कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
अभक्ष्य पर कबीरसाहिब
मकानका रास्ता भूलकर एक कबरिस्तानमें चला गया । उसी दिन शामको एक पारसीकी बूढ़ी स्त्री मर गई थी, उसको कफनदेकर सुगन्धी अतर आदिक लगाकर, कबरिस्तानके मकानमें रख आये थे । शाहजादा भी भटकता भटकता कबरिस्तानके उसी मकानमें आगया, नशेकी तरङ्गमें मृतक बूढ़ीकोही अपनी रत्री समझकर जगाना और गुद गुदाना आरम्भ किया पर वह मुरदा कब जागनेवाली थी ? न जागनेपर शाहजादेके मनमें विचार आया कि, आज प्रथम रात्रि है इस हेतु लज्जासे नहीं बोलता । पीछे उसके साथ सम्भोग करने लगा जवानीके जोशमें सबेरैतक भ्रष्ट होता रहा । इधर तो दिनका प्रकाश होने लगा उधर उसका नशा भी उतरने लगा, चेत आनेपर अपनेको कबरिस्तानमें एक बूढ़ी मृतकके साथ लिपटा तथा जिह्वा को उसके मुंहमें डाले हुये देख उसकी लज्जा और पछतावेको क्या कहना था, वह वहाँसे बड़ी चिन्ता, लज्जा, शोक, ग्लानि और घृणाको लिये हुये वहां से चल दिया ।
मदिराके दोषोंपर पाश्चात्य तत्त्वज्ञ—यूरोपियन तत्त्वज्ञोंकी सम्मति है कि, मदिराका नशा सार भागके आधारपर है, यह कारबन, हैड्रोजन और आक्सिजन इन तीन तत्त्वोंसे बनता है ।
कीमियाइस्लाइमें लिखा है कि, दो भाग आक्सिजन, छः भाग हैड्रोजन और चार भाग कारबनसे अलकाहल बनता है । उसका यह गुण है कि, शारीरिक उष्णतापर रक्तकी सञ्चारण गतिको बहुत जोरसे बढ़ाता है, जिससे थोड़ीही देरमें चर्मपर पसीना आजाता है । शरीरकी बिजली घट जाती है, इसका यह नतीजा होता है कि यह आरोग्यताको एकदम नष्ट कर देता है ।
इसका असर मस्तिष्कपर भी पड़ता है कि, यह मस्तिष्कके रगोंमें गरमी डालकर बड़े वेगसे रक्तका सञ्चालन करता है, जिसे मस्तिष्कके ऊपर बड़ा दबाव पड़ता है । थोड़े दिनोंके पीछे मस्तिष्कका तत्व ढीला होजाता है ।
मस्तिष्ककी शाखायें पतली पतली नसें हैं जिनपर मनुष्य की प्रकृति और स्वभावका आधार है वे बिगड़ जाती हैं इसका यह परिणाम होता है कि, मध्यम मनुष्य लड़ाका, झगड़ालू, डरपोक और उत्साह हीन हो जाता है । शरीरके पुट्टोंपर रसदार पदार्थोंको जमानेके कारण उनको बेकार कर देता है शराबियोंके पुट्टे प्रायः ऐसे हुये होते हैं । उनको थोड़ा परिश्रम भी बहुत कठिन जान पड़ता है, हाथ पग अपने वश नहीं रहते, अन्तमें थर थराहटकी बीमारी हो जाती है ।
उसका हड्डियोंपर ऐसा असर होता है कि, उनमें फासफोरस उत्पन्न
नहीं होने देता, उनमें गोंद भी नहीं होने पाता, जिससे हड्डियाँ कठिन और निर्जीव हो जाती हैं जिसका परिणाम गठिया और ध्वजभङ्ग होता है।
चरबी (मज्जा) पर इसका ऐसा असर होता है कि, उनको सुखा देता है अलकाहल यानी मदिराके सारभागका स्वभाव है कि, चरबीको पतला करे यदि थोड़ी हो तो सुखा दे, इसलिये मद्य भी वँसाही करता है।
चमड़े पर इसका असर पड़नेसे उसपर नाना प्रकारके चर्मरोग उत्पन्न होते हैं, वैसेही इन्द्रियोंपर तथा अन्तरीय शक्तियोंपर भी इसका असर होता है थोड़े समयतक तो उनमें गरमी पैदा करके बड़ा जोश और बल पैदा कर देता है, फिर उसी प्रकारसे उसमें पूरी ठण्ढक और सुस्ती आ जाती है।
उपस्थ इन्द्रियोंके रोगोंको फैलानेसे प्रायः मसाना कमजोर हो जाता धातु पतली हो जाती है, विषयकी इच्छा बहुत बढ़ जाती है, पशु वृत्तिमें विशेषता हो जाती है, इस प्रकारसे थोड़े दिनमें मनुष्य नामर्द हो जाता है। मसाना कमजोर हो जाता है, शराबी कभी २ कपड़ोंमें पिशाब भी कर देता है। कलेजेके अन्तरङ्ग तत्वको मिलाकर चरबी बना देता है, खालके अन्दर जा पाचन शक्तिमें मिलकर पाचनशक्तिको नष्ट कर देता है, इसलिये शराबी प्रायः वमन किया करता है, थोड़ेही दिनोंमें उसकी पाचनशक्ति जाती रहती है वह किसी कामकी नहीं रहती। पेटकी शाखायें तथा अंतरियोंके उलटे हो जानेसे कबजकी बीमारी हो जाती है।
कलेजेपर इसका परिणाम—हृदयका काम है कि, भोजनके साथ पिप्त मिलावे और कारबोलिक आदिकको रगोंके द्वारा फेफड़े तक पहुँचावे, शराब उसको कमजोर कर देती है, इस कारण मद्यपोंमेंसे सँकड़े पीछे निश्चानवे हृदयके रोगसे मर जाते हैं।
इसका फेफड़ेपर असर—फेफड़ा अधिक परिश्रमके कारण निर्बल हो जाता है, जिससे तपेदिक (विषमज्वर) दमा तथा सिलकी बीमारी हो जाती है।
धड़कन—हृदय रक्तके उलटने पलटनेके कारण धड़कता रहता है, मद्यप प्रायः सोते २ चिल्ला उठता है, इस प्रकार मद्यपकी जिन्दगी दुःखमय हो जाती है।
आँखोंपर मद्यका परिणाम—यह होता है कि, आँखोंका बल घट जाता है उनमें लाली छा जाती है, उसी तरह कानोंकी शक्ति भी घट जाती है, जिह्वा फूल जाती है, होठोंमें सूजन आ जाती है, जिसके कारण शुद्ध शब्द नहीं निकलता पाँव चलनेसे रह जाते हैं, कामदेवकी शक्ति घट जाती है।