कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सांप, शिवका, जपी, चिनगीबटेर बोलियोकै अर्थ स्यावर और जंगमोंकी एकता
किस प्रकारसे साबित हुआ कि, खुदा कुरबानीसे राजी है। कुरबानीके लिये कोई आयत उत्तरी ? आकाशवाणी हुई ? अथवा कोई फिरिश्ता प्रगट हुआ ? या स्वप्न देखा ? कि, यह उसी खुदाकी तरफसे है। या और ही कोई है कुरान ५० सूरात रकूअमें लिखा है कि, हम बहुत नजदीक हैं तरफ उसके (इनसानके शहरगसे)।
जो खुदा व्यापक और शहरगसे नजदीक हो फिर उसखुदाका बचन भी शहरगसे निकट होना चाहिये, न कि, खुदा तो मेरे पास हो उसका कलाम फिरिश्तों के द्वारा आकाशसे आवे। इन सब बातोंसे साबित होता है कि, खुदाको न पहचान करकेही नबियोंने जबह और क़त्लकी आज्ञा दी है। ऐसी आज्ञाएं उसकी ओरसे नहीं हैं।
हजका यम - महम्मदी लोग हजको जाते हैं मक्काके निकट पहुंचते हैं, किसी वृक्षका पत्ता नहीं तोड़ते, घास नहीं उखाड़ते किसी जीवधारीको किसी प्रकारका भी दुःख नहीं देते, वरन् जूँ भी नहीं मारते। जो कोई इसके विरुद्ध कुछ करता है तो उसका हज पूरा हुआ नहीं समझते। इन बातोंसे जाना जाता है कि, मुसलमानोंका खुदा व्यापक और सर्व दृष्टा नहीं है, इसीलिये केवल मक्कामेंही उसके नियमोंका पालन होता है। यदि व्यापक है तो वही नियम सब जगह होने चाहिये, यदि खुदा केवल मक्कामें ही है तो सब जगह निमाज पढ़ना और रोजा रखना व्यर्थ है। इस कारण यह स्वीकार करना पड़ेगा कि, हजके नियमोंका सर्वत्र पालन होना चाहिये।
अनुचितका विधाता - इब्राहीम और मूसा आदिकका खुदा प्रगटही खाता पीता था, पर मुहम्मदका खुदा जो बेचून और बेचारा है, छिपाकर खाता था परदेसे बातचीत भी करता था। यह सर्वदासे सभी नबियोंको भिन्न २ कानून और बातें बतलाकर छल कपटसे लड़ाता आता है। किसीको शराब पीना सिखलाया, तो किसीको मांस खाना बतलाया, किसीको जना (व्यभिचार) करनेकी आज्ञा दी, किसीको उत्तम खानेको भी मना कर दिया। किसीको जीवहत्या करने की आज्ञा देता है। खरकईल नबीको विष्ठाकी पकी रोटी खिलाता है। यह बात खरकईल नबीकी किताबका बाब - १२ आयत-ईसाके शिष्य पितरसको डोंगर ढोर. कीड़े, मकोड़े आदि खानेकी आज्ञा दी। देखो रसूलोंका अमाल- ११ बाब ५१३ आयत-इसियाह नबीको जनाकार (व्यभिचारिणी) औरतसे मित्रता रखनेकी और व्यभिचारकी लड़कीसे विवाह करनेका आदेश दिया।
समीक्षा - इन नबियोंमेंसे किसीसे दरियापत किया जावे कि, आप कभी
कुछ कभी कुछ कानून प्रचलित करते हो, इसका क्या कारण है ? यथार्थमें इन नब्रियोंमेंसे किसीने भी खुदाको न जाना क्या ? भला जो खुदाको पहचाने वो ढोंगर, ढोर, कीड़े, मकोड़े इत्यादि तथा गृहकी पकी रोटी खावे ? पृश्चली स्त्रीसे मित्रता रखे ? उनकी पुत्रीसे विवाह करे ? किसीको जबह करने और कत्ल करनेकी आज्ञा दे ? कदापि नहीं । ईश्वर शुद्ध है उसका जाननेवाला भी शुद्ध होता है उसके कर्म भी शुद्ध और उज्ज्वल होते हैं ।
समता - मनुष्य और पशुओंका मांस एक समान है, जिसने एकका खाया उसने सबका खा लिया, देखो तौरीतमें इस तसनाका १२-बाब २०-से-२३ आयत तक लिखा है कि, खानेमें पाक और नापाक जानवर बराबर हैं यही बात इज्जीलमें रसूलोंके आमालमें इसी बाबमें लिखी है कि, जो कोई खाता है उसके लिये सब जीवधारी मनुष्यके मांसके समान है ।
कबीर साहब - जस मांस नर की, तस मांस पशुकी, मांस मांस एक सारा हो ।
सात्विक भोजन - जो ऋषीश्वर लोग जङ्गलमें रहते हैं वे साग, पात, कन्द, मूल, फल आदिक खाकर जीते हैं। उन्हींका अन्तःकरण शुद्ध तथा हृदय प्रकाशमय और कान्ति तेज युक्त होती है । उन्हींको सब प्रकारकी सामर्थ्य मिलती है, तपस्या, भजन और संयम सब प्रकारकी शक्तिको प्रदान करता है । दानियल नबीकी किताब २ बाब-८२१ आयत तक देखो-दानियल नबी केवल फलियां खाकर दिन बिताता था, उसने कभी भी बादशाही भोजन स्वीकार नहीं किया, तिसपर भी उसका चेहरा बादशाही खाना खानेवालोंसे अधिक प्रकाशमान रहता था । नियुकद नजर बादशाहके सन्मुख परीक्षाके समय उसीको अधिक प्रतिष्ठा मिली । नबीसे बहुतसे आश्चर्यमय कौनक प्रगट हुये ।
धारणा - मांसाहारियोंके मनमें यह बात समाई हुई है कि, मांस खानेसे बल कान्ती बढ़ती है दानियल नबीकी उपरोक्त बातोंका विचार करें जाने कि, उनका कहना सब झूठ है ।
श्रेणियाँ और भोजन -- प्रथम श्रेणीमें पुण्य स्वरूप देवते हैं, उनको परमात्माने अमृत और कल्पवृक्ष प्रदान किया है । दूसरी श्रेणीमें मनुष्य हैं जिनको ईश्वरने अनाज फल शाक पात आदिक प्रदान किया है । तीसरी श्रेणी राक्षसोंकी है, जो कि, मांस शराबको ग्रहण करते हैं बुरे कर्मोंकोही अपना कर्तव्य समझते हैं इनमेंसे पहले श्रेणीवालोंको स्वर्ग मिलता है दूसरे मध्यमें रहते हैं एवं तीसरी श्रेणीवाले नरकमें पड़ते हैं ।