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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

राजा भूपाल

यह स्वयम्पाकी थे, लकड़ियाँ भी धो धोकर जलाया करते, जिस समय धर्म-दासजी (मथुरामें) रसोई बना रहे थे उस समय कबीर साहब जिन्दा फकीरकी, सूरतमें सामने दिखलाई दिये, उसी समय धर्मदासजीने क्या देखा कि, आगमें जो लकड़ियाँ जल रहीं थीं उनमें से बहुतसी चीटियाँ निकल रही हैं। कुछ चीटियाँ जलभी गईं थी, बाकीको जल्दीसे चूल्हेके बाहर निकाल लिया। बड़ा खेद किया कि, इतनी चीटियाँ जल मरें। यहाँ तक कि, खेदवश उस दिन भोजन भी नहीं किया। कबीर साहब बोले कि, हे धर्मदास ! तुम रोज भगवानकी मूर्त्तिकी पूजा करते हो, तुमने उस समय इनसे न पूछ लिया कि, इन लकड़ियोंके भीतर क्या है ? धर्मदासजीने कहा कि, यदि भगवानसे पूछ लेता तो ऐसा पाप क्यों करता ? धर्मदास साहबको अपने पापका बड़ा दुःख हुआ देख कबीर साहबने गुप्त ज्ञान की बातें सुनाई, जिनको सुनकर धर्मदासजी कुछ अनुरागी हुए। पीछे जिन्दा-बाबा मथुरा नगरसे विलुप्त होगये, बनारसमें आ पहुँचे, धर्मदासको बड़ा प्रेम उत्पन्न हुआ, मथुरा नगरमें बहुत खोजा परन्तु न पाया। जब सत्यगुरुको न पाया तब मनमें बड़ी बिथा उपस्थित हुई कि, अब जिन्दा फकीरको कहाँ ढूँढ़ूं ? इसी सोचमें सत्यगुरुको स्थान स्थानपर ढूँढ़ने लगे, भण्डारे करने लगे, बहुत साधुओंको बुला बुलाकर भोजन देने लगे; इस ध्यानसे कि, हमारे भण्डारेमें दूसरे साधुओंके साथ जिन्दा बाबा भी आ जावें। बहुतही युक्तियाँ की तो भी जिन्दा बाबाका दर्शन नहीं हुआ, नगर नगरमें ढूँढ़ते फिरे कि, किसी प्रकार भी जिन्दा फकीरकी खबर मिले पर कहीं पता नहीं लगा। इसी प्रकार ढूँढ़ते २ बनारसमें पहुँचे तो देखा कि, एक स्थानपर कबीर साहब खड़े बक्तूता दे रहे हैं। चारों तरफसे बड़ी भीड़ खड़ी २ सुन रही है। तब उस भीड़को चीरकर धर्मदासजी भीतर घुसे। देखा तो कबीर साहब खड़े लोगोंको शिक्षा दे रहे हैं, पर बनारसमें कबीर साहबका जिन्दा भेषके स्थानमें वैष्णव भेष था। कण्ठी, तिलक, माला, जनेऊ और धोती इत्यादि देखकर धर्मदासको मनमें कुछ सन्देह उत्पन्न हुआ परन्तु पहचान लिया कि, यह वही जिन्दा बाबा हैं; जिसके कि, प्रेममें मैं पागलके समान हो रहा हूँ। सत्यगुरुको पहचानकर चरणोंपर गिर पड़े कहा कि, हे सत्यगुरु ! मुझको आप अपने शरणमें लीजिये कबीर साहबने कहा कि हे धर्मदास ! तुम बड़े भाग्यवान् हो कि, तुमने मुझको पहचान लिया। अब मैं तुम्हारे जनम मरणका दुःख दूर करूँगा। पश्चात् धर्मदासजी सद्गुरुको अपने मकानपर बांधो गढ़ लेगये।

सद्गुरुने विधि पूर्वक चौका आरती करके दीक्षा दिया, उस, समय धर्म-दासजीके पास छप्पन करोड़ रुपया था। वह सब सद्गुरुके भेंट किया। सद्गुरुने वह सब रुपया भूँखे, नंगे, लूले, अंधे, गरीब तथा सन्त साधुओंमें लुटा दिया।

पीछे धर्मदास साहबने वैराग्य लिया । सद्गुरुके उपदेशको धारण कर परंधामको पहुँचे, उनके वंशको साहबने गुरुवाई प्रदान की, जो बयालीश वंशके नामसे प्रसिद्ध है; ये ही वर्तमान कबीरपंथके प्रवर्तक हैं । कबीरपंथी अपनी अपनी आजकी नूतन कृतियोंको भी प्रायः उन्हींके नामपर बनाते हैं यह उनके नामकी महिमा है ।

कबीर साहिब तथा धर्मदासजीमें सदा धार्मिक संवाद ही हुआ करते थे । सद्गुरु धर्मदाससे खुली बातें करते थे । अणुमात्र भी अपने स्वरूपको नहीं छिपाते थे । यहां उनकी बात चीतोंकी साखी रखता हूं ।

साखी — हम साहब सत्यरुष हैं, यह सब रूप हमार ।

जिन्द कहे धरमदाससे, सत्य शब्द घनसार ॥

सकल सृष्टिमें रमि रहा, हूं सब जात अजात ।

गरीब दास जिन्दा कहे, मेरे दिवस न रात ॥

बोले जिन्द कबीर जी, सुनु वाणी धरमदास ।

हम खालिक हम खलक हैं, सकल हमार प्रकाश ॥

गरुड़बोध बेदी रची, राम कृष्ण हैरान ।

लंकापर धाये जबे, तब का करूँ बखान ॥

दुर्वासा मुनि इन्द्रका, हुआ ज्ञान संवाद ।

दत्त तत्त्वमें मिल गये, जा घर वेद न बाद ॥

गरीब-सिख बन्दी सद्गुरु सही, चकवै ज्ञानअमान ।

शीश कटा मन्सूरका, फेरि दिया जिव दान ॥

धर्मदासजीकी तरह गरीबदासजी भी सद्गुरुके चरणोंके दासही रहे हैं ।

उनकी श्रद्धाको सूचित करनेवाले कुछ पद्य उद्धृत करता हूं —

सर्वांगकी साखी ।

गरीब-नामोंको सद्गुरु मिले, देवल देता फेर ।

पण्डा तो इतही रहा, शब्द कहा हम टेर ॥

गरीब-रबिदास रसायन पीवते, झूले धरे अनन्त ।

चलत बार पाये नहीं, धन्य सद्गुरु भगवन्त ॥

संगतअङ्गकी साखी

गरी-ऐसी सङ्गति जो मिली, भक्ति गही प्रह्लाद ।

नारदसे सद्गुरु मिले, सूझी अगम अगाध ॥

धर्मदास साहबके खास मुख वचन मंगल धेला ।

प्रगट होनेकी-साखी ।

प्रगट हंस उबारने, मनमें कियो विचार ।
जेठ मास बरसातमें, पगधारे चँदबार ॥
चहुँ दिशि दमके दामिनी, श्वेत भँवर गुञ्जार ।
तहवौ आप विराजिहैं, जल पर सेज सँवार ॥
बालक कोठिन ठाठके, निकट सरोवर तीर ।
सुर नर मुनि जन हरषिया, साहब धन्यो शरीर ॥
चंदन साहुकी स्त्री, स्नान करन को जाय ।
सुन्दर बालक देखिके, कर गहि लियो उठाय ॥
प्रेम प्रीति करले चली, हँसत खेलत घर आय ।
चन्दन देखि रिसावई, तुम बालक कहाँ पाय ॥
बालक मोहि कर्ता दियो, सुनो साहु सतभाउ ।
यह बालक प्रतिपालिहैं, चलै तुम्हारो नाँउ ॥
डार डार यह बालक, मानो बचन हमार ।
सजन कुटुम्ब हाँसी करें, हँसि मारे परिवार ॥
यह बेश्याका बालका, सो तू लाई नार ।
लोग कुटुम्ब सब देखी हैं, तुमको देही बडार ॥
दासी हाथ बालक दियो, जलमें दीन्हों डार ।
देह धरे दुख पायो मैं, चेतो मूढ गँवार ॥
नीरू नाम जुलाहा, गमन किये घर आय ।
तासु नारि बड भागिनी, जलमें बालक पाय ॥
नीरू देखि रिसावही, बालक दे तू डार ।
सजन कुटुम्ब हाँसी करे, हँसि मारे परिवार ॥
जब साहब होँकारिया, ले चल अपने धाम ।
मुक्ति संदेश सुनाइहौं, मैं आयों यहि काम ॥
पूर्व जन्म तुम ब्रह्म ना, सुरति बिसारी मोहि ।
पिछिली प्रीति के कारने, दर्शन दीनों तोहि ॥
कर गहि वेग उठाइयाँ, लीन्हो कण्ठ लगाय ।
नारि पुरुष दोउ दरशिया, रङ्ग महाधन पाय ॥
भाव भक्ति करि ले चले, काशी नगर मझार ।
धन्य, भाग्य उस देशका, सद्गुरु जहाँ पगधार ॥