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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

योगी और संन्यासियोंका सिद्धान्त कबीर पन्थियोंका सिद्धान्त

जा बैठे। अब बाहर निकलना कठिन हो गया क्योंकि, मुहम्मद साहबके पास एकही जामा था जो यहूदिनको दिया था।

उसी समयसे आकाशसे वही (आकाशवाणी) हुई कि, आवश्यक पदार्थ किसीको मत दिया करो मुहम्मद साहब ऐसे उदार थे कि, कभी २ स्वयं भूखे रहते थे, कभी बिना नमकके शाक खाकर रह जाते थे, कभी भूखसे व्याकुल हो जानेपर पेटपर पत्थर बांधकर पड़े रहते थे नमाज और अपना नित्य नियम भी किया करते थे कबीर साहबने भी मुहम्मद साहबके संतोष और उदारताकी प्रशंसा की है। ईसाभी वैसेही उदार और संतोषी थे। इन्जीलमें दान आदि करनेकी आज्ञा है पर उसपर कौन चलता है? अपने २ आचार्य और गुरुकी आज्ञा उल्लंघन करनेके कारण सब धर्मवाले अधर्मी हो गये हैं, उनका अन्तः-करण अन्धकारमय हो गया है, ये प्रकाशको देख भी नहीं सकते। जो कोई सच्चे संत और सद्गुरुकी संगति सेवा भक्ति छोड़ेगा उसकी यही गति होगी क्योंकि सच्चे विद्वानों सदाचारियों संतों और सत्यगुरुओंकीही कृपासे ज्ञान प्राप्त होकर उभयलोकका आनन्द प्राप्त होता है, जहाँ सत्संग और विवेक विचार एवं संत और गुरुकी सेवा न होगी वहाँ अज्ञानता और भ्रम होगा।

साधुओंकी स्थिति।

यदि कोई गृहस्थ अथवा प्राकृतिक मनुष्य साधुओंका ज्ञान और शुभ्रूषा न करे, उन्हें कुछ न दे तो भी साधुओंको अपना भजन नहीं छोड़ना चाहिये पेटके लिये अपने अमूल्य समयको नष्ट कर आत्मविचारसे रहित रहना महान् पापका काम है। पेटके लिये अपनी प्यारी आयुको नष्टकर ईश्वरसे विश्वास खो, गुरु विमुख न होना चाहिये।

प्रभु ऐसा विश्वम्भर है कि, सीमूर्ग जैसे पक्षीको भी बैठेही बैठे भोजन देता है। यह पक्षी काफ पर्वतपर हुआ करता है। उसका शरीर बहुत बड़ा होता है। वह इतना बड़ा होता है कि, यदि कभी अपने परोंको फड़ फड़ावे तो तूफान आजावे। इसी कारण सदा एकही स्थानपर पड़ा रहता है। परमात्मा उसके जीवन निर्वाहका प्रबन्ध इस प्रकार करता है कि, उसके चारों तरफ चार २ कोशतक घास तैयार रखता है जब सीमूर्ग भूखा होता है तो अपने चारों ओरकी चार कोशतककी घास चर जाता है सबेरे दूसरे दिन फिर ज्योंका त्यों घास पहिलीसीही तैयार हो जाती है। इस तरह परमात्मा उसकी रक्षा करता है। इसी तरह संसारमें कोई जीवधारी नहीं जिसको कि, विश्वम्भर भूखा रखता हो। प्रभु नित्य सबको समयपर भोजन पहुँचाता है। इसी कारण साधुओंका भी उसी

विश्वम्भरका विश्वास रखकर अपने धर्मपर स्थिर रहना चाहिये । कोई क्यों न हो जबतक अपने कर्तव्यपर दृढ़ और स्थिर रहेगा, सुखसे रहेगा, जब अपना धर्म (कर्तव्य) छोड़कर पराये, धर्ममें प्रवृत्त होगा अवश्य दुःख और कष्ट भोगेगा ।

तीसा यन्त्रकी साखी ।

अपने २ धर्ममें सबको सुख उपजे सब काल ।
जिन निज धर्म दृढ़कै गह्यो तेई भये निहाल ॥

अध्याय २३

गजलोंसे उपदेश

गजल ।

न पावे राह कोई साधु गुरु बिन । दिखावै चाह सूली साधु गुरु बिन ॥
बजारी जोर घर हरगिज न पावै । हो नालः आह सदहा साधु गुरु बिन ॥
करे तदबीर सदहा गर शबो रोज । गदा और शाह नहिं कोई साधु गुरु बिन ॥
कवाकिब ओर सवाबित सब खड़े हैं । मेहर और माहनहिं कोई साधु गुरु बि०
बहर जानिव तमाशा साधु गुरुका । न क़िबला गाह पावै साधु गुरु बिन ॥
जिधर जावे उधर हैरांही आजिज । न हो आगह आदम साधु गुरु बिन ॥
गजल— चल उतर पार साधु सेवासे । पावै खुद यार साधु सेवासे ॥
होवे हरदो जहामें बख्तावर । गुल होवे खार साधु सेवासे ॥
जहां न पहुँचे कोई तू जाय वहां । पेश सरकार साधु सेवासे ॥
अक्ले इन्सानकी है रसा न जहां । पहुँचे दरबार साधु सेवासे ॥
पावै बहु न्यामत न जाने कोई । अस्ल इसरार साधु सेवासे ॥
बस्ल बेशक हो अस्ल अपनेसे । कुलके करतार साधु सेवासे ॥
आवे हरगिज न कालके पञ्जे । हो छुटकार साधु सेवासे ॥
पागलोंका जो घर है भवसागर । छोड़ संसार साधु सेवासे ॥
आगके घरमें आपड़ा आजिज । होवे गुलज़ार साधु सेवासे ॥

अटका जो काली धार हो, सत्गुरु न जिसका यार हो ।
हरगिज न बेड़ा पार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
सल्लाह नहिं मल्लाहसे, मुहूरिभ नहीं उस राहसे ।
इस बहर में न करार हो, खिदमत बिना गुरु साधु की ॥
गुरु साधुको जो सेवता, पावे सो पूर्ण देवता ।
रहबर न सो सत्तार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥