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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

आद्याका तीनों पुत्रोंको सृष्टि रचनेकी आज्ञा और पांच खानकी उत्पत्ति

सातवाँ प्रकरण ।

निरञ्जनका कबीर साहबसे वरदान माँगना ।

जब काल निरञ्जन जान लिया कि, ज्ञानीजीसे पार पाना टेढ़ी खीर है, तब वह बड़ी दीनतासे विनय करने लगा कि, एकवचन आप मुझको दीजिये, । तब ज्ञानीजीने कहा कि, माँगो ? तब निरंजनने कहा कि, तीन युग अर्थात् सत्य-युग, त्रेता और द्वापरमें थोड़े जीव मुक्ति पावें, पर कलियुगमें विशेष जीव मुक्ति पावें । यह वचन आप मुझको दीजिये, तब पृथ्वीपर पधारिये । यह बात सुनकर कबीर साहबने कहा कि ऐ काल ठग ! तू मुझको ठगा चाहता है कि, तीनों युगोंमें थोड़े जीव मुक्ति पावें, अस्तु ! जो कुछ तूने माँगा मैंने तुझको प्रदान कर दिया, पर जब चौथा कलियुग आवेगा, तब पृथ्वीपर मैं अपने अंगोंको भेजूंगा कि, वे बड़ी धूम धामसे मेरा पंथ प्रचलित करेंगे और इस तरह अरबों खरबों जीवोंको अपने लोकको पहुँचाऊँगा वे सब तेरे कपटजालसे छुटकारा पावेंगे । फिर निरंजनने निवेदन किया कि, जब कलियुगमें मेरा अवतार होगा और मेरा नाम जगन्नाथ होगा, उस समय समुद्र मेरा मन्दिर तोड़ दिया करेगा, तब आप कृपा करके मेरे मन्दिरकी स्थापना करा देवें और समुद्रको स्थिर कर देवें । ज्ञानीजीने यह बात भी उसकी मानली । फिर निरंजनने निवेदन किया, आप अपना शरीर भी मुझको प्रदान कीजिये, फिर ज्ञानीजीने धर्मराजको शिरवाली देह भी दिया । इसी कारण यह कालपुरुष जब चाहे तब शिरवाली और जब इच्छा हो बेशिरकी देह प्रगट कर सकता है नहीं तो यथार्थ में कालपुरुषका शरीर बिना मस्तकका है और कबीरसाहबका शरीर शिर सहित है ।

आठवाँ प्रकरण ।

छाया (विराट्) पुरुषका वृत्तांत ।

इस विषयको साध लोग भली भाँति जानते हैं, जो विराट् पुरुषकी साधना किया करते हैं, वे स्पष्ट रूपसे विराट् पुरुषको आकाशमें देखते हैं । जो सदैव इस बातपर दृष्टि रखते हैं, उन्हें सदैव वह विराट् पुरुष आकाशमें दिखलाई देता है, जब छः मास उनकी मृत्युके रह जाते हैं उस समय विराट् पुरुष उनको बिना मस्तकके दिखाई देता है । तब साधु जान लेते हैं कि, उनकी मृत्युमें छः मास शेष बचे हैं । कारण यह कि, कालपुरुषने अपनी प्राकृतिक शरीरको अब दिखलाया है । उस समयसे साधु चैतन्य और चौकस हो जाते हैं और जब मृत्युका दिवस तथा समय ठीक आन पहुँचता है, तब प्राणायाम करके समाधि

लगा जाते हैं और अपने प्राणको खींचकर वशवें द्वार पर पहुँचा देते हैं, वहाँ पर कालकी पहुँच नहीं होती। वे जाने रहते हैं कि, कितने समय पर्यन्त मृत्युका आक्रमण है, उतनी देरतक प्राणको नीचे नहीं उतारते और जब मृत्युका समय जाता रहता है और काल निराश होकर पलट जाता है, तब फिर अपने प्राणको नीचे उतारते और फिर प्रसन्नतापूर्वक निर्भय होकर जीवन व्यतीत करते हैं। इसी प्रकार साधु लोग मृत्युसे बचते हैं और काया कल्प करके बुढ़ापे तथा निर्वलताको दूर करते हैं।

नवों प्रकरण ।

निरञ्जनका ज्ञानीजीकी अधीनता स्वीकार करना ।

इसी प्रकार निरञ्जनने बहुत कुछ माँगा और कबीरसाहबने उसको दिया तब धर्मराजने उठकर कबीरसाहबको दंडवत् प्रणाम करके कहा कि, जो जो मनुष्य आपका आज्ञाकारी होगा और आपकी भक्ति और स्तुति करेगा तथा आपका पान पावेगा उसके समीप मैं कदापि नहीं जाऊँगा, शेष लोक तथा वेदके सब जीव मेरे अधीन रहेंगे, इसके अतिरिक्त कितनी बातें हुईं सो यहाँ थोड़ासा लिखा है। धर्मराजने अपने लोकमें रहे और कबीर साहब पृथ्वीको चले, जब आप पहले पृथ्वीपर आये उस समय सत्ययुगका समय था।

यहाँ पाठकोंकी आसानीके लिये निरञ्जनगोष्ठी दे दिया जाता है—

निरंजन गोष्ठी ।

अर्थात् सत्य लोकसे जीवोंको बचानेके लिये ज्ञानीजी (कबीर साहब) का पृथ्वीपर आते समय निरंजनसे बातलाप ।

ज्ञानी वचन ।

काल निरंजन निरगुनराई । तीन लोक जिहि फिरी दुहार्ई ॥
सात दीप पृथ्वी नौ खण्डा । सप्त पताल इक्कीस ब्रह्मण्डा ॥
सहज सुन्नमें कीन्ह ठिकाना । काल निरंजन सबहीने माना ॥
ब्रह्मा विस्तु और सिव देवा । सब मिल करें कालकी सेवा ॥
चित्रगुप्त धरम बरियारा । लिखनी लिखें सकल संसारा ॥
चौरासी लाख अरु चारों खानी । लिखनी लिखे सकल सब जानी ॥
पसु पंछी जल थल विस्तारा । वन परवत जल जीव विचारा ॥
काल निरंजन सबपर छाया । पुरुष नामको चिह्न मिटाया ॥
सत्तर युग ऐसेही चल गयेऊ । पुरुष शब्द एक चितमें ठयेऊ ॥