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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

तत्त्वा और जीवा

एकता धर्म जिसके रचयिता कबीर साहब हुए हैं—

इसमें कोई संदेह नहीं कि, पन्द्रहवीं तथा लोलहवीं शताब्दीके बीच उत्तर भारत में कबीर साहबके धर्मका बड़ा प्रचार हुआ। इसमें संदेह नहीं कि, यही धर्म पञ्जाबी सिख धर्मकी जड़ है, यह इस बातसे जाना जाता है कि, कबीर साहबकी बाणी नानकशाह तथा उनके स्थानापत्रोंने स्थान स्थानपर अपनी पुस्तकोंमें उद्धृत की है।

षष्ठप्रमाण ६—ये ही महाशय अपनी पुस्तकके १६२ पृष्ठमें सिक्खधर्मके ग्यारहवें प्रकरणमें नानक साहबका विवरण करते हैं तथा जो कुछ वह करते हैं, वह ट्रम्प साहबके ज्ञातव्यकी उस विज्ञताके अनुसार करते हैं, जिसे कि, उन्होंने स्वयम् लाहौरमें आकर प्राप्त किया था, उनका लेख यह है कि, नानक शाहने नये धर्मके बनानेकी बात नहीं कही यथार्थमें उस धर्मकी जड़ कबीर साहबकी बाणी ही है। क्योंकि, कबीरके धर्म पुस्तकको ही वह अपनी पुस्तकमें उद्धृत करते हैं।

सप्तम प्रमाण ७— राजा शिवप्रसाद साहब बनारसी कृत तारीख आइ-नानुभा प्रथम भाग जो नौनाब लेपिटनेण्ट गवर्नर बहादुर, अवध पश्चिमोत्तर प्रान्त सन् १८७२ ई. की आज्ञानुसार सरकारी मुद्रालयोंमें सातवीं बार पाँच सहस्र छपा था। उसके एकसौ पाँच पृष्ठकी पहली पंक्तिमें यह लिखा है कि, पन्द्रहवीं शताब्दीमें कबीर साहबके शिष्योंमें से नानकशाहने सिक्खोंका एक नवीन धर्म प्रचलित किया।

अष्टम प्रमाण ८— डबल्यू. डबल्यू. हण्टर सी. आई. ई. एल. एल. डी. साहबने अपनी इण्डियन इम्पायर इतिहास पुस्तकके एक सौ चौरानबे पृष्ठमें कबीर साहबके कौतुकोंके विषयमें लिखा है। फिर इसी पुस्तकके १०३ और १०४ पृष्ठमें कबीर साहब तथा नानक शाहके विषयमें लिखा है।

नवम प्रमाण ९—एक दिवस साधू हॉसूदासजी आकर गोस्वामी धर्म दासजीसे कहने लगे कि हे स्वामीजी ! आज दिनतक एक साधु पञ्जाब देशसे आया है, उसने नानकशाहका विचित्र वृत्तान्त और करामातकी बातें सुनाई हैं। धर्मदास साहबने कहा कि, वह बातें सुनाओ हॉसूदासने कितनी ही बातें सुनाई उन्हें सुनकर धर्मदास साहबने कहा कि, हे हॉसूदासजी ! गुरु नानकजी तो मेरे गुरु भाई ही हैं।

दशम प्रमाण १०—गोस्वामी गरीबदास स्पष्ट रूपसे कहते हैं कि, नानकशाह तथा दादुराम इत्यादि कबीरसाहबके अनन्य शिष्य हैं।

एकादशमा प्रमाण ११ कितनेक कबीर पन्थी विद्वान्, गुणी साधु कहते हैं कि नानकशाह, कबीर साहबके शिष्य हैं । इसमें कोई सन्देहही नहीं है ।

द्वादशमा प्रमाण १२— जब यह फकीर (अर्थात् पुस्तकका रचयिता) सन् १८५२ ई. में अपने गुरु महाराजके साथ था वह भी यही कहा करते थे कि, नानकशाह कबीर साहबके शिष्य हैं अनेक बार उनका विवरण मेरे समक्ष करते थे जिससे मैंने जाना कि, वास्तवमें नानकदेव कबीर साहबके अनन्य शिष्योंमें हैं । अनेक पुस्तकोंमें कबीर साहब तथा नानक साहबका वृत्तान्त लिखा हुआ है । अब मैं इस पुस्तकके अन्तमें (आठवें परिच्छेदके १२२ प्रश्नके उत्तरमें) समप्रमाण और भी लिखूंगा ।

नानकशाह साहबके जन्म साखीकी विशेष बातें ।

यहाँ अब मैं वह बातें लिखता हूँ जिनको स्वयम् नामक साहबकी जन्म साखीसे चुना है । सब जन्म साखियोंमें भाई वालेकी जन्म साखी सर्वोत्कृष्ट तथा बड़ी प्रामाणिक मानी जाती हैं, इसी जन्म साखीको सब मानते भी हैं । नानक साहबके परमधाम सिधार जानेपर भाई बाला गुरु अङ्गदजीके पास गया । अङ्गदजी नेत्रोंमें जलभर कर उससे कहने लगे कि, हे भाई बाला ! आप तो गुरुजीके साथ फिरते रहे हो आपको सब वृत्तान्त अच्छी तरह मालूम है । मुझे सत्यगुरुके भ्रमण तथा घूमने फिरनेका सब हाल कहो । इस बातपर भाई बालाने गुरु अङ्गदजीसे जो कुछ कहा वही बात इस जन्म साखीमें लिखी हुई है । यह जन्म साखी सम्बत् १५८३ विक्रमीकी है जिससे ये बातें लिखी गई हैं । सवाल जवाब पंजाबीमें है उनका साथही साथ अर्थ कर दिया गया है । जन्म साखी २६६ पृष्ठ भाई मरदाना नानक साहबसे प्रश्न करता है कि—

प्रश्न—हे महाराज तू सानू जो गुरु मिलिया सो कौन मिलिया, आहा ते नाम उसदाकी आहा ।

अर्थ—हे महाराज ! तुमे कौन गुरु मिला है, उसका नाम क्या है !

उत्तर—ता फिर नानकजीने कहिया, नाम उसदा बाबा जिन्दा हुआ है, जित्यै तोड़ी पवन और जल है सब उसदे बचन बिच चलदे हैं ।

अर्ध—उसका नाम बाबा जिन्दा है, जहाँतक पवन और जल हैं, सब प्राणी उसकी अज्ञाके बीच चलते हैं ।

फिर देखो (पृष्ठ २२६) भ्रमणके समय एक साधुने नानक साहबसे पूछा कि, तुसाड़ा (अर्थात् तुम्हारा) गुरु कौन है ? तब नानकजीने उत्तर दिया था कि, मेरा गुरु जिन्दा है ।

फिर देखो ३४६ पृष्ठ । जब नानक साहब कन्धार देशको गये तब उनको यारअली नामक एक फकीर मिला । उसके नानकशाहसे बहुतेरे प्रश्नोत्तर हुये । उनमें एक प्रश्न यह भी था—

बारअलीने पूछा कि, आपका गुरु कौन है ! तब नानक साहबने उत्तर दिया कि, मेरा गुरु बाबा जिन्दा है ।

अब मैं यहाँ वही भाषा लिखता हूँ जिसमें यारअली और नानक साहबमें बातें चीतें हुई थीं—

बोलो भाई बाहु गुरु ! नानक उभ्ये उडारी लेभो ता जाय कन्धार विच्छ खड़े हुये । उत्थे एक मुगल फकीर आहा उस नाल भेट गई तब उसने पूछया ।

अर्थ—नानकजी वहाँसे उडके कन्धारमें पहुँचे वहाँ एक मुगल फकीरसे भेट हुई, तब उसने नानक साहबसे पूछा ।

“शु’माचे नाम दारी? ता गुरु नानक बोल्या” मा’, नाम नानक निरङ्कारी! फिर मुगल बोल्या “न’ फहमीदम” ता गुरु नानक बोल्या मा’ बन्द ए खुदायेम । फिर मुगल बोल्या, “शुमा’ पीर कुदाम” ता गुरु नानक बोल्या, मा’ पीर जिन्दा पीर” ता फिर मुगल बोल्या “शुमा’ पीर जिन्दा पीर” ता गुरु नानक कहा? आरे’ आ’रे । ता फिर मुगल कहा? ‘मा’ एतकादनेस्त” ता गुरु नानक कहा । “चेगुप्त” ता “मुगल कहा, पैदा” शुदी मुरीद शुदी ।

ता गुरु नानक कहा, “यक” खुदाय पीर शुदी कुल आलम मुरीद शुदी फकीर खबरदार निगाह दीगर नदारी । ता मुलग’ पीर उत्थ डगा ।

ता गुरु नानक कहिया, “एक” खुदायदीरा दीगरे नेस्त । ता मुगल बोलिया “शुभा” पीर मामुरीद।”

ता गुरु नानक कहिया “शु”मानाकचे’दारी” ता मुगल कहिया “ना”म मन यार अलीअस्त” ता गुरुनानक कहिया, “ना”म शुमाबाबुलकन्धारी ।”

पृष्ठ ३९६ जब नानक शाह बाबर बादशाहके साथ वार्तालाप कर रहे थे, तब बाबर शाहने पूछा कि, सुन नानक ! तू कबीरका चेला है ? तब गुरु-नानकने कहा, हाँ ।


१ प्र०—तुमारा नाम क्या है? २ उ०—मेरा नाम नानक निरंकारी है । ३ प्र०—मैंने नहीं समझा । ४ उ०—मैं ईश्वरका दास हूँ । ५ प्र०—तुमारा कौन गुरु है । ६ उ०—मेरा जिन्दा पीर गुरु है । ७ प्र०—तुमारा गुरु जिंदा पीर है ? । ८ उ०—हाँ हाँ । ९ मुझे विश्वास नहीं है । १० क्या कहा ? ११ पैदा होते ही शिष्य हुआ । १२ ईश्वर-गुरु है संसार चेला है सन्तको उसके अतिरिक्त दूसरी दृष्टि नहीं होती । १३ मुगल चरणोंपर गिरा । १४ एक ईश्वरके बिना दूसरा कोई नहीं है । १५ आप मेरे गुरु, मैं आपका चेला हूँ । १६ तुमारा नाम क्या है ? १७ मेरा नाम यारअली है । १८ तुमारा नाम बाबुल कन्धारी ।