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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

नाशकी सात शाखाएँ, जीवका अम्र. जगतको असत् प्रतिपादन

न्याय, सांख्य, सीमांसा, वैशेषिक, योग और वेदान्त आदिके अभिमानो भ्रमके धोखेमें सारे गये किसीको भी स्थिति न मिली । इनमें पड़े हुये सब अंधोंके समान टटोलते फिरते हैं । कहीं कुछ स्थिति नहीं पाते वेदान्ती एक ब्रह्म अद्वैतका अभिमान करते हैं वो तो कहने सुननेमें नहीं आता सब वाणी बचन द्वैतमेंही होते हैं । संन्यासी दशनामी वेदान्ती होनेका अभिमान करते हैं । संन्यासी और योगी, दोनों शिवलिङ्ग पूजते हैं । शिवलिङ्ग और जीवलिङ्ग समानही है, इन दोनोंमें कोई विशेषता नहीं । शिवलिङ्ग और जीवलिङ्ग दोनों बन्धनके कारण हैं । इस कारण इसके पूजनेवाले भ्रम और धोखेमें पड़े हैं, कोई अपनी भूलपर ध्यान नहीं देता दो अन्धोंके समान परस्पर विरोध करते हैं । एक दूसरे अपने अपनेको एक दूसरेसे श्रेष्ठ समझते हैं । सबके सब अपने भ्रामिक विचारमें मग्न हो जीवन नष्ट कर रहे हैं ।

कबीर पन्थका जैनमत निरूपण ।

पाठकगण ! जैनधर्मवाले लोग अब वेदको नहीं मानते । जैनी पंच परमेष्ठीकी पूजा करते हैं । त्रयशठ शलाका और अनेक देवी देवताओंकी भी पूजा करते और मानते हैं ईश्वरको जगतका कर्ता नहीं मानते वरन् कर्मकोही सृष्टिका कर्ता मानते हैं । जीवोंपर दया करना परम धर्म मानते हैं ।

जैनियोंके कई फिरके दान पुण्य विशेष नहीं करते । हिन्दू लोग ऐसे फिरकोंको नास्तिक कहते हैं, इनके पांचों परमेष्ठियोंको बन्धनमें बतलाते हैं । जैनी नानाप्रकारकी पूजा पाठमें प्रवृत्ति करके यथार्थसे वंचित रहे सत्यमार्गको छोड़कर नानाप्रकारके पाखण्डकोही अपना धर्म समझ बैठे ।

कबीर परिचयका शब्द ।

सन्तो जैनीको भ्रम भारी ।

जैन नाम जाको जय नाहीं, क्षयकी राह पसारी ॥

जीव द्रव्य पुदगल कहि बरणै, धर्म अधर्म सो चारी ।

पँचये काल द्रव्य कह छठयें, पात्र अकाश बिचारी ॥

आपन आपन गुण कर्मणिको, यह षट् करता मानै ।

कियो न कहै अनादि निधान है, जिन्ह कियो ताहि न जानै ॥

जो पुदगलके त्याग निमित्त, साधन अमित कमावै ।

सो पुदगल पाहन मूर्ति कारे, गुरु कहि शीश नवावै ॥

वीतराग सर्व पुदगल ते, लिखि सो बानी बाँचै ॥

पुदगल शिखर इष्ट कहि आगे, नारी पुरुष मिली नाचै ॥