कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
मन्शूरका सम्स तबरेज और बुल्लेशाह होना अमीर खुशरू मोलवी रूप
रोहीमें घास छपरमें पानी । मोड़ाकर मेरी भाँग मिलानी ॥
उस भैंसके प्रेममें इसी प्रकारका शब्द करता फिरता था । उसका शब्द सुनकर एक पथिकने उससे पूछा कि, तेरी यह दशा क्यों है ? उसने अपनी भैंसका सब हाल कह सुनाया । पचास साठ कोसके ऊपर एक वैसीही भैंस दिखाई दी । पथिकने उस जर्मीदारका सब हाल लोगोंको कह सुनाया । जब वह पथिक कह रहा था—उसी समय उस भैंसने भी अपने स्वामी जर्मीदारका सब वृत्तान्त सुना, तब उसका मन अपने स्वामीकी ओर खिंच आया । जबसे वह भैंस इस जर्मीदार से पृथक् हुई थी तबसे उस समय तक तीन वर्षका समय बीत चुका था । उसने दो बच्चे दिये थे । अब उसने जान लिया कि, मेरा स्वामी मेरे लिये रोता फिरता है । तो उस भैंसके मनमें प्रेम आया अर्ध निशाके समय, अपनी रस्सीको खोल लिया दोनों बच्चों सहित कुशल पूर्वक मालिकके गाँव पहुँच गई । घास चरकर जल पीकर तृप्त होकर बैठी ही थी कि, जर्मीदारने आवाज दी कि—
रोहीमें घास छपरमें पानी । मोटाकर मेरी भाँग मिलानी ।
जब जर्मीदारने ऐसा कहा तो वह भैंस उठकर बोली उसको पहचानकर वह जर्मीदार उसके निकट गया देखा तो उसकी भाँग मिलानी दोनों बच्चों सहित आ पहुँची है । जर्मीदार उसको अपने घर लाकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ ।
महात्मा भैंसा — जिला फिरोजपुर तहसील भोगा डरौली गाँवके समीप एक गाँव छोटे फेरीवालाके नामसे है, इसमें एक भैंसा है । इसका यह हाल है कि, वह जब अपनी माताके गर्भमें था तो नियमित आकारसे अधिक बढ़ गया । इस कारण जब वह उत्पन्न हुआ तो उसकी माताका मूत्रमार्ग फट गया तब वह बाहर निकला । उसकी माता मर गई । वह बिना माताका बच्चा जीवित रह गया भैंसोंके स्वामी ने दो बकरियों मोल लीं उस बच्चेको बकरियोंका दूध पिलाकर पालने लगा । यह बचन कहा कि, यदि यह बच्चा जीवित रहेगा तो मैं उसको छोड़ दूंगा और इससे कोई काम न लूंगा अन्तमें बच्चा पलकर बड़ा हुआ बहुत बलिष्ठ स्वरूपवान और अच्छा भैंसा हुआ । उसके ऊपर छोटे छोटे बच्चे चढ़कर खेला करते थे । वह क्रुद्ध न होता था । कभी किसीको कुछ कष्ट न देता था । प्रायः लोग दूर दूरसे अपनी अपनी भैंसियोंको लाते और उससे गर्भिणी कराके लौटाले जाते । यह भैंसा अन्तर्यामी था । क्योंकि, वह अपनी पुत्रीसे कदापि सम्भोग न करता था । कोई मनुष्य जो अपनी भैंस उससे गर्भिणी कराकर दूर लेकर जाता था उसके वीर्यसे जो भैंस उत्पन्न हुई हो चाहें उसको उस भैंसने कभी देखा भी न हो । यदि वह भैंस उसके सामने आजाय तो भी उसके साथ कदापि सम्भोग न करे । जर्मीदार कितना
ही बल लगावे तथा कितनी ही युक्ति क्यों न करे पर वह भैंसा अपनी पुत्रीको पहचान अपना मुँह उसके मुँहसे मिलाकर पृथक् हो जाता कदापि सम्भोग न करता था । उस पशुको भविष्यके हाल जाननेकी विद्याके बिना अपनी बेटीकी पहचान कैसे होती थी ? इससे पता चलता है उसे भविष्य जाननेकी विद्या थी वो पूर्वजन्मका कोई महात्मा था ।
एक बस्तीमें एक भैंसा रहता था उसको एक मुसलमानने बेबात बरछी मारी । वह जख्मी होकर भाग गया । वह अपना बदला लेनेपर उद्यत हुआ । मुसलमानने भी जान लिया कि, वह भैंसा मुझसे अपना बदला लेना चाहता है । वह सदैव चौकस रहता था । एक दिनकी घटना है कि, मुसलमान बाहर किसी अन्य-स्थानसे लौटता हुआ बस्तीसे दूर एक मैदानमें पहुँचा, भैंसने उसको उस स्थानपर देखा तो मारनेको दृढ़ा । वहाँसे वह मुसलमान भाग न सका । भैंसने शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर उस मुसलमानको दबा लिया अपने सींगोंसे उसका पेट फाड़ डाला । उसके सभी अङ्गोंको पृथक् २ कर दिया । वह इतना क्रुद्ध हुआ कि, उसके किसी अङ्गको एक स्थानपर न रहने दिया । उसके अङ्गः प्रत्यङ्गः तितर बितर करके इधर उधर रख दिये ।
गदहा
गानासुननेका शौकीन—गदहे अच्छे २ कार्य करनेके लिये उत्सुक रहते हैं । एक गदहा था वह प्रायः रागबाजा सुनने जाया करता था । एक स्त्री थी जो बहुत अच्छे सुरोंमें गाया करती थी, जब वह गाने लगती थी तो वह गदहा उसकी खिड़की के निकट आ जाया करता था । बड़े ध्यानसे राग सुना करता था । उस स्त्रीने एक दिन एक ऐसा राग निकाला जिसको कि, उसने पहले कभी नहीं सुना था । उस रागपर वह गदहा मोहित हो गया । उसके मकानके भीतर घुस आया बड़े जोरकी आवाज निकालकर चिल्लाता हुआ अपना राग प्रेम प्रगट करने लगा ।
कुछ कुम्हार अपने २ गदहों को लेकर फरीदकोटकी ओरसे फिरोजपुर को जाते थे । फरीदकोटके निकट एक बच्चा मर गया, जिस गदहीका वह बच्चा था, वह अपने मृत बच्चेके निकट खड़ी हो गई । कुम्हार मारकूट कर अपने साथ ले चले मुर्दा बच्चे को उसी जगह पर छोड़ गये । जब बारह कोशके अन्तपर पहुँचे उस गदहीके मनमें, बच्चेके प्रेमका ऐसा जोश आया कि, वह वहाँसे भागकर अपने मृत बच्चेके निकट खड़ी हो गयी ।
न्यायकी प्रार्थना—मैंने किसी पुस्तकमें पढ़ा था, नौशेर्वा बादशाहने महल के बाहर एक घण्टा बौध दिया था, जो कोई फिरियादी घण्टा बजादे तो उसी समय