हीन दशा हो रही है।

यह मन निरञ्जन है। नेत्रोंके श्वेत स्थानमें इसका निवास है। इसी स्थानपर बैठकर समस्त विषय वासनाका आनन्द लेता है। इस कारण प्रथम नेत्र गतिमान होते हैं। पहले नेत्रोंमें गति होती है पीछे देह चलती है, तब उसकी कामना पूरी होती है। निरञ्जन आँखोंकी सफेदीमें बैठकर सब भोग भोगता है। यही कारण है कि, रुग्नावस्थामें मनुष्यका समस्त शरीर तो शुष्क हो जाता है पर उसकी आँखोंकी डलियाँ ज्यों की त्यों रह जाती हैं। वह न कभी घटती हैं और न बढ़ती हैं। यह निरञ्जनका स्थान सर्वदा समानरूपसे रहता है। सर्व शरीर सूख जाता है तथापि निरञ्जनकी ज्योति समान रूपसे रहती है। इसी कारण साधु लोग पहले अपनी दृष्टिको साधते हैं जिससे इधर उधर बहकने न पावे। आँखोंको एक स्थानपर स्थिर रखते हैं। जब आँखोंको अपने वशमें कर लेते हैं तब फिर मनको आधीन करते हैं। नेत्रोंके भटकनेसे मन सदैव अस्थिर तथा चञ्चल रहता है। जब यह मनही वशीभूत न हो तो अपने रूपका ज्ञान कैसे होगा ?

अन्धी आँखोंमें निरञ्जन मिट जाता है। जब उसका स्थानही नहीं रहता तो वह भी नहीं रहता। इस कारण जो अन्धा होता है उसकी बुद्धि अधिक होती है। अन्धा बिना देखे सब कुछ जान लेता है। अन्धेकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण होती है।

घोर निद्राको सुषुप्ति कहते हैं। वो दो प्रकारकी होती है। एक तो अज्ञान सुषुप्ति दूसरी ज्ञान सुषुप्ति। इन दोनों सुषुप्तियोंमें संसार नष्ट हुआ जान पड़ता है परन्तु संसारका बीज रहता है। यदि बीज न होता तो वही कदापि जाग्रत अवस्थामें न आता। इसी कारण जब ध्यानमें लीन होता है तब बड़ा प्रकाश उत्पन्न होता है। इस प्रकाशमें वासना तो दूर हुई जान पड़ती है पर वासनाका बीज नष्ट नहीं होता। ये मनके व्युत्थित होतेही फिर उसी रूपमें प्रगट हो जाती है। सदाकी तरह फिर संसारको उपस्थित करती है पर जब

उनकी बीज शक्तिका नाश कर दिया जाता है फिर वो जगज्जाल नहीं फैला सकती किन्तु जबतक इनकी बीज शक्ति नहीं नष्ट होती अवकाश पातेही मनकी एकाग्रताको मिटा देती हैं इस दशामें साधकको सच्चे गुरुकी आवश्यकता होती है ।

योगी योगयुक्तिसे समाधिके समयमें मनको वश कर लेते हैं पर समाधिके हरतेही मनकी वृत्तिसरूपता हो जाती है । बिना सच्चे गुरुकी कृपासे वासनाओंको नहीं मार सकता ये बड़ी प्रदल है अब हम वासनाओंकाही निरूपण करते हैं ।

मनके पाँच अहङ्कार

स्थूल, लिङ्ग, कारण, महाकारण और कौवल्य मनके ये पाँच अहंकार हैं इसीमें स्वामी सेवक देवता और पुजारी सभी बन्द हैं । इन पाँचों अहंकारोंसे बाहर निकलना कठिन है । जिसने इन अहंकारोंको बनाया है वह स्वयम् इन्हीं में ही फँसा है । सत्यगुरु बिना इसको कौन निकाले । बंधेको बँधा कैसे छुड़ावे । अन्धेको अन्धा क्या राह दिखा सकेगा । ये ही पाँचो अहंकार मनुष्यके बन्धनकी जड़ें हैं सब जीव इन्हींमें आवागमन किया करते हैं ।

१ स्थूल अहंकार—स्थूल अहंकारके अभिमानीमें यह कामना रहती है कि, पुत्र, गृह, धन, संसार, राग, रङ्ग, अच्छे अच्छे भोजन सौन्दर्य, सुगन्ध, सृंग अच्छे वस्तु, सवारी, शिकार और सम्भोग इत्यादि मिलें ये तो मिल जाय प्रसन्न होता है । नहीं तो दुःखी रहता है ।

२ लिंग अहंकार—लिङ्ग, कहो अथवा सूक्ष्म कहो । इस अहंकारवाले के मनमें यह रहता कि, स्वर्ग तथा बैकुण्ठके द्वारोंसे मिलूं । यंत्र मंत्र तंत्रादिकी योग्यता प्राप्त करूं । राजा इन्द्र इत्यादिके राज्यको प्राप्त करूं, उसकी विद्या जानूं जो यह सब मिले तो प्रसन्न रहता है न मिले तो दुःखी होता है ।

३ कारण अहंकार—कारण अहंकारवालेके मनमें यह ध्यान रहता है कि, योग समाधि वचन सिद्धि, प्राणायाम और प्रत्याहार, भूत, भविष्य, वर्तमानका हाल जाननेकी सिद्धि इत्यादि हों । दूसरोंकी देहमें समा जाना एकसे सहस्रों हो जाना, फिर सहस्रोंसे एक हो जाना, यह सब इसी अहंकारीके काम हैं । सुतरां जैसे शंकराचार्यजी संन्यासियोंके गुरु राजा अमरूकके शरीरमें समा गये और छः मास पर्यन्त रह आये वो इसीके बलसे रह आये थे ।

४ महाकारण अहंकार—महाकारण देहके अभिमानीको यह इच्छा होती है कि, योग वैराग्य, समाधि किया और उपरम, तितिक्षा, शम, दम, मुमुक्षताकी अवस्था और ज्ञान मिले । मैं ज्ञानी और मैं मुक्त हूँ । दूसरे सब बन्धनमें हूँ । केवल मैं छूटा हुआ हूँ । ऐसी अवस्था जब पूरी हो तो बड़ी प्रसन्नता हो और

न हो तो दुःख होगा । जब ज्ञान हुआ तो सर्व दुःख सुख भोगता है और समस्त सामर्थ्य रखता है ।

५ कौवल्य अहंकार—कौवल्य अहंकारवालेके देहमें यह ध्यान होता है कि, मैं अद्वैत ब्रह्म हूँ—मैं आत्मा अधिष्ठान हूँ यह जगत् जड़ तथा चैतन्य सब मेराही स्वरूप है । घड़ा और मिट्टी जल तथा लहर सुवर्ण और आभूषण सभी मैं ही हूँ । जब ऐसा भास हो तो प्रसन्न और न हो तो दुःखी हृदयके ये पाँच अहंकारोंमें नर तथा नाथ दोनों फँसे हैं । जो कोई इन पाँचों अहंकारोंसे पृथक् हुआ वो ही भवजालसे छूटा, इन पाँचों अहंकारोंमें ज्ञानी तथा ध्यानी सभी फँसे हुए हैं । इनसे बाहर निकलना असम्भव है । किसीने उन पाँचों अहंकारोंका भेद नहीं पाया । इस भवसागरमें तो यह पाँचों देह श्रेष्ठ हैं बाकी सभी निकुण्ट हैं ।

मनकी विषय वासना

अब मैं मनकी विषय वासनाके बारेमें लिखता हूँ जिसके कि, कारण सब मनुष्य कालपुरुषके जालमें फँसे हैं । इसकी पूजा कालपुरुषसे प्रगट हुई है । क्योंकि वह स्वयम् विषय वासनाको अच्छा समझता है । उसका निराकार शरीर पशुवत् वासना विशेष तृष्णासे मिला हुआ है । जितने विषयी हैं सब उसके दास हैं । जब चित्त वासनाओंकी ओर झुकता है तभी मन भी चञ्चल होता है उसी समय बाहरी भीतरी सब इंद्रियें चैतन्य हो जाती हैं, सूक्ष्मता दूर होके स्थूलता प्रगट हो जाती है । एकसे अनेक होता है । चौरासी लाख योनिके जीव उत्पन्न होते हैं । एक योनिसे दूसरीमें मारा मारा फिरता है । अधोकी तरह टटोलता फिरता है परन्तु कुछ भी हाथ नहीं आता । जैसे जल मथनेसे मक्खन नहीं निकलता, उसी प्रकार यह जीव जप तप तपस्या करके भी बिना ज्ञानके खाली ही रह जाता है । उसकी कहीं भी स्थिति नहीं होती । पाँचों देवताओंका शरीर वासनामय है इन्हींकी सन्तान समस्त संसार है । इस कारण यह समस्त संसार वासनाओंसे पूर्ण है । जो कोई वासनासे पृथक् होगा वही मनुष्यत्वको प्राप्त करेगा, वही मुक्तिका अधिकारी होगा । कितनेही ऋषि मुनियोंने कठिन तपस्या की पर जब उनपर काम क्रोधादिका प्रभाव हुआ तब वे पशुसे भी अधिक नीच हो गये । यहाँ तक कि, पशुओंकी योनिमें जाकर भी अशान्तही फिरते रहे ।

पारख गुरुके बिना समस्त धम्मोंके आचार्य काम क्रोधादिककी वासनामें फँस रहे हैं । जैसे कोई कुत्ता एक सूखा हाड़ अपने मुंहसे पकड़ लेता है । उसको

बड़े हर्षसे चबाता चाटता है वह हड़डी उसके मुंहमें घाव कर देती है उसके मुंहसे रक्त बहने लगता है। पर वह मूर्ख कुत्ता जानता है कि वह रक्त उस हड़डीसे निकल रहा है जिसे कि, वो बड़े स्वादसे चाट रहा है उसके मुंहमें हड़डी देखकर दूसरे कुत्ते दौड़ते लड़ते काटते तथा उसको छीन लेनेका उद्योग करते हुए मारते मरते हैं परन्तु उसको वह नहीं छोड़ता इसी प्रकार इस संसारके पदार्थ सूखी हड़डीके समान हैं। जो लोग इससे ग्रेम करते हैं तो सब संसारी कुत्ते हैं वे भी अपने शरीरके सारको नष्ट करते हुए अपनी आत्माके सुखको विषयका सुख समझ रहे हैं जो अप्सरा तथा गन्धर्वों तथा अमृत और कल्पवृक्ष आदिक स्वर्गीय पदार्थोंकी अभिलाषाये हैं। ये सब अत्यन्त तुच्छ एवं मायिक पदार्थोंकी ही हैं। मनुष्यका मन जबतक वासनाओंसे कलुषित है तब तक वह कालपुरुषका चेरा है। किन्तु इससे पृथक् होते ही अपने कर्तव्यको पूरा कर-लेता है।

गजल—आया जो तू बाजारमें फ़ैज आम कर फ़ैज आमकर।
सोदा करो मिल यारमें कुछ काम कर कुछ काम कर ॥
पकडा गया बेगार है तेरे सिरके ऊपर भार है।
तुझको बहुतसा कार है अज्जाम कर अज्जाम कर ॥
सरे आशकां बुरीदः है दिलवरको यह खुश ईदहै।
हरदीदनी नादीह है आराम कर आराम कर ॥
यह नफ़्त ऐन उन्नीस है आहनको मेकनातीस है।
बखुदा नहीं तकदीस है सम्सामकर सम्सामकर ॥
तेरे बरमें आजिज कोह रुवा सब खारो खस लिपटा गया।
अब छोडकर शर्मो हया सतनाम रर सतनाम रर ॥

यह वासनाही समस्त संसारका मुख्य कारण है। इससे मन उत्पन्न होता है, हृदयसे तीन लोक तथा चारों वेद बर्हिर्गत होते हैं। अब कुण्डलिनी शक्तिका भिन्न २ वर्णन किया जायगा। जो कि, वासनाओंके बीज जालकी मुख्य पोषिका है।

वासनाओंकी जननी

जिसका संक्षेपसे वृत्तांत में चक्र निरूपणमें कर चुका हूँ यही कुण्डलिनी वासनाओंकी जननी है, महामाया नाभी तले रहती है। यह समस्त संसारका कारण है इसीसे तीनों गुण हैं। उसके मुंहसे फुँफकारकी आवाज आया करती है। उसी सौपिनीकी फुँफकारसे सौहं शब्द बर्हिर्गत होता है। जिसके भीतर

प्रणव विराजा रहता है। इसी कुण्डलिनीकी फुँफकारसे यह मन चैतन्य होता है। मनके चैतन्य होतेही समस्त संसारकी उत्पत्ति होती है। कुण्डलिनी मायामाया वासनाओंसे भरी हुई है भाँति भाँतिकी सांसारिक वासनाएँही उसका विष हैं। जब उस कुण्डलिनीमें फुर्ना होती है तब मन प्रगट होता है। जब निश्चय हुआ तब बुद्धि उत्पन्न हुई और जब अहम् भाव होता है तब उससे अहंकार उत्पन्न होता है और जब चिन्तन करता है तब चित्त उत्पन्न होता है। जब स्पर्शके सन्मुख होता है तब वायु प्रगट होती है, जब देखनेकी ओर होता है तब अग्नि प्रगट होती है, जब रस लेनेकी इच्छा होती है तब जल उत्पन्न होता है। जब सृंघनेकी ओर ध्यान गया तब पृथिवी उत्पन्न होती है। पाँचों तन्मात्राएँ और चारों अन्तःकरण चौदह इन्द्रियाँ और सब नाडियाँ इसी कुण्डलिनीसे उत्पन्न होती हैं।

तीन प्रकारकी इच्छाएँ हैं। प्रथम—किसी वस्तुके मिल जाने और उसके पानेके निमित्त उद्योग करनेकी इच्छा। यह अज्ञानीकी इच्छा है।

दूसरी यह है कि दुःख और आपत्तिके पृथक् होनेकी इच्छा। यह बड़े अज्ञानीमें होती है।

तीसरी यह कि जो काम करना उसका फल चाहना। जब इच्छानुसार फल न हो तब उसके लिये चिन्ता तथा शोच होता है, यह एक साधारण है।

वासना चार प्रकारकी है। एक सुषुप्ति वासना है, दूसरी स्वप्न वासना है, तीसरी जागृत वासना है, चौथी क्षीण वासना है।

१—स्थावर अर्थात् वृक्ष पत्थर इत्यादिको सुषुप्ति वासना होती है।

२—पशुओंको स्वप्नवासना होती है। उनको वासनाका ध्यान भी नहीं होता।

३—मनुष्य तथा देवताओंको जागृत वासना होती है कि, वे वासनामें ही लगे रहते हैं। यह तो तीन वासनाएँ अज्ञानी जनोंकी हैं।

४—क्षीण वासना ज्ञानीकी है। जब वासना मर गयी किसी प्रकारकी इच्छा नहीं रही, तब संसार लय हो जाता है। संसार वृक्षका बीज वासना है। दसो दिशा संसारके पत्ते हैं। शुभ अशुभ कर्म उसके फूल हैं। मनुष्य पशु वृक्ष तथा पत्थर आदि उसके फल हैं। इस सृष्टिका बीज वासनाएँ हैं। इनके नष्ट करनेसे संसार भी नष्ट हो जाता है, वासनासे स्थिर रहता है। शारीरिक और मानसिक दो रोग हैं, दोनोंही वासनाओंसे उत्पन्न होते हैं। यही दो प्रकारके रोग हैं। शारीरिक रोगको व्याधि और मानसिक रोगको आधि कहते हैं।

शरीरकी व्याधि तो औषधी तथा पुण्य करनेसे दूर हो जाती है। जन्म मरणकी बीमारी, (आधि) मनकी स्वच्छतासे दूर होती है।

इस सौपिनीसे यह मन बड़ा बलिष्ठ तथा विबैला सर्प बना हुआ है। इसने समस्त संसारको ऐसा डंक मारा है कि, सबके सब मर गये। किसी को चेत नहीं होता। इस मन सौपके विषसे सब अचेत हो रहे हैं, इसी सर्पका विष तीनों लोकोंमें भरा हुआ है। इसी सर्पिणीके विषकी द्वारसे सर्व जीव ऐसे अचेत हो रहे हैं कि, जगानेसे भी नहीं जाग सकते। संसारमें जितने रोग शोक, दुःख, दरिद्र, कष्ट और आपत्ति हैं सब इस कुण्डलिनीसे हैं। प्राण अपान दोनों वायुको योगेश्वर लोग सुषुम्ना नाड़ीके मार्गसे ब्रह्माण्डमें पहुँचाते हैं। एक क्षणभर उस स्थानपर वायुके ठहरानेसे सिद्धोंका दर्शन हो जाता है।

नाभिके मूलमें सूर्य तथा तालुके मूलमें चन्द्रकी स्थिति है इस शरीरमें दो और कमल हैं एक नीचे और दूसरा ऊपर है। नीचेके कमलमें सूर्य रहता है। ऊपरके कमलमें चन्द्रका वास है चंद्रसे अमृत च्युता है सूर्य शोष लेता है। स्वाधिष्ठान चक्रके आगे महामाया कुण्डलिनी रहती है। जैसे मोतियोंका भण्डार हो ऐसेही कुण्डलिनी लक्ष्मी बड़ी सुन्दरताके साथ रहती है। जैसे डण्डेके साथ हिलानेसे सर्पनी शब्द करती है ऐसेही इस कुण्डलिनीसे सोहम्का शब्द वहिर्गत होता है। यही आदि शक्ति समस्त संसारका कार्य करती है। उससे आपसे आप जो वायु निकलती है वह वायु बहुत मुलायम है। वह वायु जो छूटती है फिर दो सूरतोंमें स्थिर होती है। एकका नाम प्राण तथा दूसरेका नाम अपान है। ये दोनों वायु आपसमें टक्कर खाती हैं। इसीको (हरारत गरीजी) कहते हैं। उसीसे हृदय कमलमें सूर्य समान महान् प्रकाश होता है। इस हृदय कमलमें सुवर्ण रङ्गका एक भौरा है। इस भौराके दर्शन करनेसे योगीकी दृष्टि लाख योजनाकी हो जाती है। पेटमें जो अग्नि रहती है उसको जठराग्नि कहते हैं। ऐसी ही वडवाग्नि समुद्रमें रहती है। यह दोनों अग्नि जलको शोषण करती हैं। हृदय कमलसे जो शीतल वायु निकलती है उसको चन्द्रमा कहते हैं। प्राण-वायु जो गर्म वायु है वह सूर्य है। इन दोनों अर्थात् सूर्य और चन्द्र करके यह समस्त सृष्टि स्थित हैं। कुण्डलिनीकी अचेतावस्थामें जीव वासना करके दुःखी सुखी होता रहता है। इसीसे भूख, प्यास, आलस्य, नींद, जरा, मरण आदि भीतरी और वाहरी दुःख हैं। इस कुण्डलिनीका विष समस्त संसार पर छाया हुआ है। जो इस कुण्डलिनीके भेदको जानता है वा इस सर्पके विषसे बचकर अमृत पीवे और युगयुग जीवे। इस नागिनका विष चारखानि चौरासी लाख

योनिके जीवोंमें सिरसे पाँव तक व्याप रहा है । इस सोंप तथा सोंपिनके वशमें सारा संसार है । इन्हींके विषसे सब जीव मृतक हैं । मृतकोंको जो चाहे सो करे वे क्या कर सकते हैं । यह नाग और नागिन पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों पर अधिकार किये हुए और सर्व शक्तिमान् कहलाते हैं । इन दोनोंक जालसे निकलकर कोई जीव बाहर जा नहीं सकता । इस कुण्डलिनीके विषने सबको अन्धा कर रखा है ।

शङ्खल

कहाँ मैं कहाँ दिलवर रहा यह नागिनी जब डस गयी ।
नहीं मैं नहीं वह घर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
जादू नहीं मंतर कोई अफसूँ नहीं यंतर कोई ।
उस डंक मारा मर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
यह दम्बदम लहरा गया तनमें जहर जब छा गया ।
इस जिन्दगीका खतरः रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
घेरे अँघेरी रात है और सद बला आफात है ।
शामका न सेहर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
अपना व बेगाना कहीं पहचानमें आवे नहीं ।
न बसर रहा न हजर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
इनसान सुम्-बकुम हुआ होशो हवासो गुम हुआ ।
दायम दिले मुजतर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
नहीं इल्म असर पजीर है कुछ ऐसीही तकदीर है ।
तदबीर कर बदतर रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥
आवे नहीं कोई काम जब आजिज जपो सतनाम तब ।
जारी न जोरो जद रहा यह नागिनी जब डस गयी ॥

ये नाग नागिनी एक है समस्त संसारको इन्होंने काट खाया है । जो कोई सच्चा साधु होकर गुरुकी सेवा करेगा उसपर इस सोंपका विष असर न न करेगा । साधु सेवा अवश्यही सत्यपथपर आरूढ़ कर देगी । कभी भटकने न देगी । जहाँ साधु और गुरुकी सहायता न होगी वहाँ कदापि जीवका छुटकारा न होगा ।

जितने शब्द, नाद और वाक्य इत्यादि हुये और होते हैं सब इन्हीं दोनोंसे हैं । कोई वाक्य और शब्द इत्यादि बिना इन दोनोंके नहीं हैं । केवल इस एक सोंपिनीने अपनीही मूर्तियाँ बनाईं । इस मनको मनु अथवा स्वयम्भु मनु कहो

और माया इसकी स्त्री सतरूपा हुई जो मन है उसीको अंग्रेजी भाषामें मैन (Man) कहा हैं। जिसको मनुष्य कहते हैं सोही मन या मैन है। जबतक यह अकेला था तबतक कुछ कर न सकता था। फिर जब दूसरा स्वरूप उसके साथ हुआ तब उसका नाम स्त्री अथवा अंग्रेजी भाषामें वोमैन (Woe-man) अथवा (Woman) हुआ। इस (Man) के शब्दमें (Woe) बढ़ाया तब वोमैन हुआ। वो के अर्थ कष्ट तथा आपत्तिके हैं। जब मैनके (Man) साथ (Woe) वो मिला तब कष्ट तथा दुःखसे भर गया जब मैनके (Man) साथ वो (Woeman) मैन हो गई तब एकसे अनेक हो गया। तब संसारके जाल जञ्जालमें फँसकर बँधुआ हो गया। वही नागिनी कष्ट तथा आपत्तिका घर हुई। फारसीमें इसका नाम जन हुआ। जनका अर्थ मार—वह समस्त संसारको मारने और खाने लगी। संस्कृतमें इस औरतको अस्त्री कहते हैं। अ शब्दको विलोपित करनेसे स्त्री हुआ। यथार्थमें यह शब्द अस्त्री है। स्त्री नहीं।

अस्त्र और शस्त्र ये दो प्रकारके हथियार हैं। बन्दूक कमान इत्यादि अस्त्र कहलाते हैं क्योंकि इनमें एकमेंसे दूसरा निकलकर घाव करता है। बन्दूक नहीं मारती पर गोली मारती है। कमान नहीं मारती पर तीर मारता है। इस प्रकारके समस्त हथियार अस्त्र कहलाते हैं। तलवार, कटार, छुरा आदि शस्त्र हैं जो कोई अस्त्र बाँधता है उसे अस्त्री कहते हैं और जो शस्त्र बाँधता है उसको शस्त्री कहते हैं। अतः इस स्त्रीने अस्त्रको बाँधकर समस्त संसारको मार डाला। उसके ये पाँच अस्त्र हैं—मोहन, मारन, वशीकरण, उन्मादन, उच्चाटन, मोहन, वशीकरना-मारन, मार डालना। वशीकरण—गुलाम बना लेना। उन्मादन—पागलोंके समान बकना झकना। उच्चाटन—कुछ अच्छा न लगना। इस स्त्रीके ये पाँचों तो हथियार हैं। बेटी बेटे जितने उत्पन्न होते हैं सबके सब मोहमें फँसाकर मार लेते हैं। समस्त जन्म फँसाकर यह मार लेती है। इसी मन तथा मायाका समस्त खेल फँल रहा है। मन आकाश और निरञ्जन है। माया शक्ति और पृथिवी है। इसीसे सबकी उत्पत्ति है। इसी ब्रह्म तथा मायाकी रचनासे समस्त संसार है। इन दोनों विषयोंकी सन्तान तो सभी हैं और इन्हींका विष सबमें समा रहा है। विशेषतः यह स्त्री जो मोहिनीरूप है। इसने सबका मन मोह लिया है। जो इस मोहिनीसे बच जावेगा वह बड़ा बलिष्ठ तथा भाग्यवान है। जो स्त्रीको छातीसे लगावे वह भली भाँति याद रखे कि, उसने विषेली काली नागिनको हृदयसे लगाया है। जब यह नागिन हृदयसे