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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मुहम्मद साहिबका जलाली खुदा मुहम्मद बोधका संक्षेपसार

यह बात सुनकर काजी तथा पण्डितगण अतिप्रसन्न हो प्रशंसा करने लगे कि, आप क्यों न ऐसे हों बाहवा ! आपसे सब कुछ होगा अब आप कृपा करें कि, यह जोलाहा किसी प्रकार मारा जावे ।

शेखतकीका कबीरजीको मरानेका प्रयत्न ।

यह बात सुनकर शेखजी बादशाहके पास जाकर कहा कि, ऐ सुलतान ! तू मेरा कहना मान ले । इस जोलाहेके प्राणघातकी आज्ञा देवे । इसने बड़ा कुफ्र मचाया है । यदि तू इसको मरवा न डालेगा तो मैं तुझको शाप बूंगा जिससे तेरी सम्पत्ति तथा तेरे प्राणका विनाश हो जावेगा ।

शेखतकीके कबीरजीपर जुल्म ।

यह बात सुनकर शेखजीको बादशाहने समझाया कि, ऐ पीरजी ! आपने तो मुझसे कई बार कहा था कि, पीर फकीर स्वयम् परमेश्वर हैं । तब आप क्योंकर कबीर साहबके प्राणघातके निमित्त आग्रह करते हैं । उन्होंने तो आपकी कोई क्षतिही नहीं की है फिर आपने क्यों ऐसा कुफ्र मचाया है ।

कबीर सागर न. ७ पृ. ६७ बोध सागर ।

कहो कबीरके मारन ताई । कुछ न हमारो यहाँ बसाई ॥
पीर फकीर जात अल्लाहा । मेरो जोर न पहुँचे ताहा ॥

साखी ।

जो वह होते रैयत, तो हम करते जोर ।
वह अलमस्त फकीर है, तहाँ न फावै मोर ॥
तुमहूँ कही समझाय, पीर फकीर अल्लाह ।
अब तुम कहते मारने, यह न होय हम पाह ॥

रमैनी ।

अहो पीरजी तुम वह एका । अपने मनमें करो विवेका ॥
इन कुछ तुमरो नाहि बिगारा । काहे तुमने कुफ्र पसारा ॥
बुजुर्ग सब नेकी फरमावे । जोर जुल्म कुछ ताहि न भावे ॥

साखी ।

कहा हमारा कीजिए, छोड़ दीजिए रार ।
सुलह कुल्ह दे बैठिए, अल्ला ओर निहार ॥
कहे तकी सुलतान सुन, तुझे नहीं कुछ दुःख ।
जो मैं कहूँ सो मानिए, कर मेरो सन्तोष ॥

कहे सिकन्दर पीर सुन, मेरो शिर वरु लेहु ।
फक्कड़ कबीर न मारिए, यह माँगे मोहि देहुं ॥

रमैनी ।

सुन्ते ही तकी क्रोध प्रजारा । शिरसे ताज जमींपर मारा ॥
निपट विकल देखो तेही भाई । तब हम शाहसे कहा बुझाई ॥
कहैं कबीर सुनो सुलताना । करो पीरको वचन प्रमाना ॥

साखी ।

पीर कहे सो करो तुम, हमें नहीं कुछ त्रास ।
हमहूं कहें सत नाम बल, कहें कबीर सुदास ॥

रमैनी ।

कहै सिकन्दर सुनोजी पीरा । मन मानैं सा करो कबीरा ॥

साखी ।

डारो मार कबीरको, हम नहि मानैं ऊन ।
ताका कबहु न भलाहो, जो करे फक्कड़का खून ॥

रमैनी ।

शेख तकी तब कहे रिसाई । है कोई बाँध कबीरा भाई ।

साखी ।

शेख तकी आपै उठ, काजी पण्डित झार ।
बाँध बाँध सब कोई कहै, कोइ न करे गोहार ॥
बाँह बाँध पग बाँधके, बोर गङ्गजल नीर ।
नहि संशय निश्चिन्त होइ, निभंयदास कबीर ॥
गङ्गजलपर आसन, बंद परे खहराय ।
जिन कबीर सत नामबल, निभंय मङ्गल गाय ॥
शाह सिकंदर देखही, औ ढाढ़े सब लोग ।
धन्य कबीर सब कोई कहै, शेख तकी भा सोग ॥

रमैनी ।

शेखतकी तब मीजें हाथा । सूखे मुँह नहि आवै बाता ॥

साखी ।

शाह सिकन्दर जोर कर, कहै सुनो तुम पीर ।
किसको बाँध डुबाव है, निभंयदास कबीर ॥

(देखो ग्रंथ कबीरसागरनं. ११ कबीरचरित्रबोध तथा दूसरे ग्रन्थोंमें) तब शेखने कहा, मैं जानता हूँ कि, कबीरने जादू किया है इस कारण वह नहीं डूबा है। यदि अबकी बार मैं कबीरको पाजाऊँ तो अग्निमें जलादूँ—यदि वह अग्निसे बच जावेगा तो मैं उसको परमेश्वरका सत्य अंश समझूंगा। उसी समय कबीर साहब गङ्गासे बाहर निकल शाहसिकंदरके निकट गये आपके देखतेही शाह उठ खड़ा हुआ और अत्यंत मान संप्रभम सहित कबीर साहबको अपने बराबर आसनपर बैठा लिया। यह देखके पूर्वोक्त शेख अत्यंत क्रुद्ध हुआ। उसके नेत्र रक्तवर्णके होगये, कहा कि ए, कबीर ! तूने जादू किया है इस कारणही जलमें नहीं डूबा। तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ शेखजी ! जैसे आप कहो बादशाह बोला कि, आप मुझे कबीरके मारनेके लिये कहते हैं पर इसमें मेरा कुछ वश नहीं है क्योंकि, पीर और फकीर परमात्माकी जात हैं वहां मेरा जोर नहीं पहुंच सकता। यदि वो रैयत (प्रजा) होते तो मैं जोरभी करता वो लापरभा फकीर है वहां जोर करना शोभा नहीं देता। आप ही तो यह समझकर कहा करते थे कि, पीर और फकीर परमात्मा हैं अब आप इस फकीर कबीरको मारनेके लिये कहते हैं यह मुझसे नहीं हो सकता। आप और वो एकही तो हैं यह अपने मनसे विचारो उसने तो आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ा है। आप उसपर क्यों गजब करना चाहते हो, बड़े लोग नेकी बताया करते हैं, उन्हें जोरो जुल्म नहीं अच्छे लगते। आप मेरी बात मानलें लड़ाई छोड़ दें परमात्माकी ओर देखकर मेल करलें। यह सुन तकी बोला कि, ए सुलतान ! तुमें कोई दुःख न होगा मैं कहूं सो मानकर मेरा सन्तोष कर। यह सुन सिकन्दर बोला कि, चाहे मेरा शिर लेलीजिये पर फक्कड़ कबीरको न मारो, मैं यह मांगता हूँ मुझे देदीजिये। यह सुन तकौने क्रोधमें आ आपने ताजको जमीपर दे मारा। कबीर दासजी कहते हैं कि, जब हमने शाहको व्याकुल देखा तो कह दिया कि, ए सुलतान ! अब पीरका कहा करें हमें इसमें कुछ भी त्रास नहीं है मैं इसी तरह कह रहा हूँ यह भी बात नहीं है किन्तु सत्य नाम (श्रीराम नामके बलपर) कहता हूँ क्योंकि, मैं भी उसका ही दास हूँ। यह सुन बादशाहने कह दिया कि, जो चाहे सो कबीरका करलो, आप मार डालों हम कुछ भी बुरा न मानेंगे पर जो साधुको मारता है उसका भला नहीं होता। क्रोधमें आकर शेखतकीने कह दिया कि, कोई है जो कबीरको बांधे। आप शेखतकी उठ खड़े हुए तथा सभी काजी पंडितभी बांध २ कहने लगे। किसीनेभी नहीं कहा कि, देखो विचारो। हाथ पैर बांधकर गंगाजीमें बार दिया, पर, कबीरजीको इसमें कोई संशय नहीं हुआ। आप गंगाजलके ऊपर आसनबांधे दीखे