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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

वेद तब और अब

भाषामें भी साम नाम गीतका है इसी लिये अंग्रेजीमें 'साम्स आफ डेविड' दाऊदकी गीतको कहते हैं, साम कहिये गीत और डेविड नाम दाऊदका है, अतः इस ज़बूरको सामवेद जानना चाहिये ।

त्रैसठवाँ प्रकरण

तीसरी किताब इञ्जीलका वृत्तान्त ।

यह इञ्जील ईसा नबीको उत्तरी । इस इञ्जीलको यजुर्वेद मानना चाहिये, अतः ये तीन किताब तो तीन वेदोंसे हैं, इन तीनों वेदोंको और इनके गुण मिलाकर देख लेना चाहिये ।

चौसठवाँ प्रकरण

चौथी किताब कुरानका वृत्तान्त ।

अन्तिम पैगम्बर हजरत मोहम्मद रसूलिल्लाह साहबके निमित्त कुरान उत्तरी यह किताब अथर्वण वेदसे है, यह अथर्वण वेदही है । जो बातें अथर्वण वेदमें हैं सोई बातें कुरानमें हैं । इस बातके प्रमाण अल्ला उपनिषदमें देखो, जो कोई अथर्वण वेदके अल्लाह उपनिषदको पढ़ेगा, स्पष्ट जान जावेगा कि यह कुरान वास्तवमें अथर्वण वेद है । अल्लो उपनिषदमें अल्लाके नाम और मुहम्मद रसूलिल्लाहकी स्तुति और उनके प्रतापकी स्तुति वर्णित है जो बातें कुरानमें हैं सो सब अल्ला उपनिषदमें तथा अथर्वण वेदमें हैं । यह कबीर साहबका बचन है कि, कुरान अथर्वण वेद है ।

पैंसठवाँ प्रकरण

आठ वेदोंका वर्णन ।

यह तो चारों किताबें पश्चिमी चार वेद हैं, पूर्वीय चारों वेदों सहित बही, संसारके पथदर्शक ठहरे । इन्हीं आठों वेदके आदेशानुसार सर्व मनुष्य चलते हैं एक जाति दूसरे जातिके साथ लड़ती और झगड़ती और एक दूसरेसे अपनेको अच्छा ठहराती है, अपनेको सत्यवादिनी तथा दूसरेको झूठी कहती है, उनको इस बातकी तनिक भी सुध नहीं है कि, उन सबका बनानेवाला एकही है तथा सबमें एकही बात है । ये आठों निरञ्जनकी ओरसे हैं, मनुष्योंको यह सुधही नहीं रही कि इन आठों वेदोंसे वे कैसे त्राण पासकते हैं । जिस अवस्थामें कि, आठों वेद स्वयम् धोखेमें पड़ रहे हैं, ऐसी अवस्थामें वे किस प्रकार मुक्तिमार्ग बता सकते हैं । इन वेदोंने न

तो परमेश्वरको पहचाना और न मुक्तिके यथार्थ पथकोही जाना । यदि हंस कबीर लोगोंको समझाते हैं कि, ये वेद तो भ्रम और धोखेकी टट्टी है, ये आठों वेद जञ्जालोंमें फँसे हुओंके निमित्त हैं, मुक्ति पाएहुओंके निमित्त नहीं तो कोई कहना नहीं मानता और व्यर्थ वादविवादके लिये प्रस्तुत होता है, सब संसारी मनुष्य इन्हींमें फँस रहे हैं और इन्हींको अपना धर्म समझते हैं ।

इन आठों वेदके निष्प्रयोजन टट्टे बहुत हैं, जिनको पढ पढकर सब मनुष्य अत्यंत प्रसन्न हो रहे हैं, । किसी प्रकारकी खोज कोई नहीं करता । न तो स्वसंबेद को कोई जानता है और न उसकी शिक्षाको स्वीकार करना उचित समझता है । अब इसके आगे पांचों देवताओंके पंथ प्रचारका वर्णन लिखा जाता है ।

छ्यासठवाँ प्रकरण

१ निरञ्जनका पंथ ।

पांचों देवताओंमें सबसे बड़ा निरञ्जन देवता है और जैसा कि, कबीर साहबने पंथ 'कबीरवाणी और अनुरागसागर और भवतारण इत्यादिमें लिखा है । वही तीनों लोकका रचयिता और स्वामी है । ब्रह्माण्डके सिरेपर उसकी स्थिति है । वही सहस्र दल कमलमें अपनी शक्ति सहित रहता है, योगसमाधि इत्यादि द्वारा उसका दर्शन होता है, यही तीनों लोकोंका राजा तथा सृष्टि रचयिता है और इसीकी पूजा समस्त संसार करता है । अब चारों देवी तथा देवताओंके धर्मोंका विवरण करता हूँ ।

सरसठवाँ प्रकरण

२ आदिभवानी-अद्याका पंथ ।

पहले आदिभवानी है, यह तीनों देवताओंकी माता है तथा बड़ी प्रभाव शालिनी है, तीनों देवता उसके सामने डरते कांपते हैं और उसकी सेवा किया करते हैं । इस अध्याने चाहा कि, अपने तीनों पुत्रोंकी परीक्षा करलू जिसमें जान पड़े कि, कौन, इन तीनोंमें उसके अनुकूल है जिसके साथ वह रहै ।

कालीपुराणमें इस प्रकार लिखा है कि, सृष्टिके उत्पन्न होनेके पहले तीनों भाई एक स्थान पर बैठे, एक वृक्षकी छाहमें आपसमें बातलाप कर रहे थे, उस समय उन लोगोंने ऐसा कौतुक देखा कि, एक रक्तकी नदी महावेगसे बही चली आती है, जिसमें निरा रक्तही रक्त है और कुछ नहीं है । उस नदीमें कूड़ा कुरकुट