कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
आवागमन पर तीरीत समीक्षा, तात्पर्य
जो ठगको बताये रहीमो करीम । नहीं आदमी सो अकीलो फहीम ॥
जो कत्साब घर भेड़ जावे अमान । तो गरदन पे छूरी चले वे गुमान ॥
वही सारे हैवान है सर वसर । न सद्गुरुके रख होवे जिनकी नजर ॥
किया जिन्दा जो आदमों और नूहको । दिया सारे जाँदारमें रुह को ॥
नहीं फर्क हैं दोनों की रुह में । जो पश्चा सोई आदमो नूहमें ॥
हुआ इस पश्चाः पश्चा इन्सा हुआ । हो सदवार पैदा व फिर फिर मुआ ॥
यह हर योनिमें जा तना सुख करे । व अज करदये खेस पासख करे ॥
सभीमें वही गोशत और खून है । वमैं गोश होश आदमी योनि है ॥
कभी आदमी योनि फेरी करे । जो सद्गुरुकी पहचान देरी करे ॥
वह बद वख्त हैवैसे बदशूम है । जो पहचानसे उसके महरूम है ॥
परख पावें उसको जो साहब दिमाग । तो वेशक हो रोशन दाहनी चिराग ॥
यह तसवीर । इन्सान हैवानकी । परख लीजिये राह निरवानकी ॥
७७—निर्गमसे निर्धारण—यह पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों अपने अपने कर्मों करकेही स्थिर हैं । समस्त संसार कर्म करकेही चक्कर खा रहा है अपने कर्मोंसेही एक योनि छोड़कर दूसरी योनिमें जाता आता है । कबीर साहबका वचन है कि, यदि नेत्रके मार्गसे प्राण निकले तो पक्षी हो । नाककी राहसे निकले तो मक्खी मच्छर इत्यादिमेंसे हो । कानके पथसे बाहर हो तो प्रेत भूत इत्यादि हो । मुँहके राहसे बाहर हो तो अनाज खानेवाला कोई जीव हो । यदि मूत्रमार्गसे प्राण निकले तो पानीका कोई जीव हो । मलमार्गसे निकले तो विछा आदिका कीड़ा हो । यदि दसवें द्वारसे बाहर निकले तो बादशाह हो । यदि ग्यारहवें द्वारसे बाहर आवे तो परमधामको सिधारे फिर आवागमन न हो । दश द्वारोंकी सुधि सबको है, पर ग्यारहवें द्वारकी सुधि हंस कबीरके बिना और किसी दूसरेको नहीं है । इस प्रकार समस्त जीव कर्मोंके बन्धनसे खिंचे आवागमनमें रहा करते हैं ।
७८—पशुसे मनुष्य और मनुष्यसे पशु—देवीभागवतके पाँचवें स्कंधके दूसरे अध्यायसे उन्नीसवें तक बराबर कथा लिखी है कि, सम्भ दैत्यने कामान्ध होकर एक भैंसके साथ सम्भोग किया उससे महिषासुर नामक दैत्य उत्पन्न हुआ । शृंगी ऋषि हरिणीसे उत्पन्न हुये । गोकर्ण गऊसे उत्पन्न हुये । इससे प्रमाणित है कि, अपने अपने पूर्वकर्मनुसारही आकार बनता है ।
७९—भेदका कारण—भाग्यनेही इनको बुरा भला बनाया है, कोई धनाढ्य तो कोई दरिद्र है । कोई भला मोटा ताजा, कोई निर्बल तथा दुबला
पतला है। कोई सुखी और कोई दुःखी है। कोई अच्छी दशामें है, कोई दुर्दशाग्रस्त अवस्थामें पड़ा है। कोई तपस्वी तथा साधु है। कोई उच्चका लुच्छा पाजी बदमाश है। कोई कोमल कोई कठोर कोई भाग्यवान कोई महा अभागा कोई शान्त कोई क्रोधी कोई विशुद्ध और कोई कलुषित है। यदि पूर्ववका कर्म न होता तो सबका एकही ढङ्ग होता।
८०—पाठशालामें एकही पिताके दो पुत्र एक साथ पढ़ने बैठे। एक तो पढ़कर शोध्दही विद्वान हो गया। दूसरा कठिन परिश्रम करनेपर भी मूर्ख रह गया। उसका परिश्रम किसी काम न आया।
८१—यदि इस जीवने पहले कर्म नहीं किये थे तो उसके शरीर पर कम्मोंके चिन्ह किसने बनाये? भूखेको डकार नहीं आती। बिना कम्मोंके देहपर कम्मोंके चिन्ह नहीं बन सकते, बिना तेलके कभी दीपक भी जलता है? बिना तेलवाले पदार्थके तेल नहीं निकलता।
८२—ज्योतिषी वर्ष फल बनाकर भलाई बुराई सब कुछ पहलेसेही कह देते हैं। वैसाही सामुद्रिकी शारीरिक चिन्हसे कहते हैं।
८३—यदि हमारे पूर्वके कार्य हमको न रोकते तो हम अपनी समस्त कामनायें पूर्ण कर लेते। हमको रोकनेवाला कोई नहीं था।
८४—यदि पहले कर्म न करते तो कम्मोंके बन्धनमें न फँसते।
८५—हम अपने भाग्यके दास हैं फिर परमेश्वर हमारी क्या भलाई बुराई कर सकता है। निर्गुण तथा सगुण कर्म बन्धनोंमें फँसकर दुःख सुख भोगा करते हैं। जो दुःख सुखसे पृथक् है वे ही कम्मोंके बन्धनमें नहीं आते।
८६—निरञ्जनने कम्मोंका जाल बनाया, आपही उसमें फँस गया जो कोई कम्मोंसे मुक्तको पहचाने वही मुक्त है। शेषके सब आवागमनमें हैं यही साधारण नियम है। निम्नलिखित कवितामें विस्तारके साथ यह निरूपण करते हैं कि, सबकाही आवागमन होता है उससे कोई बचा हुआ नहीं है।
मुखम्मस तर्जीअबन्द
बनी आदम व हैवां मोरो मलख। हैं करते योनि योनिमें तना सुख ॥
सदा करते हैं कर्म अपने पासख। न इसमें शक है ऐ ईमान रासख ॥
तनासुख देखता हूँ मैं तनासुख
वही ब्रह्मा वही चिउँटी हुआ है। हो सदहा बार पैदा फिर मुआ है ॥
जिधर जावे तनासुखका कुआ है। वही माई वही खाला बुआ है ॥ तना० ॥