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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

कर्मपर कबीर वचन

सच्चे झूठेका न्याय

१६-वायजकी किताब (२) बाब (१७) से २१ आयत तक यह लिखा हुआ है कि खुदा सच्चों तथा धूर्तोंका न्याय करेगा। क्योंकि, प्रत्येक अभिप्राय तथा प्रत्येक कार्यके लिये एक समय है। मैंने अपने मनमें कहा बनीआदमकी अवस्थाकी बात खुदा उनपर प्रगट करदे वे आपको पशुके सदृश जानने लगे, जो मनुष्य पर बीतता है वही पशुपर भी बीतता है, दोनों पर समान घटना संघटित होती है। जिस प्रकार यह मरता है वैसेही वह भी मरता है सबमें एकही स्वाँस है। मनुष्यमें पशुसे अधिकता नहीं है, क्योंकि, सब अनित्य हैं, सबके सब एकही स्थान पर जाते हैं सबके सब मिट्टीसे हैं, सबके सब मिट्टीमें मिलजाते हैं। मनुष्योंकी आत्माका ऊपर चढ़ना तथा पशुओंकी आत्माओंका नीचे उतरना कौन जानता है।

इसका तात्पर्य-खुदा सच्चोंका सुख तथा धूर्तोंका नियत समय पर दण्ड देगा। मनुष्यको जानना चाहिये कि, वे पशुके समान हैं। दोनोंमें एकही आत्मा और स्वाँस है। मनुष्यको पशुपर बड़ाई नहीं है। सब मरकर एकही जगह जाते हैं। इस कारण मिट्टी ही न समझना चाहिये। क्योंकि, मिट्टी ही केवल मिट्टीमें जाती है। आत्मा तथा स्वाँसादिक मिट्टीमें नहीं जाते। यहां मिट्टीसे तात्पर्य चौरासी लाख योनिसे है। क्योंकि, सर्वयोनि तथा सर्व शरीर मिट्टीसे बने हैं मिट्टी हैं, यहां मिट्टी नाम सर्व शरीरोंका है। अतः जीवके लिये एक शरीरसे दूसरेमें जाना आवश्यक है सब जीवोंके लिये यही नियुक्त गृह है कि, एक घर छोड़कर दूसरेमें जाया करे। सुकर्मों मनुष्य है, दुष्कर्मों पशु हैं। अच्छोंकी आत्मा स्वर्ग तथा बुरोंकी नरक में जाया करती है।

१७-दाऊदका पुनर्जन्म-पहले सलातनिके दूसरे बाब की पहली और दूसरे आयतमें लिखा है कि, दाऊद बादशाहके जब मृत्युके दिन निकट आये तब उसने अपने पुत्र सुलेमानको शिक्षा देकर कहा कि, मैं समस्त संसारका पथ जानता हूँ इस कारण तू दृढ़ हो अपने को मर्द दिखला।

फिर देखो इज्जीलमें आमालके दूसरे बाबकी २४ आयतमें लिखा है कि, दाऊद आकाशपर न गया और मौलवी अमादुद्दीन तालीम मुहम्मदी लिखितके (१३९) पृष्ठमें लिखा है कि, दाऊद पैगम्बरकी कब्रको अप्रतिष्ठापूर्वक खुदवा डाला।

हिरोदेश बादशाहने सुना था कि, पैगम्बरीकी लाश सड़ती नहीं। इसी परीक्षाके निमित्त उसने दाऊदकी लाश को ठीक नहीं पाया। उसने उसे सड़ती

हुई देखा था । इससे प्रमाणित हुआ कि, दाऊद न आकाश पर गया न पृथ्वीपर जीवित रहा और न कन्नमें रहा वह अवश्यही समस्त संसारके पथमें गया, उसका आवागमन हुआ ।

१८-मतीकी इञ्जीलमें आवागमन-मतीकी इञ्जीलका (१२) बाब (४६) से (४५) आयत तक उसमें लिखा है कि, जब अपवित्र आत्मा मनुष्यके शरीर से निकल जाती है । तब सूखे स्थानोंमें विश्राम दूँदती है, जब जगह नहीं पाती तब कहती है कि, मैं अपने घरमें जहाँ से निकली हूँ पुनः जाती हूँ । जाती है जब उसको देखती है कि, वह खाली और साफ है । तब वह सात आत्माओंको जो उससे अधम हैं अपने साथ ले आती है वे भीतर जाकर स्थिर हो जाती हैं । इस समय मनुष्यकी पिछली दशा अगली दशासे बुरी हो जाती है ।

अब इन आयतोंका तात्पर्य मैं अक्षर अक्षर लिखता हूँ । जब अपवित्र आत्मा मनुष्यके शरीरसे निकल जाती है तथा सूखे स्थानोंमें विश्राम दूँदती है । इसका तात्पर्य यह है कि, मृत्युके मूच्छाके पीछे इसलिये कि, आत्मा पवित्र होनेके कारण है । उसका स्थान तथा श्रेणी ऊँची है इस कारण यह ऊपरको चलती है, सूखे स्थानसे यह तात्पर्य है कि, जहाँ तरी तथा गीलापन कुछ न हो । आकाश इत्यादि की उँचाईमें जाकर अपने लिये विश्रामका स्थान दूँदती है । परन्तु वह तो विश्राम का स्थान नहीं । वह तो शून्य है । आत्माके निमित्त तो कोई अवश्यही शरीर चाहिये । शरीरके लिये कोई भूमि और भूमिके लिये बस्ती होनी चाहिये । बस्तीके लिये कुछ जल जिसमें जीवोंका भरणपोषण हो । बिना भोजनके किसी जीवकी स्थिति नहीं । ये एक दूसरेका भोजन होते हैं । समस्त स्वर्गों तथा वैकुण्ठोंमें बस्ती हैं । इस अपवित्र आत्माको तो वहाँ स्थान नहीं मिलता । न यह वहाँ जाही सकती है । इस कारण यह अपवित्र आत्मा सूखी जगहोंमें अपनी स्थिति दूँदती है । क्योंकि, अपवित्र आत्मा तो वैकुण्ठमें जा न सकेगी, सूखी जगहोंमें आनन्द नहीं मिलता ; जब शून्यमें स्थान नहीं मिलता तब कहती है कि, जहाँसे मैं निकली हूँ फिर वहाँ जाऊँगी । जब आती और उसको देखती है तब उस स्थानको स्वच्छ तथा साफ पाती है इससे यह तात्पर्य है कि, वह आत्मा जब अपने मृतदेहके निकट आती है तब देखती है कि, मेरा शरीर अब मेरे रहने योग्य नहीं, वह स्वच्छ तथा झाड़ा और खाली है, क्योंकि शरीरकी सहायक चौदह इन्द्रियाँ और उनके चौदह देवतें पाँच तत्व और तीन गुण कुछ न रहे, इन साथियों बिना इस शरीरमें मेरी स्थिति कैसे हो सकती है ? वह जो कल बनी थी वो बिगड़ गयी । वह घर उजड़ गया । केवल मिट्टीका एक स्थूल भाग रह गया है । उसको कोई गाड़ दे अथवा जलादे उसके

अधीन है। पाँच तत्व और तीन गुणके मेलसे यह शरीर प्रस्तुत होजाता है। विरुद्धता से मिट जाता है, मृत्युके पीछे अपवित्र आत्मा कई बार अपने शरीरके समीप आती है, उसमें बसनेकी इच्छा करती है, पर इस शरीरमें वासका कोई उपाय न देखकर निराश हो जाती है, पलटकर सात आत्मायें जो उससे भी बुरी होती हैं अपने साथ लाती है वे भीतर जाकर रहती हैं। तब मनुष्यकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी हो जाती है। वह सात आत्मायें जो इससे बुरी हैं वे ये हैं १—वायु। २—अग्नि। ३—जल। ४—पृथ्वी। ५—गुण। ६—सत्तोगुण। ७—तमोगुण। यह सात आत्मायें अपवित्र आत्माओं से भी बुरी हैं। क्योंकि, सातों आत्मायें वासनाकी कामनासे सिरसे पाँवतक भरी हैं। ये वासनाओंसे ऐसी भरी होती हैं, कि कभी कम नहीं होतीं। दिन प्रति दिन भरती ही रहती हैं। इन्हीं सातोंकी संगति और संयोगसे इस आत्माकी बुरी दशा है। ये ही सातों इस जीवको घेर घारकर आवागमनमें डालती हैं। इन्हीं सात निकृष्ट आत्माओंके सम्बन्धने सारे जीवोंको आवागमनके बन्धनमें डाल रखा है। जैसे कि, चोरके साथ साधु भी फँस जाता है इन्हीं सातके सम्बन्धसे आत्माकी निकृष्ट अवस्था हो रही है। इनकी कभी मुक्ति नहीं होती। इन्हीं सातों द्वारा समस्त रचनाएँ खड़ी हैं। जब तक इनका सङ्ग है तबतक जीवका यही ढङ्ग रहेगा। उनका उससे इसका कदापि छूटकारा नहीं हो सकता।

यह आत्मा अपने पूर्वकर्मोंके अनुसार इन्हीं सातोंको साथ लाती है। इन्हींके साथ मातृगर्भमें स्थिर होती है। वीर्यके साथ यह जीव अपनी प्रारब्ध सहित स्थिर होकर फिर गर्भका नियत समय सम्पूर्ण कर शरीरके साथ बहिर्गत होता है। तब जीवकी पिछली अवस्थासे अगली अवस्था बुरी होती है। क्योंकि, आत्मा जो पहिले कुत्सित तथा अपवित्र थी इस कारण उसकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी होती है। पहले वह मनुष्यके शरीरमें थी। मनुष्यका शरीर पाकर उसने जो कुकर्म किया तो अवश्य ही उसकी पिछली अवस्था अगली अवस्थासे बुरी होगी मानुषिक शरीरसे पृथक् गई और पशु आदिके शरीरमें उसका गमन हुआ। यह अपवित्र आत्मायें पशु तथा जड़ पदार्थ अथवा नरकमें जाती हैं। सहस्रों बार उनके आवागमनका सिलसिला चला जाता है। जिसने मनुष्यदेह पाकर अपनी मुक्तिका उपाय न किया वह बड़ा अभाग है।

१९—मती की इञ्जीलका २५ बाब १४ से ३० आयत पर्यन्त लिखा है और वहाँ कयामतका वृत्तान्त और तोड़ेका उदाहरण दिया है उसे यहाँ लिखते हैं—एक मालिकने यात्रा करनेके समय अपने एक भृत्यको पाँच तोड़े दिये, दूसरे को दो तोड़े तथा तीसरेको एक तोड़ा देकर चला गया। कुछ कालके पीछे उन नौक-

रोंका म लिक आया, उनसे हिसाब लेने लगा । जिसने पाँच तोड़े पाये थे वह उन तोड़ों सहित उपस्थित हुआ कहा कि, ऐ स्वामिन् ! मुझे आपने पाँच तोड़े दिये थे उससे मैंने पाँच और कमाये हैं । मालिकने कहा भले सेवक ! चिरजीवी हो, तू थोड़ेमें भला निकला, मैं तुझे बहुत बड़ा अधिकार दूंगा । वैसाही वह दो तोड़ेवाला भी चार तोड़े लेकर उपस्थित हुआ, मालिकने वही बात उससे भी कही तीसरा जिसको स्वामीने केवल एक तोड़ा दिया था वह वही एक तोड़ा लेकर उपस्थित हुआ कहा कि, हे स्वामिन् ! मैं आपको कठिन स्वभावका जानता था इस कारण यह तोड़ा पृथ्वीमें दबाकर रखवा था । मालिकने उस नौकरसे कहा कि, अये अयोग्य आलसी नौकर ! तूने कुछ नहीं कमाया । यदि तू मेरा तोड़ा सर्फीकों पास भी रखता तो मुझको उसका सूद मिलता, फिर उसका तोड़ा छीनकर जिसके पास दश तोड़े थे उसी को दे दिया, क्योंकि, जिसके पास कुछ है उसको और भी दिया जायगा उसकी बढ़ती होगी । जिसके पास कुछ नहीं उसके पास जो कुछ है वह भी ले लिया जायगा । उस निकम्मे नौकरको बाहर अँधेरेमें ड.ल दिया । वहाँ वह रोता और दाँत पीसता रहा ।

तात्पर्य—परमेश्वरका मनुष्यसे गुप्त रहना मानों यात्रा करना है । जिस समय मनुष्य गर्भमें उलटा लटका रहता है उससे प्रतिज्ञा करता है कि, हे परमेश्वर ! इस नरक यंत्रणासे मुझको बाहर निकाल, मैं तेरी भक्ति करूँगा । परमेश्वर दयालु होता है वह गर्भसे बाहर आता है । उस समय परमेश्वर उसकी दृष्टिसे अन्तर्धान हो जाता है । प्रत्येक मनुष्यको उसने पृथक् पृथक् बुद्धिका तोड़ा बाँट दिया है, किसीको पाँच भाग और किसीको एक भाग । इस प्रकार बुद्धिका तोड़ा अपने प्रत्येक भूत्योंको देकर यात्रा करने गया अर्थात् अन्तर्धान हो गया । जब यह मनुष्य गर्भसे बाहर निकल ज्ञानमान होकर भक्ति बन्दनामें संलग्न होता है, वह पाँच तोड़ेवाला अपने सुकार्य तथा भक्तिद्वारा परमेश्वरको प्रसन्न करता है । दो तोड़ेवाला भी अपने मालिकको राजी करता है पर एक तोड़ेवाला मूर्ख उसे रुष्ट करता है ।

जब मनुष्य मर जाता है पिण्ड प्रलय होता है तब सब मनुष्य परमेश्वरके सामने अपनी भलाई बुराईका हिसाब करानेको उपस्थित होते हैं, सबकी भलाई बुराईका हिसाब होता है । तब परमेश्वर सबका हिसाब लेकर सबको दण्ड पारितोषिकादि देता है । वह तोड़ा मानुसिक चोलाकी बुद्धि है । जिसने शुभ काम किया अपना कर्तव्य पालन किया वह भला भूत्य है, उसकी बुद्धि होगी, जिस किसीने मानुषिक शरीर पाकर मनुष्यत्वके धर्मका प्रतिपालन न किया