सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

तात्पर्य—समीक्षा विशेष

मांसमें हाड़ है, हाड़में गूद है, गूदमें बिन्द है, बिन्दमें पौन है, पौनमें प्राण है, पौन और प्राण क्या भिन्न गाड़ ।

अतः वीर्यके साथ आत्मा है, आत्माके साथ उसके कर्म हैं । यदि वीर्यमें प्राण न होता तो उससे किसी वस्तुकी उत्पत्ति न होती । यदि आत्मा किसी और स्थानसे लाकर मातृगर्भमें डाला जाता तो शरीर भी किसा और स्थानसे लाकर स्त्रीके पेटमें रखा जाता । यह नहीं कि, आत्मा तो बँकुण्ठसे लाई जावे शरीर आपसे आप पेटमें बन जावे ।

५८ जिनका सर्प होना—मदारजुलनबोवतमें कहा है कि, जिन जब होता है तब अपना यथार्थ स्वरूप छोड़कर सर्प बन जाता है । जब उसके आयुका दौरा पूरा होजाता है तब सर्पकी देहमें गमन करता है । उसका चिह्न यह है कि, जब सापको मारते हैं उस समय ध्यान करना चाहिये कि, जिस सर्पके शरीरसे रक्त निकल उसकी जिन समझना चाहिये । जिसमें जलके स्वरूप कुछ पीला पीला या जल निकल उसको यथार्थ सर्प जानना उचित है । जिन तो आवागमन करे पर मनुष्य बिना आवागमनकेही रहे इस बातमें कोई विशेष प्रमाण दिखाई नहीं देता ।

५९ लौहमहफूजपर भाग्य—मुसलमानोंका विश्वास है कि, सब मनुष्योंका भाग्य पहलेसेही लौहमहफूजपर लिखा है । वह लौहमहफूज आकाशपर है दूसरी रवायतमें है कि, प्रत्येक मनुष्यके लिये पृथक् पृथक् लौहमहफूज है । फिर कहते हैं कि, सबके लिये एकही पुलसरात है । दूसरी रवायतम है कि, प्रत्येक मनुष्यके लिये पृथक् पृथक् पुलसरात है । ऐसेही कहा है कि, सबके लिये एकही तराजू है जिस पर सबकी भलाई बुराई तौली जायगी ; फिर दूसरी रवायतमें लिखा है कि, प्रत्येकके लिये पृथक् २ तराजू हैं । ये सब बातें अविद्याके कारण हैं कि कहने तथा समझनेमें लोगोंकी स्पष्टता नहीं । यह मैं पूर्वमें ही लिख आया हूँ कि, पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनोंमें एकही बात है, कुछ विभिन्नता नहीं । यह कुछ कहा नहीं जाता कि, ब्रह्माण्ड पिण्ड हो गया कि, पिण्ड ब्रह्माण्ड हो गया । आकाश तथा पृथ्वी दोनों स्त्री और पुरुष होगये हैं इनसे समस्त संसारकी रचना हुई है यह दोनों दो हैं अथवा एक ? यह कौन कह सके वह लौहमहफूज कहनेको दो है वही दुबिधा तथा धोखा है वो मायाका खेल है उसे कौन पहचान सकेगा, पूर्वजन्मके सब चिन्ह मनुष्योंके शरीरसे दिखाई देते हैं यही लौहमहफूज है । जैसा कि मैं प्रथम लिख आया हूँ यह हृदय बुद्धिके समीप है बुद्धि आत्माके समीप है । आत्मलाभसे सब लाभ है । मनुष्य देह पाकर यदि अपनी मुक्तिका उपाय

न करे तो वह बड़ा अभाग्य है। ऐसा समय फिर कभी हाथ न लगेगा। इस मनुष्य देहके समान और कौन पदार्थ है? यदि इस शरीरमें चूका तो फिर लगातार आवागमन करताही रहेगा बहुत समयतक छुटकारा न होगा।

६० जीवोंका आनंत्य—आत्माके विषयमें मुहम्मदी इस प्रकार कहते हैं कि, खुदाने अनगिनती रुहेँ बनाई हैं यह बात कुछ कही नहीं जाती कि, एक है अथवा अनगिनती। इसका मकान तथा लामकान कहना उचित नहीं। वह एक है और अनेक भी है। उसके विवरणमें जिह्वा गूँगी है। मनुष्य हो अथवा देवता किसीमें कुछ कहनेकी सामर्थ्य नहीं है। यह बात समझना चाहिये कि, पहले केवल एक आदम था। इससे अनगिनती आदम हो गये। वह आदम न विभक्त हुआ न कुछ कम हुआ एक बीजसे वृक्ष उत्पन्न हुआ अनगिनती बीज तथा वृक्ष उत्पन्न हो गये। इस कारण मैं एक उदाहरण लिखता हूँ।

संन्यासीका उदाहरण—एक संन्यासी अपने योगबलसे अपनी आत्माको शरीरसे बाहर निकाल दूसरे शरीरमें प्रवेश करके अपनानाम जलदत्त रखा। एक समय वह जलदत्त सोया पड़ा था,। उसने उस समय स्वप्नमें देखा कि, एक नगरमें गया वहाँ मैं मदिरा पीकर मदमस्त हुआ। फिर उस स्वप्नावस्थामें गया फिर उसी स्वप्नावस्थामेंही दूसरा स्वप्न देखा कि, मैं एक परगनेका रईस हूँ उस शरीरके स्वप्नमें और स्वप्न देखा कि, मैं एक देशका राजा हो गया हूँ फिर उस स्वप्नमें और एक स्वप्न देखा कि, अब मैं स्त्री हो गया हूँ एक देवताकी पत्नी हूँ। फिर उस शरीरके स्वप्नकी अवस्थामें स्वप्न देखा कि, मैं हिरणीकी देहमें हूँ। उस हिरण्यकी देहमें और स्वप्न देखा कि, अब मैं लता हो गया हूँ और लता होकर एक वृक्षकी डालसे लपट रहा हूँ। फिर मैंने उस लताके शरीरमें और स्वप्न देखा कि, अब मैं जम्बूर (चिऊटी) हो एक कमलके पुष्पसे लपट रहा हूँ। उस देहमें स्वप्न देखा कि, अब मैं हाथी होकर ब्रह्माजीकी सवारीमें हूँ। ब्रह्मा मुझपर सवार होकर महादेवके भेंटके लिये गये हैं। जब मैं महादेवकी सभामें गया तब महादेवके दर्शनके प्रभावसे मुझको ज्ञान हो गया और फिर मैंने उस हाथीकी देहमें जो स्वप्न देखा तो मैं क्या देखता हूँ कि, मैं महादेव हो गया। फिर मैंने अपनेको बहुत बड़ा ज्ञानी पाया जब मैं ज्ञानी हो गया तब मुझको अपने सब आवागमन याद आये तब मैं अपनी पहली देहके पास जो संन्यासीकी थी गया। उस संन्यासीको सोतेसे जगाया, वह संन्यासी उठ खड़ा हुआ और अपने जाग्रत अवस्थाका सब कार्य करने लगा। फिर जलदत्तको जगाया। वह भी जागकर अपना सब कार्य करने लगा। रईसकी देहको सोतेसे जगाया