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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

हंसोंको चलाना

करतार रहता है । उसकी चार शाखायें हैं । तीसरा वेदनी कर्म है जिसके कारण जीवको दुःख सुख होता है । उसकी दो शाखायें हैं । चौथा मोहिनी कर्म है । उसकी दो शाखायें हैं । पांचवाँ आयुकर्म है इससे आपदाका अन्दाजा होता है, इसकी चार शाखायें हैं । छठवें नाम कर्म है इसकी तिरानवें शाखायें हैं । यह नामकर्म जीवधारियोंकी मूर्ति और स्वरूप बनाता है । सातवाँ गौतकर्म है इस गौतकर्म की दो शाखायें हैं । एकसे नीची जगह और दूसरीसे ऊँची जगह जीव देह धरकरके उत्पन्न होता है । आठवाँ अन्तराय कर्म है उसकी दो शाखायें हैं । इस अन्तराय कर्मका यह काम है कि, जो ज्ञान होनेवाला है उसको न होने दे उसमें विभिन्नता डाल दे । आठों कर्मोंका विवरण में ग्रन्थ कबीर भानुप्रकाशमें लिख आया हूँ जो चाहे सो देखले । इन्हीं आठ कर्मोंसे समस्त जीव चार खानि चौरासी लाख योनिमें आवागमन किया करते हैं कर्मोंपासना योग और ज्ञानभी सविस्तर रूपसे वहीँ लिखा गया है । जिससे स्पष्ट प्रगट होता है कि, इस जीवका आवागमन कैसे सुकार्य तथा कुकर्मोंसे हुआ करता है । ये समस्त कर्म तो भरम रूप हैं । इनसे कदापि छुटकारा नहीं होता । जिसका वेद धर्मके लोग और जैनी केवल ज्ञान कहते हैं । इस जीवके कर्मही उसका स्वरूप बनाते हैं । कर्मोंही करके इस जीवका आवागमन चारोंखानिमें बराबर बना रहता है । सत्यगुरु भेद बतलावें तो आवागनको सम्बन्ध टूटे नहीं तो दुख पाता रहता है ।

मुसद्दस—तू है करतार किञ्त्रिया बारी । तेरा हुकम सब जगह जारी ॥
तेरी तसबीर सुबुक और भारी । नकशहा सब शिंगरफो जङ्गारी ॥
आलमोका है सारे काम तुम्हें । ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही इनसान हुआ तूही हैवान । तूही रहबर हुआ तूही शैतान ॥
जिस्म सदहा व एकही है जानू । होवे क्योकर बयां तुम्हारी शानू ॥
लोक तीनों दिया इनाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
मालिक व आदम व जिन्नो परी । हबशी हिन्दी व खेबर और ततरी ॥
रङ्ग विरङ्ग ढङ्ग चार खान करे । अदलो इनसाफ साफ साफ करे ॥
दिया आलमका इन्तजाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाय तुम्हें ॥
बन्दःसाहब कहीं किया है जुदा । कहीं बन बैठे आप आप खुदा ॥
सारे आलममें तेरी सूतो सदा । तुझसे सारे शरीर शाहो गदा ॥
सिजहा करते हैं खासो आम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही वाचून और तुही बेचून । सूरत सब तुझीसे गूनागून ॥
तूही मकबूल औ तूही मलऊन । तूही खुद रम रहा है सारे जून ॥

दे जमीनो जमात आम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही जेरीन् दरमयों बाला । मनका मनका तुही माला ॥
तूही पैदा किया तुही पाला । तूही सबजा हुआ तूही जाला ॥
कौन पहचान अकल खाम तुम्हें । अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
इन्द्र ब्रह्मा व विष्णु भी भूले । अपने अमलोंके झोंकमें झूले ॥
कहीं पजमुरदा और कही फूले । हिसँ हैवों घर बघर डोले ॥
देरहीमो करीम नाम तुम्हें । ऐ अमल हाय सद सलाम तुम्हें ॥
आशकोंको दिखाया राहे सवाब । फासिकों के लिये शहीद अजाब ॥
सारा आलम बना खयालो खाब । कोई न देरीना सारे नकश बरआब ॥
सारे जान्दार दे गुलाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
सारे जान्दारको फँसा मारा । नहीं इस जीवका रहा चारा ॥
करके तदबीर तुमसे सब हारा । जिन्दा कर करके फिर फिर मारा ॥
देमुकद्दर बदस्त दाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
तूही बख्शिदा है अम नोअमाँ । मातहत तेरे सब हैं जिसभो जाँ ॥
तुझसे पैदा है वाणी वेदो कुराँ । अविदानो जाहिदाने जमाँ ॥
याद करते हैं सुबहो शाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥
सारे मजहब जहामें जारी हैं । पीर मुरशिदकी राह दारी हैं ॥
अर्श फशोंकी सब तयारी है । आजिज इसरारसे सब आरी है ॥
पेशवा भी किये इमाम तुम्हें । ऐ अमलहाय सद सलाम तुम्हें ॥

कर्मोंके चिन्ह

कालपुरुषने जीवधारियोंके शरीरमें कर्मोंके चिन्ह हैं । इस जीवने पूर्वजन्ममें जैसे कर्म किये हैं उसकी देहमें वैसेही चिन्ह बने हैं । सब जीवोंके शरीरपर चिन्ह होते हैं परन्तु मनुष्यके शरीरपर भली भाँति स्पष्ट प्रगट होते हैं । इसी कारण मनुष्यकी देहहीसे इसके कर्मोंका भली प्रकार हिसाब किताब हो जाता है । मनुष्यके शरीरके चिन्ह देखनेसे भलाई बुराई जानी जासकती है । जिस समय स्त्री के गर्भमें वीर्य स्थिर होता है उसके भीतर जीव होता है उसजीवके साथ उसके पहलेके किये हुए कर्म बन रहते हैं उसके भाग्यके अनुसार उसका शरीर प्रस्तुत होता है, समस्त रंग डील डौल पूर्वकर्मोंके अनुसारही होता है । जब यह माता गर्भसे निकलता है तो उसके पूर्वजन्मके कर्मोंके चिन्ह उसके शरीर पर होते हैं, पाँच वर्षके भीतर ये चिन्ह स्पष्ट प्रगट नहीं होते, जैसे जैसे यह बड़ा होता जाता है वैसेही वैसे इसके पूर्व कर्मके चिन्हभी दिखाई देते जाते हैं । तिल और मत्सा

इत्यादि भी पूर्वकर्मानुसार ही प्रगट होते हैं, बहुतेरे चिन्ह छिपे रहते हैं। शिरसे लेकर पैरतक सुकर्म तथा दुष्कर्मके चिन्ह भरे हुये हैं, कहीं दुर्भाग्यके तो कहीं सौभाग्यके चिन्ह होते हैं। यदि एक स्थानपर दुर्भाग्य और दूसरे स्थानपर सौभाग्य का एकही बातपर चिन्ह हो तो उसका मध्यम फल होता है। जो सामुद्रिक जानते हैं ये बातें उनको मालूम होती हैं। सामुद्रिक विद्या अत्यन्त कठिन है। जो सामुद्रिकमें प्रवीणहो वह मनुष्यका आकार देखकर सब कुछ कह सकता है।

कबीर साहबने इस सामुद्रिकके विषयमें बहुत कुछ कहा है कर्मोंके चिन्ह देखकर सामुद्रिकका ज्ञाता सब कुछ कह सकता है। इसी विषयपर एक उदाहरण देता हूँ—मैंने किसी अंग्रेजी पुस्तकमें पढ़ा था कि, हकीम सुकरात एक पाठशालामें अपने शिष्योंको पढ़ा रहे थे। उसमें एक सामुद्रिक जाननेवाला आगया, जब सुकरातके शिष्योंने जान लिया कि, यह पुरुष इस प्रकारकी विद्या रखता है तो उसको वे अपने उस्तादके निकट लेगये और कहा कि, इस पुरुषके दोष और अवगुण कहो। वह सामुद्रिक जाननेवाला इस बातको नहीं जानता था कि, वही हकीम सुकरात है। उस समय उस सामुद्रिकीने सुकरातकी देहके सभस्त चिन्ह देखे पहचानकर बोला कि, यह मनुष्य बड़ा पाजी, दुष्ट व्यभिचारी, झूठा, ठग, दगाबाज और दुष्कर्मों है। यह बातें सुनकर सुकरातके शिष्योंने उसके ठट्ठे उड़ाये हँसते हँसते बोले कि, यह मनुष्य झूठा है। तब सुकरात जो स्वयम् सामुद्रिक विद्या जानता था कहने लगा कि, तुम लोग इसको झूठा मत समझो। यह मनुष्य जो कहता है वह सत्य कहता है। उसमें कोई सन्देह नहीं क्योंकि, उसने जो कुछ कहा उन सब बुराइयोंके चिन्ह मेरे शरीरमें परिलक्षित हैं। मेरे शरीरमें वे सब चिन्ह ज्योंके त्यों बने हुये हैं मेरा स्वभाव वैसेही था परन्तु मैंने अपनी विद्या और योग्यतासे अपनी वासनाओंको भलीप्रकार दमन किया है। अपने हृदयको दुष्कर्मोंकी ओर हिलने नहीं दिया है भली प्रकार दृढ़ कर लिया है जिसमें तनिकभी हलचल न हो। ऐसा वासना दमन किया है कि, वे मूरदेकी तरह होगई हैं। परन्तु ये चिन्ह जली हुई रस्सीकी ऐंठनके समान शेष हैं। तब सुकरातके शिष्योंको निश्चय हुआ कि, हमारा उस्ताद सत्य कहता है, इस प्रकार पुरुषार्थ प्रारब्धपर जय पाता है। मनुष्य के अतिरिक्त कितनेही हाथी, घोड़ा बैल इत्यादि पशुओंमें भी ये चिन्ह देखे जाते हैं कि, जो लोग उनको मोल लेते हैं उनके भले बुरे चिन्होंको पहचान कर दुर्भाग्य तथा सौभाग्य जान लेते हैं। उनके कर्मोंके चिन्ह साधारणतः जड़ स्थावर पदार्थ पर प्रगट नहीं होते, गुप्त रहते हैं, परन्तु कभी कभी किसी चिन्हसे उनके पूर्व जन्मोंका चिन्ह प्रगट होजाता है। सर्व साधारण देखकर जान लेते हैं। सुतरां