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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

हिन्दू मुसलमान ईसाई और यहूदी लोगोंसे प्रार्थना

जो होना है अदमके मुल्क राही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
ऋषेश्वर तारकुदुनुनिया दिगम्बर । हुये जो बे अदद पीरो पैगम्बर ॥
खुदा आगे जलाया ऊद व अम्बर । दिया बुतलान पर जिसने गवाही ॥
हुये सदहा जो दुनियामें सलातीं । पड़े दर कैंद शहवत शयातों ॥
हजारों सानअ और मसनूआ जहाँमें । रहे खाली जो अपने दिलहलाही ॥
जो होना है अदमके मुल्कराही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
हजारों कैंसरो दारा सिकन्दर । किया क़बजः जमीं दरियावबन्दर ॥
किते सिद्ध साधु और सूफी क़लन्दर । गई उनकी न अन्दरकी स्याही ॥
जो होना है अदमके मुल्कराही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
जो मूठी बांधकर दुनियामें आवे । क़रारो कौल अपना सब भुलावे ॥
पसारे हाथ खाली फेर जावे । गदा और शाहपर आवे तबाही ॥
जो होना है अदमके मुल्क राहो । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥
हिर्स हैवाँ जब आदमको बरा । तो दिन दोपहरको देखे वह अंधेरा ॥
कहे आजिज यह तेरा है वह मेरा । बिछाया दामसब जा मिहर व माही ॥
जो होना है अदमके मुल्क राही । गदाई है भली अज्ज बादशाही ॥

ग़ज़ल ।

बानबाने अजब लगाया बाग़ । किस्म सदहा परिन्दः बुलबुलोजान ॥
केतरेँग ढ़ंगके भरे जानदार । पर न देखा कभी कोई बेदाग़ ॥
बे अदद गुज़रे हैं अक़लो फ़हीम । कोई न दरवेश साहै आलीविभाग ॥
दुनियावी कीच फँस रहे सारे । नरहार्ई हुई न बाल फ़िराग़ ॥
कुल आलम अदमके मुल्क सभा । जिसका कोई कहीं नहीं है सुराग़ ॥
न हुकमा व शह निशां आजिज । कन्न दर्वेश पर जलाते चिराग़ ॥

तरजीआ बन्द

दुनियाभर भूल भूलैयाँ है । सब भूले अपना सपैयाँ है ॥
त्रिलोक न ढूँढे पाया है । क्योकर पड़े इस पटियाँ है ॥
निःसंग सभास्थानक साथी है । गये दूर हैं अपने जो गोइयाँ हैं ॥
पहचान नहीं सब भूल पड़े । निजरूप नहीं सब छैयाँ है ॥
सब मिट्टी पानी गारा है । यह निन्दबडी बट मारा है ॥
जो पूरब पश्चिम जाओगे । दश दिशा न ढूँढे पाओगे ॥
सब तीरथ तीरथ भरमो । सौ बार जो गंग नहाओगे ॥

सब पोथी थोथी सार नहीं । पण्डितसे वेद खोलाओगे ॥
कर योग जतन नहिं जाय रतन । सब खाली देख चिलाओगे ॥
क्योंकर मिल अपना प्यारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥

अब आन पढ़े इस जंगल हैं । आदम नहीं सब पशु दङ्गल है ॥
मन हाथी जंगल नास करे । यह मस्त महा मन मङ्गल है ॥
माने न पोथी तेरीको । क्या वेद व्याकरण पिङ्गल है ॥
वह जान कहाँ बलवान् कहाँ । बन्धे जो ज्ञानके सङ्गल है ॥
कोई संत जो मिले कढ़ारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥

कहाँ सतगुरु संत सिपाही है । निज नेत्र उसपर बाही है ॥
पकड़े चोर और गठ कटोंको । कम्मों का जङ्गल दाही है ॥
जो अगम निगमके पारा है । सो संत वहाँका राही है ॥
धरती पर धरम धराया है । धूर धाम की नोत निवाही है ॥
आजजि खुदतर और तुम्हारा है । यह निन्द बड़ी बट मारा है ॥
इति ।

विविध उपदेश संग्रह

विद्याभिमानियोंको उपदेश ।

विद्याभिमानियों की बुद्धि ठिकाने न रही, उनके अन्तःकरण तर्क वितर्क और संकल्प करते रहते हैं। जबतक उनके ऐसे विचार रहेंगे तब तक वे सन्तोंके उपदेश योग्य नहीं हो सकते। वे मनुष्यकी चार अवस्थाओंपर भी विचार नहीं करते। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरिया; येही चार अवस्था, इनके व्यवहार रङ्ग ढङ्ग भिन्न भिन्न हैं, चारोंही भ्रम हैं।

जाग्रतकी सामग्री स्वप्नावस्थामें किसी काम नहीं आती, उसी प्रकार शरीरभत (कर्मकाण्ड) हकीकत (ज्ञान) तरीकत (योग) और मारफत (विज्ञान) ये सब भी वैसेही हैं। जितने पुस्तकालय हैं सब शरीरभत (कर्मकाण्ड) काही वर्णन करते हैं, जितना लिखना कहना आदिक है सब जाग्रत अवस्थाके लिये हैं। स्वप्नावस्थामें कुछ काम नहीं आते। स्वप्नावस्थामें मूर्ख और पण्डित सब एक समान होजाते हैं। जाग्रत अवस्थाका ज्ञान स्वप्नावस्थामें काम आता तो विद्वानोंमेंसे कोई भी किसी प्रकारका अपराध नहीं करता। जब कि स्वप्नावस्थामें विद्वान् और मूर्ख सब एक समानही होगये तो विद्वान् और मूर्खोंमें