कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बालक कबीरकी ज्ञान कथनी और गुरुकी पूछ गुरु करनेका वृत्तान्त (वू. क. कसोटी)
मुझको पहिचान लिया। उनके मनमें निश्चय हो गया कि, कबीर साहब कोई सिद्ध तथा श्रेष्ठ पुरुष हैं। वहाँसे पलटे और कबीर साहबके पास आकर कहने लगे कि, मैंने सुना था कि, कबीर साहब बड़े सिद्ध हैं, इस कारण मैं आपका साक्षात् करने आया था। अपने द्वारपर हराम बाँध रक्खा है—यह कैसी घृणित बात है? यह बात सुनकर कबीर साहबने उत्तर दिया कि, ऐ जहाँगशत-शाह! मैंने हरामको अपने गृहके बाहर बाँध दिया है मेरे भीतर तनिक भी नहीं रहा—आपने हरामको अपने भीतर बाँध रक्खा है। फिर बाहर निकाल देना अच्छा कि, भीतर बाँध रखना? क्योंकि, क्रोध अहंकार भद आदि सब हराम हैं, वे तुम्हारे भीतर हैं। जिसको तुमने हराम समझा हैं—वह हराम नहीं, बरन् क्रोध हराम हैं। इस शिक्षासे जहाँगशतशाह प्रसन्न हो गए—संध्याका समय निकट आया जहाँगशतशाहने इच्छा प्रगट की कि, मैं भवकाममें निभाज पढ़ना चाहता हूँ। कबीर साहबने एक पलभरमें भवका पहुँचा दिया। जिन सिद्धोंके बीच जहाँगशतसे जाया न जाय वहाँभी कबीर साहबने उनको पहुँचाया—तब जहाँगशत अधीन हुए।
रामदास नामक एक धनाढ्य जागीरदार ब्राह्मण था वह दक्षिण देशमें नर्मदा नदीके किनारे रहता था। स्नान करनेके लिये गया तो वहाँ उसे कबीर साहब बैठे मिले। उसने उनसे निवेदन किया कि, महाराज! आप समर्थ हो, मुझको विष्णुका दर्शन कराओ, तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि, कल दोपहरको विष्णु तुम्हारे घरपर जावेंगे। यह बात सुनकर रामदासको निश्चय हो गया कि, कबीर साहबका बचन हो गया है अब कल मेरे घर अवश्यही विष्णु आवेंगे। तब उसने अपने घर जाकर बड़ी तैयारी की। दूसरे दिवस गृहको भली-भाँति स्वच्छ और पवित्र करा बिछौने इत्यादि बिछवाए। नाना प्रकारके स्वादिष्ट भोजन बनवाये। सिंहासन इत्यादि प्रस्तुत कराए। प्रतीक्षा करते हुए बैठे कि, अब विष्णुमहाराज आया चाहते हैं तो कुछ कालके उपरान्त देखा कि, एक भँसा कीचड़से लतपत होकर आया और उस फर्शके ऊपर बैठ गया। रामदासको अत्यंत क्रोध आया कि, इस भँसेने फर्शको बिगाड़ दिया। सोटा लेकर इस भँसेको मार भगाया। उस भँसेको भगाकर फिर विष्णुके आनेकी प्रतीक्षा करने लगे। समस्त दिवस व्यतीत हो गया पर कोई नहीं आया। वह ब्राह्मण निराश हुवा। प्रातःकाल नदी स्नानके निमित्त गया। फिर उसी स्थानपर कबीरको बैठो देखकर कहा कि, महाराज! मुझको विष्णु महाराजका दर्शन तो न हुवा!
आपकी बातें मिथ्या कैसे हों ? कबीर साहबने कहा कि, ए रामदास ! मेरे कथनानुसार विष्णु तुम्हारे घर गए । परन्तु तुमने अच्छी विष्णुपूजा की । सोटे मारकर भगा दिया । यह बात सुनकर वह ब्राह्मण लज्जित तथा दुःखी हुआ । क्योंकि विष्णुभक्त था । जान लिया कि, विष्णु भैंसाके स्वरूपमें थे । वह भक्त तो था, परन्तु भक्तोंकैसे गुण उसमें नहीं थे कि, अपने प्रेमीको प्रत्येक वस्तुमें देखे इस कारण विष्णुदर्शनसे वञ्चित रहा ।
कमालको कबीर साहबने मुरदासे जीवित किया उसीका (बोधसागर-मेंका यह दोहा है —
दोहा—मुरदासों जिन्दा किया, दिलसों दीन मलाल ।
शाह परतीत दिखाइयाँ, उत्पन दास कमाल ॥
तब शेखतकीने कहा कि, मैं इस लीलाको नहीं मानता । कारण यह कि, यह लडका अचेत था । इस कारण जीवित हो गया । मेरी बेटी आठ दिवसोंसे कन्नमें मरी पड़ी है । जब आप उसको जीवित करें तब मुझे विश्वास हो । कबीर साहब सिकन्दर शाह और शेखतकीके साथ उस लडकीकी कन्नपर गए । कबीर साहबने पुकारा । उठ शेखतकीकी बेटी ! वह नहीं उठी । फिर कहा कि, उठ शेखतकीकी बेटी ! फिरभी वह न उठी तब तीसरी बार कबीर साहबने कहा उठ कबीरकी बेटी ! उस समय वह लडकी जीवित होकर कन्नसे निकल पड़ी । शेखतकी उसके जीवित होनेपर उसका हाथ पकडकर अपने घर ले चले । उस लडकीने कहा कि, मैं तुम्हारे नामसे जीवत नहीं हुई हूँ । बरन् कबीर साहबके नामसे उठी हूँ । मैं कबीर साहबकी बेटी हूँ । मैं इनके साथ रहा करूँगी । तुम्हारे गृहपर न जाऊँगी । वह लडकी कबीर साहबकी बेटी विख्यात हुई ; और उसका हृदय सत्यगुरुकी कृपासे प्रकाशित हो गया ।
कबीर कसोटीमें लिखा है कि बादशाहने तेरह गाडी कोरी पुस्तकोंकी
१ कबीर कसोटीमें लिखा हुआ है कि, किसीके यहाँ एक लडकी मर गई थी, लडकीके वापसे कबीरजीने उस मृत बालिकाको माँगा । पर उसने न दी । जब उसकी पत्नीको यह समाचार मिला तो उसने उसको कबीरजीके पास भेज दिया । कबीरजीने उसे जिन्दा करके कमाली नाम रखा कमालबोधमें लिखा हुआ है कि, "शेखतकी हरसे मनमाई, लाय कमाली भेट चढाई" यह लिखा मिलता है । इससे यह प्रतीत होता है कि, कबीर साहबके पास पुत्रीके रूपमें रहनेवाली एक कमाली ही है । कबीरकसोटी पृ. ३० में शेखतकीने बादशाहसे कहा है कि, यहाँसे जगन्नाथकी आग बुझाना क्या है, उसने अभी लडका और एक लडकीको जिन्दा किया है । इन बातोंके देखनेसे यह अवश्य ज्ञान होता है कि विज्ञ पाठक इस प्रकरणको सर्वत्र विचार करके पढ़ें, कमाली पुत्री थी वा नहीं यह प्रश्न इतिहासके गर्भमें अन्तर्हित है । कमालीकी दिव्य वाणीही इस बातको बता रही है, कि, उसके हृदयमें पूर्ण प्रकाश हो चुका था ।