कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
समस्त धर्मोंका वृत्तान्त
नाद, कहाँ बसे ब्रह्म, कहाँ बसे हंस, कहाँ बसे जीव, कहाँ बसे शिव, कहाँ बसे अविनाशी, कहाँ बसे काल ?
अविनाशी वचन—हृदय बसे मन, नाभि बसै पवन, कण्ठ बसै शब्द, श्रवणबसे नाद, नासिका बसे हंस, जिह्वा बसे जीव, नेत्र बसे शिव अकेला बसै अविनाशी और कुबुद्धिमें काल बसता है ।
देवदत्त वचन—हृदय न होता तो कहाँ होता मन, नाभि न होती तो कहाँ होता पवन, कण्ठ न होता तो कहाँ होता शब्द, श्रवण न होता तो कहाँ होता नाद, ब्रह्माण्ड न होता तो कहाँ होता ब्रह्म, नासिका न होती तो कहाँ होता हंस, इंगला न होती तो कहाँ होता शिव, नेत्र न होता तो कहाँ होता निरञ्जन और काया न होती तो काल कहाँ होता ?
अविनाशी वचन—हृदय न होता तो मन निर्नेव होता, नाभि न होती तो शब्द निराकार होता, श्रवण न होता तो नाद निराधार होता, मुख, न होता तो ब्रह्म मध्यमें होता, नासिका न होती तो हंस सत्यमें होता, इङ्गला न होती तो चन्द्रमें जीव होता, पिंगला न होती तो शिव सूर्यमें होता, पुत्र न होता तो निरञ्जन होता, निरन्तर काया न होती तो काल शून्यमें होता ।
देवदत्त वचन—हे स्वामी ! मनका कौन जीव है ? पवनका कौन जीव है कालका कौन जीव है ।
अविनाशी वचन—पवनका जीव शब्द, शब्दका जीव नाद, नादका जीव बीज, बीजका जीव हंस, हंसका जीवना जीव ।
देवदत्त वचन—स्वामी कहाँ से निरञ्जनकी उत्पत्ति है ? कहाँसे पवनकी उत्पत्ति ?
अविनाशी वचन — आदिते सत्य उत्पन्न है । सत्यते तत् उत्पन्न तत्त्वं शब्द । शब्दते उत्पन्न अलेख है । अलेखते उत्पन्न अलील है । अलीलते उत्पन्न निरञ्जन है । निरञ्जनते उत्पन्न शिव है । शिवते उत्पन्न जीव है । जीवते उत्पन्न हंस है । हंसते उत्पन्न ब्रह्म है । ब्रह्मनादते शब्द उत्पन्न है । शब्दते पवन और पवनते मन उत्पन्न है ।
देवदत्त वचन—हे स्वामी ! तन छूटे मन कहाँ समाना, पवन कहाँ समाना, शब्द कहाँ समाना, नाद कहाँ समाना, ब्रह्म कहाँ समाना, हंस कहाँ समाना, जीव, कहाँ समाना, निरञ्जन कहाँ समाना और अलील कहाँ समाना है ।
अविनाशी वचन—तन छूटे मन पवनमें समाना, पवन शब्दमें समाना, शब्द नादमें समाना, नाद ब्रह्ममें समाना, ब्रह्म हंसमें समाना, हंस जीवमें
समाना, जीव शिवमें समाना, शिव निरञ्जनमें समाना, निरञ्जन अलीलमें समाना, अलील अलेखमें समाना, अलेख आदिमें समाना, आदि सत्यमें समाना, सत्य आपही आप, माता नहीं, बाप नहीं, गाँव नहीं, ठाँव नहीं, जन्म नहीं, मरण नहीं, रूप नहीं, रेख नहीं, दूर नहीं, नियरे नहीं ।
चौ०-पूरण ब्रह्म जो दीसँ देही । सत्यगुरु बतावै दर्शे तबहीं ॥
भगत जनाँ गम पावे कोई । सद्गुरु दाया जापर होई ॥
यह दत्त और कबीरके सत्संगका अमृत दोर है, जिसे पीकर मनुष्य हो जाता है ।
कबीर और नारद ।
नारदजी विष्णुके परम भक्त एवं विष्णुके अवतार कहे जाते हैं । बीना बजाना गाना तथा प्रेम (इशक) में मग्न रहना नाचना आपका काम है । सर्गुण भक्तिमें आपने सहस्रों मनुष्योंको लगाया । जान-बूझकर आपने संसार छोड़ दिया पर जब कबीर साहबसे साक्षात्कार हुआ उन्होंने कबीर साहबकी बातें भली-भाँति समझीं, भली-भाँति सोची; तब सत्यगुरुके चरणोंपर गिरकर शिष्य होगा । सद्गुरुने उनकी कमीको पूरा कर दिया । कलियुगमें आकर तो स्वयं कबीर साहिबने भी उनकी प्रेम मदिराके गुण गाये हैं ।
सनकादिक और कबीर ।
सनकादिक बड़े प्रसिद्ध ऋषि हैं, बड़े ज्ञानी और तपस्वी हैं, वे भी कबीर साहबका उपदेश सुनकर हंस कबीर हो गए । जब तक सत्यगुरुका ज्ञान नहीं सुना तब तक दूसरे फन्दोंमें थे, पीछे तो ऐसे भक्त बने कि, कबीर साहिबने भी आपके गुण गाये हैं ।
कबीरजी और ऋषभनाथ ।
ऋषभनाथ जैनधर्मके प्रथम तीर्थंकर और श्रेष्ठ पुरुष थे । चौबीस तीर्थंकरोंमें केवल आपको ही श्रेष्ठता है । पहले तो जैनधर्मके समस्त कार्य आपने ठहराए, जैनधर्म पृथ्वीपर प्रचलित किया । जब कबीर साहबसे आपका साक्षात्कार हुआ, जैनधर्मका भेद सत्यगुरुने कह सुनाया । ऋषभनाथने सब बातें जानलीं, सच्चे सत्यगुरुकी शिक्षा मिली, तब उनने सत्यगुरुके चरण पकड़कर शिष्य हो गये ।
कबीर और भुशुण्डि ।
लोमश ऋषिकी तरह भुशुण्डि ऋषि संसारमें रहते हैं कितनीही उत्पत्ति स्थित तथा बिनाश देखा करते हैं । समस्त कौतुक उनकी दृष्टितलेसे बीता
करता है। भुशुण्ड ऋषिको कागभुशुण्ड भी कहते हैं, यह कागभुशुण्ड चिरंजीव हैं। कोई कोई ऋषिगण जो आपके स्थानको जानते हैं वे पक्का दर्शन करते हैं। आप हंस कबीर हैं स्वसंवेदधर्मका उपदेश करते हैं। कबीर साहबने आपको सम्पूर्ण शब्द प्रदान किया जहाँ चाहें वहाँ रहें, उनकी इच्छा है। वशिष्ठ पुराणमें उनकी उत्पत्ति शिवजीद्वारा लिखी है। सो न मालूम किस सृष्टिमें आप शिवजीद्वारा उत्पन्न हुए थे। कितनी उत्पत्ति स्थित तथा विनाश देखते रहते हैं। जबसे कबीर साहबका चिह्न लगा तबसे अजर और अमर हो गये। भुशुण्ड ऋषिके समान अनगिनती हंस कबीर हैं। ये समय समय पर संसारमें विचरा करते हैं।
कबीर और राजा जनक।
राजा जनक एक सुप्रख्यात ज्ञानी थे, कितने ऋषि मुनिगण आपके दरबारमें रहा करते थे, सदैव धर्म और ज्ञानकी चर्चा हुआ करती थी। आप विदेह कहलाते थे, उनको कबीर साहबका उपदेश मिला जिससे वे अपनी भूलको छोड़ करके हंस कबीर हो गये। यह राजा जनक त्रेतायुगमें हुए, आप धर्म तथा ज्ञानके बड़े दृढ़नेवाले थे, सत्यगुरुके मिलनेसे आपकी खोज पूरी होगई। तभीसे जनकपुरीकी गद्दीपर बैठनेवाले सब राजा विदेह कहलाने लगे। ज्ञानियोंमें जनकजीका मुख्य स्थान है।
बङ्ग-देशके राजा।
अम्बुसागरके सप्तम तरंगमें तारन युगकी कथा आयी है, कबीर साहबने धर्मदासजीको सुनाई है, उस कथाका प्रारंभ—
चौ०—सुकृत सुनो आदिकी वानी। सत्य पुरुष बैठे और ज्ञानी ॥
तारन युग परवाना आनी। चार लाख युग अवधि बखानी ॥
उत्तर पंथ रहे एक राई। धर्मदास तेहि कथा सुनाई ॥
यहाँसे किया है। कबीर साहब धर्मदाससे कहते हैं कि, उत्तरकी ओर एक राजा रहता था, वह राजा बड़ा अत्याचारी था। साधु योगी इत्यादिको पकड़कर कैद किया करता था। ब्राह्मण बैरागी आदिको देखकर जल मरता था। यदि ब्राह्मण आदिके मस्तकपर तिलक देखे तो उस तिलकपर खपड़ी धसवाता था। ब्राह्मणको सोंटा मार जनेऊको तोड़कर आगमें डाल देता था। उसके समयमें न कोई वेद पुराण पढ़ सकता था न भक्ति कर सकता था। न कोई परमेश्वरका नाम ही लेने पाता था। जङ्गली पशु, हिरन आदि घास न चरने पाते, सबको मारकर खा जाता था। अनगिनती पशुओंको मारता, बड़ा दुःख देता। कबीर साहबका कथन है कि, उसकी दशाको देखकर हम वहाँ गये।
उस राजाके द्वार पर एक बृहत् वट वृक्ष था, उस वट वृक्षकी छायामें हम आसन मारकर बैठ गए। उस समय उस राजाकी एक लौड़ी बाहर निकली साहबके समीप आ खड़ी हुई। दंडवत् प्रणाम करके पूछने लगी कि, महाराज ! आप कहाँसे आए हो किस देशमें रहते हो, आप किस कार्यके निमित्त आए हो जो कुछ आप भोंगो सो सब कुछ मैं आपको दूँगी, भिक्षा लेकर आप चले जाओ। यहाँका राजा बड़ा अत्याचारी है, जिस समय वह आपको देखेगा आपकी ग्रीवा उड़ा देगा। क्योंकि वह बड़ा अत्याचारी तथा निर्दयी है। वह ऐसा अत्याचारी है कि, उसमें तनिकभी दया नहीं। साधु ब्राह्मणको बड़ा दुःख दिया करता है। वह राजा इक्कीस डचोढ़ीके भीतर रहता है, वहाँ कोई नहीं जा सकता। केवल उसकी रानी उसके साथ रहती है। वहाँ किसीकी पहुँच नहीं। तब कबीर साहबने उस दासीसे कहा कि उस राजासे जाकर कहो कि, वह मेरे सम्मुख आवे, जब मेरे सामने आवेगा तो उसका, हृदय प्रकाशित हो जावेगा। यदि वह मेरा कहना मानेगा तो उसकी मुक्ति हो जावेगी। ऐ दासी तू भयभीत न हो, हमारा समाचार राजासे कहो। तब वह दासी डरती काँपती हुई, बीस डचोढ़ी पार कर जब राजमहलकी डचोढ़ीपर पहुँची, इक्कीसवें द्वारके द्वारपालसे कहा कि, तुम जाकर राजा साहबसे निवेदन करो कि—ऐ महाराज ! एक सिद्ध आया है, द्वारपर आपको बुलाता है। यह बात सुनकर उस द्वारपालको बड़ा भय उत्पन्न हुवा वो सोचने लगा कि, यदि मैं जाकर यह समाचार राजाको कहूँ तो राजा निश्चय मेरी ग्रीवा धड़परसे उड़वा देगा। उस दासीने उस द्वारपालको समझाया कि, तुम कुछ भय मत करो, वह सिद्धही नहीं वरन् समस्त सृष्टिका रचयिता है (क्योंकि उस दासीने कबीर साहबके प्रतापको देखा था)। हे द्वारपाल ! तुम कदापि भयभीत न हो। सुकनियाँ दासीके समझानेसे वह द्वारपाल राजाके समीप गया। दंडवत् प्रणाम करके निवेदन करने लगा कि, ऐ महाराज ! द्वार पर एक सिद्ध आया है, सुकनियाँ दासीने मुझे समाचार दिया है, कि, वह आपको बुलाता है। यह बात सुनतेही राजाने अत्यंत क्रुद्ध होकर आज्ञा दी कि, उस सिद्धको मार डालो, सूरुकनियाँ को भी फाँसी लटकाओ। जब उस द्वारपालने आकर सूरुकनियाँको यह समाचार पहुँचाया तो इसको सुनतेही वह भागकर द्वारपर आई कबीर साहसे कहा कि, ऐ महाराज ! आप यहाँ से उठ जाओ। क्योंकि, राजाने ऐसी आज्ञा दी है। कबीर साहब द्वारपरसे उठकर तालाबपर गए, वहाँ पर बैठे रहे। इस राजाका यह नियम था कि, जब सवा-पहर दिन चढ़ता था तब सोकर उठता था। उस समय छतिया नामक एक दासी