कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
धर्मदासजीके ४२ वंशकी स्थिति
कारण परमेश्वर विष्णुसे सदैव प्रेम रखना चाहिए। ऋग्वेद १-२-७-४
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः ।
दिवीव चक्षुराततम् । । ऋग्वेद १- २-७-५ ।
अनुवाद—ऐ ज्ञाताओ और मुक्ति योग्य मनुष्यों ! विष्णुका जो श्रेष्ठ और ऊँची श्रेणीवाला सत्यलोक हैं जो सबके जानने योग्य हैं, जिसको पाकर परमानन्दको प्राप्त हो जाता है फिर वहाँसे कभी दुःखमें नहीं पड़ता । इस श्रेणीको बहादुर और धर्मात्मा और वासनाओंको दमन करनेवाले सबके भिन्न बुद्धिमान पुरुष बड़े सोचसे देखते हैं । जैसे सूर्यका प्रकाश समस्त स्थानोंमें हैं । ऐसेही परब्रह्म विष्णु समस्त स्थानोंपर उपस्थित है । परम स्वरूप परमात्मा है । उसीके संयोगसे जीव समस्त दुःखोंसे छूटता है । बिना उसके जीवको कभी सुख नहीं मिलता, इस कारण प्रत्येक रूपसे परमेश्वरसे मिलनेका उद्योग करना चाहिए ।
१-२-७-५ ।
त्वं द्वि विश्वतोमुखो विश्वतः परिभूरसि ॥
अप नः शोशुचदधम् ॥ ऋग्वेद १-७-५-६ ॥
अनुवाद—हे अग्नि परमात्मा ! आप समस्त विद्याओंमें एवं समस्त स्थानों पर उपस्थित हो । आपके अनन्त मुंह हैं । वही शक्ति जिसके बलसे समस्त जीवोंके सद्पददेश सदैव हो रहा हो वही आपका मुख है । ए दयालु ! आपकी दयासे हमारे समस्त पातक पृथक् हो जायें जिसमें हमलोग निष्पाप होकर सदैव आपकी, भक्तिप्रार्थनामें संलग्न रहें । ऋग्वेद-१-७-५-६ । ऋग्वेद ऋग्वेद-
इसी विष्णुकी प्रशंसा चारों वेद करते हैं । इसी विष्णुको चारों वेद छ शास्त्र और अठारह पुराणोंने परमेश्वर कहा है । समस्त श्रुति स्मृति इसीसे-अपनी मुक्तिकी आशा रखते हैं । समस्त ऋषि मुनि औलिया अम्बिया इसी विष्णुकी बड़ाई तथा प्रभुता प्रगट किया करते हैं । समस्त वेद तथा पुस्तकोंमें इसी विष्णुकी पूजा कही है । इस परमेश्वरके अतिरिक्त और कोई दूसरा परमेश्वर इस लोकमें नहीं है ।
देवीभागवतके नवम स्कन्धके पन्द्रहवें अध्यायमें लिखा है कि, विष्णुने कपट से वृन्दाके आसुरीत्वका अपहरण किया । तब उसने शाप दिया कि, तू पाषाण हो जा । देखो नवम स्कंधके चौबीसवें अध्यायमें विष्णु शालिग्राम पाषाण हो गये । और वृन्दा (तुलसी) गण्डकी नदी हुई और इस गण्डकीमें शालिग्राम रहने लगे और तुलसी उनके शीशपर चढ़ती है यही कबीर साहिबने कहा है कि—
साखी—वृन्दाकरे शापसे, शालिग्राम औतार ।
कहे कबीर सुन पण्डिता, कह पूज होवे उधार ॥
जो वृन्दाके शापसे शालिग्रामके रूपमें अवतृत हुआ, कबीर साहिब कहते हैं कि पंडितों ! उसके पूजन से उद्धार हो जायगा ।
इस्लाममें विष्णुकी प्रधानता ।
मूसाकी प्रथम पुस्तक पैदायशका तीसरा बाब २२ आपत देखो जब आदम उत्पन्न हुआ उसने आज्ञा नहीं मानी तब आदमको बैकुण्ठसे बाहर निकाल दिया । बैकुण्ठकी वाटिकामें चमचमाती हुई आखोंवाले दूतोंका पहरा बैठा दिया कि आदम आयुवा फल खाने न पावे । खुदाबन्दने कहा कि, मनुष्य भलाई बुराइकी पहचानमें हममेंसे एकके सद्गुण हो गया । अब ऐसा न हो कि, हाथ बढ़ावे अमर फलमेंसे कुछ खावे, सदैव जीवित रहे ।
इस परमेश्वरके सद्गुण अनेक परमेश्वर हैं क्योंकि, यहाँ बहुवचन शब्द रक्खा गया है । जैसा कि पूर्वमें लिख आया है कि महा मायाके बलसे करोड़ों और अनगिनती ब्रह्मा रुद्र इन्द्र इत्यादि बुलबुलेके समान उत्पन्न होते और फिर उसीमें समाजाते हैं । सो उसकी लीला एक अगाधसागर है । ये सभी मायासे उत्पन्न हुए स्वयम् माया हैं । यह खुदाको दर्शन देता था और समस्त कार्योंसे उसको विज्ञ किया करता था ।
जैसे आदमके साथ उसी प्रकार नूहके साथ श्री यह खुदा रहता था । जब बाढ़ समाप्त हो चुकी नूह अपनी नासे बाहरआया । एवम् समस्त जीवों सहित पृथ्वीपर चरण धरा (देखो मूसाकी पहली पुस्तक) उत्पत्ति का ८ वाँ बाब २० आयत) तब नूहने खुदाबन्दके निमित्त बलिप्रदानस्थल बना समस्त पाक पक्षियों तथा समस्त पाक पशुओंमेंसे लेकर उस बलिप्रदानस्थलीपर जलाकर बलिप्रदान किया । उस समय खुदाबन्द उस सुगंधिके सृष्टनेके निमित्त आकाशसे उतरा । खुदाबन्दने अपने मनमें कहा कि, मनुष्यके निमित्त मैं अब पृथ्वीको कदापि लानत नहीं करूँगा । इस कारण कि, मनुष्यके चित्तकी वृत्ति बचपनसेही बुरी है जैसा कि, मैंने किया है, फिर कभी समस्त जीवोंको नहीं मारूँगा । बरन् जबलें पृथ्वी हैं तबलें बोना और लोना, शरदी गर्मी अगहनी और वैशाखी, दिन और रात बंद न होंगे ।
नवों बाब पहली आयत । खुदाबन्द ने नूह और उसके पुत्रोंको बर्कतदी और उन्हें कहा कि, फलो बढ़ो, पृथ्वीको भरपूर करो । खुदाबन्दने प्रण किया कि, मैं भविष्यतमें किसी जीवको बाढ़से कभी न मारूँगा, मनुष्यके अतिरिक्त समस्त