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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मुसलमानी धर्म

गजल ।

लगे सब स्वान इस मुर्दार दुनिया । न कोई इनसान मुर्दार दुनियाँ ॥
है कूकरो शूकरो खर सियार पियारी । सो सब हँवान इस मुर्दार दुनिया ॥
जो मुर्दार लगे सो सब हैं मुर्दः । न उनमें जान न इस मुर्दार दुनिया ॥
न ईसमें कोई मजहब है न मिल्लत । सो चारो खानि इस मुर्दार दुनिया ॥
नहीं यह जिन्दगीकी जा है आजिज । यह सब समसान इस मुर्दार दुनिया ॥

कुत्ताका गजल ।

तू घर बघर भूंकता फिरता है कुत्ते । न तू हर्गिज सन्न करता है कुत्ते ॥
दिया था दान और किया था खैरात । जो नंग और भूख से मरता है कुत्ते ॥
जो दुर दुर सब करे और भूखा मारे । कहीं तेरा उदर भरता है न कुत्ते ॥
दिया नहीं फिर पावे तू कैसे । इसी से भूख दुख भरता है कुत्ते ॥
अगर आजिज बचन सुन सन्न करतू । तो फिर क्यायों भूखसे डरता है कुत्ते ॥

तो गाओ गीत सबमिली कहो सुहागिन । जो पाया है अमरबराय सुहागिन ॥
तुम्हें हरिनामसे है काम बरनः । तू बैठ आरामसे घर ऐ सुहागिन ॥
तेरा मालिक निगह वान है । जबरदस्त तुझे कुछ अब नहीं डर ऐ सुहागिन ॥
तुझे हरदो जहाँमें खुशनसीबी । तु पाया अपना घर ऐ सुहागिन ॥
तु है जुग ग अटल तेरी सब औलादा । जमीमें और जमाँ भर ऐ सुहागिन ॥
अगर आजिज पिया का प्यार तुझको । तो यकमूदीदः दिलधर ऐ सुहागिन ॥

खसम जो मर गया है ऐ रॉड । तुझे सब दुखने घेरा है ऐ रॉड ॥
तू चक्की पीस खा दीवार परदे । जो अपने चर्खाको फेरा है ऐ रॉड ॥
तू मिहनत व मजदूरी किया कर । तुझे दिन रात झक झरा है ऐ रॉड ॥
तुझे कहाँ पलंग और कहाँ बिछौने । तुझे गमके कुए गेरा है ऐ रॉड ॥
अब आजिज कहना सुन हरिनाम जपना । तू टूटी झोपडी धरा है ऐ रॉड ॥
खसम तेरे बहुत हरफि कसबी । न हो हरगिज कभी तू साफ कसबी ॥
लदी तू सद गुनाहो से है दिन रात । पहेन दिन चार तू जर बाफ कसबी ॥

खोरिशों पोशिश हैं यह दो चार दिनको ।
हंसी और मसखरी और लाफ कसबी ॥
तेरा देरा हो दोजख आग में जब ।
न फिर हो जूर्म तेरा मुआ कसबी ॥
न आजिज व आज रख तू कान करती ।
कहेंगे तुझको लामो काफ कसबी ॥

किया करता है तू गट गू, समझा नहीं तू मजंमूं ।
दिन चारमें कहाँ तू, हरिध्यान कर कबूतर ॥
ऐसी गिरह जो मारी, ऊपरको ले उडारी ।
वह जा नहीं तुम्हारी कुछ कानकर कबूतर ॥
आकासमें चढ़ाया हम जिन्स में बढाया ।
नहीं इल्म वह पढाया, गिरी आनकर कबूतर ॥
अपनी दिखाके बाजी लोगोंको करता राजी ।
यक दिन पकड़ ले क्राजी क्या मान कर कबूतर ॥
आजिजकी बात सुनले और मनमें अपने गुणले ।
सत्तनाम सबमें चुनलें पहचान कर कबूतर ॥
सुन सतगुरुकी वैना और समझ उनकी सैना ।
दिन चारमें तु हैना, सत्तनाम बोल मैना ॥
सीखी जबाँ केती, थी अकल तुझमें जेती ।
अबतक पकी न खेती, सत नाम बोल मैना ॥
बोली अजब बोला, सर काल कर कलोल ।
तब जाब कौन टोला, सत नाम बोल मैना ॥
पढ़ पढ़ जबाँ खपना, माने बिगानः अपना ।
दिन दो तीन होवे सपना, सत नाम बोल मैना ॥
आजिज तू छोड़ पिंजर, और रिश्तः तोंड़ पिबर ।
फिर फिर न जोड़ पिंजर, सत नाम बोल मैना ॥

तू तन मन धन लगाकर अपना गुरुपूज । क्रदमपर सिर झुकाकर अपना गुरुपूज ॥
न गुरु बिन हरिको पावे तु हरगिज । तू उस फर्मा बजाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको मिहर पावेगा हरिको । सो साम्ना बनाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरुको छोड़ हरिको ढूँढ अहमक । जहां पावे बुलाकर अपना गुरु पूज ॥
गुरु गोविन्दसे बढकर है बेशक । यही ईमान लाकर अपना गुरु पूज ॥
वचन कबीर साहबका यह आजिज । जहां होवे तू जाकर अपना गुरु पूज ॥
तु शमसे अपने रोयाकर विरिहिनी । मुंह आँसूसे तु धोया कर विरिहिनी ॥
उठें जब दर्द भारी तेरे अन्दर । कलेजा अपना टोयाकर विरिहिनी ॥
प्यारे बिन तेरा दुख कौन मेटे । तु अपनी जान खोयाकर विरिहिनी ॥
पपीहा ज्यों रटो अपना पिया पीय । मगुफ़लत ख़्वाब सोयाकर विरिहिनी ॥

लिखाकर और किया कर वस्फ उसकी । जबों अपनोको गोया कर विरिहिनी ॥
तुही तुही तुही तू देख हर रुख । तु दिल दरिया बिलाया कर विरिहिनी ॥
तुयक रुख हो नजर कर अपने आजिज । भरम दरिया डुबोयाकर विरिहिनी ॥

रोतेही शामसे सेहर आया । यार अबतक न मेरे घर आया ॥
आह व नालोंमें सारी गुजरी रात । मेरी महरू न मन मिहर आया ॥
करूँ तदबीर कौन है चारा । किस लिये उसके दिल क्रहर आया ॥
मेरी भिन्नत सुना मेरे क्रासिद । अब तलक नहीं प्यामबर आया ॥
नहीं आसूँके तार टूटेंगे । अबतो दिल दीद अपना भर आया ॥
तुही तू तूही तू नजर आवे । हमः मौजब सर बसर आया ॥
नहीं तुझसे है खाली कोई जाय । हर जगह एकसा नजर आया ॥
किस लिये वस्लसे किया महरूम । शोम बद मेरा काम कर आया ॥
हो गया सख्त क्यां तेरा दिल मोम । क्या करूँ अबतो उससे दर आया ॥
तेरा दामन न छोड़ेगा आजिज । जान लग तक मेरा अगल आया ॥
नहीं तेरा जो मुशिद मिहरवों है । तो एकही ढंग जाहिलो वेद ख्वों है ॥
अगर तिशनःसे तू होवे जो बेताब । तो साक्री हाथ प्याला हरजमाँ है ॥
अगर प्यासा नहीं तो क्या पिलावे । वह दायम दूर तुझसे बेगुमाँ है ॥
जहां चाहे तु पीय प्याले इश्क । तुझ क्या खौफ पीले दमाँ है ॥
तुझे मिलनेकी जब हो बेकरारी । तू पीव उसकी जहाँ दूढे वहाँ है ॥
दरू भी वह बेरुसे तुझको देखे । वह जाहिर और परदः निहाँ है ॥
नहीं पहचानता उसको वह तकसीर । अब उस पहचान आँख एसी कहाँ है ॥
नहीं दिलगीर माल और जानदेखुद । करशमये नाजका शेवः बुताँ है ॥
कि, तेरा आह व नाला गिरियः जारी । कशीदः दिल करे दिलबर जहाँ है ॥
कि, तू नाचीज व नालायक है आजिज । और वह बसके ऊपर शहनशाहूँ है ॥

तेरा खुशतर जमाल ऐ पाक दामन । तु खुश खुल्क और ख्याल ऐ पाक दामन ॥
सितारोंमें है जैसे बन्द रौशन । तु सब सखियोंमें लाल ऐ पाक दामन ॥
है तू जो अपने पीतमकी प्यारी । तेरा खुश वक्त हाल ऐ पाक दामन ॥
तेरे हुसनो नमक नाजो अदाके । मुकाबिल न जमाल ऐ पाक दामन ॥
फटे कपड़े व मैली गर तेरी भेस । तेरा बरतर जलाल ऐ पाक दामन ॥
इधर और उधर हरगिज तू न ताके । तेरा फजलो कमाल ऐ पाक दामन ॥
खसम अपनेकी तू फर्मा बर्दारि । मिलेंगी लागजाल ऐ पाक दामन ॥
तेरा खाविन्द हक तुझसे मिलादे । तू आजिज हो बहाल ऐ पाक दामन ॥