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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

मुहम्मद साहिबको चेतानेका वृत्तान्त मुहम्मद साहिबके मेआराजके विषयमें मत भेद

शिष्य होनेके दूसरे दिन कबीरसाहब सबेरहीसे स्नान तिलक ध्यानमें लगे । गलेमें एक माला और जनेऊ डाल और द्वादश तिलक करके साक्षात रामानन्दियोंके समान बेष बना लिया, । वैष्णवोंकासा वेष बनाते देखकर नीमाने कहा “बेटा ! यह क्या करते हो ? किसने तुम्हारी बुद्धि ऐसी फेर दी, कि, अपने धर्म कर्मको छोड़के दूसरे धर्मवालोंकी राहपर चलते हो !” उस समय कबीरसाहबने नीमा और नीरुसे अत्यन्त नम्र भावके साथ निवेदन किया, कि, ए मात ! यह एक भ्रमही है कि, यह दीनमें तथा यह वेदीन है धर्म हमारा है यह दूसरेका है ।

सत्य पुरुष सबके लिये एक है उसका कियेसे भेद भाव नहीं है बोही सबका रचनेवाला है सिवा उसके और कोई कर्ता धर्ता और विधाता नहीं राम रहीम सब उसीके नाम हैं पीर फकीर और साधु सब अपने २ ढंगसे उसीका नाम लेते हैं ।

इस प्रकारके अनेकों उपदेशोंके बाद माता पिता दोनों शान्त हो गये आप सदाकी तरह दोवटी बुनकर बाजार में बेच दिया करते धर्म पूर्वक जो उसे मिलता उसीसे साधुसेवा कर दिया करते यदि अधिककी आवश्यकता होती हो स्वयं भगवान् पूरी करते ।

जब कोई सन्त महात्मा आपके घर आवे तो उनके भोजन बनानेके लिये चौका लगवाते । कोरे वरतन मंगवाकर विशुद्ध भोजनका सामान तयार करके देते अपनेसे जो भी कुछ हो सकती उतनी उसकी सेवा चाकरी करते । यहाँतक कि, इस कामसे उनकी परमस्नेह रखनेवाली माता भी इस कृत्यके करते करते अकुता जाती थी पर कबीर साहिबके प्रेम तथा उनकी आकर्षण शक्तिके आगे सब नतमस्तक ही रहते थे । माताका भी साहस नहीं होता था कि, वो कबीरके कथनको न माने माता का अकुलाना इसी इस शब्दमें आया है ।

शब्द — हमारे कुलकोने राम कह्यो ॥

सुनो घोरनियौ सुनो जिठनियौ, अचरज एक भयो ।

सात सूत या मुंडिया खोये मुंडियौ क्यों न मेरा ।

माय तुरकिनी बाप जुलाहा बेटा भक्त भये ॥

जबकी माला लई इन पूते तबते सुख न भये ।

नित उठ कोरी गागर मांगत लीपत जन्म गये ॥

पकज शत मुंडिया और सुवे कबीरा कहांते भये ।

रोय रोय कहत कबीरकी माता बेटा मरन गये ॥

हँसि हँसि कहत कबीरकी भँना भैया अमर भये ।

कहँहि धर्मदास सुनो भाई साधो कबीरा साहिब भये ॥

भाव—हमारे वंशमें 'राम' किसने कहा है ए देवरानी ज़िठानियों ! सुनो, एक बड़े अचरजकी बात है वा मुड़ियाने सातसूत खोये हैं फिर भी यह मेरा नहीं है मा तुरकिकी बापु जुलाहो किन्तु बेटा भक्त बन रहे हैं । जबसे इसने कंठी माला हाथमें लीं हैं उस दिनसे, मुझे कुछ भी सुख नहीं हुआ । सौ कमलकी कलियाँ कबीरको जन्मावें यह कबीर हुआ कहाँसे हैं कबीरकी माँ रो २ कर कहती है कि, ऐसा कबीर मरा भी नहीं यह सुन कबीरकी बहिन कहती है कि कबीर तो सत्य पुरुषका पथप्रदर्शक है । धर्मदासजी कहते हैं कि, ए साधुओ ! सुनो ! कबीरजी साहिब हुए हैं । एक दिन किसीने आपसे कह दिया कि, आपका घर बड़ी बुरी जगहमें है । इस पर आपने उत्तर दिया कि—

कबीरा तेरा झोंपड़ा गलकटियोंके पास ।

जेकरेंगे सो भरेंगे तुम क्यों हुए उदास ।

भाव—ए कबीर ! तेरा झोपड़ा कसाइयोंके पास है पर जो करेंगे वो भोगेंगे तुम क्यों उदास होते हो ? आपका निजी परिवार कमाल कमाली और लोईका था ये तीनों आपको स्वामीजी कहते थे । पं. हरदेवके साथ कमालीका गान्धर्व विवाह कर दिया था । अन्ततक नीमा नीरूको इनका बोध नहीं हुआ था जहाँतक कि, माताने मसाल हाथमें लेकर इनके विरुद्ध सिकायत की थी । अन्तमें इन्होंने गुरुचरणोंको ही अपना शरण बनाया तथा गुरुका सन्निधिमें अधिक समय लगाने लगे ।

कबीर दासजीके बड़े भंडारेके बाद नीमा और नीरू तो कालवश हो गये आप घरका त्याग करके सत्यपुरुषके सन्देश सुनाने आदिमें समय बिताने लगे । जब भगवान् रामानन्दजी भगवान्की मानसिक पूजा करते थे उस समय सब शिष्य लोग अपने २ नित्य नियमोंमें लग जाया करते थे यदि देर हो जाती थी तो प्रतीक्षा करते हुए वहाँ बैठे रहते थे पीछे नित्य नियमसे उठनेपर सब दर्शस्पर्श करके अपनी २ कुटियोंमें चले जाते थे ।

इसी प्रकार एकदिन रामानन्दजी स्वामी मानसिक ध्यानमें मग्न थे । उस समय ठाकुरकी माला छोटी हो गयी । तब स्वामीजीको बड़ी चिंता हुई कि, अब ठाकुरके गलेमें इसे कैसे पहनाऊँ । तब कबीर साहब स्वामीजीके मनकी बात जानकर बोले कि, स्वामीजी मालाकी गॉठ खोलकर ठाकुरको माला पहनाओ । स्वामी रामानन्दजीने ऐसाही किया । इस प्रकारके अनेक कौतुकोंको

देखकर स्वामीजीकी इच्छा हुई कि, जानना चाहिए यह कबीर कौन है जो ऐसे २ कौतुक किया करता है इस कारण स्वामीजीने ठाकुरका ध्यान किया तब ध्यानमें दिखाई दिया कि, 'ठाकुरके सिंहासनपर जो ठाकुर की मूर्ति है उसके शिरके ऊपर कबीर साहबका सिंहासन रक्खा हुवा है । जब कबीर साहबकी ऐसी बड़ाई और इतना प्रताप दृष्टिगोचर हुवा तबसे स्वामीजी कबीर साहबकी बड़ी मर्यादा करने लगे अनेक बार स्वामीजी कबीर साहबकी प्रशंसा किया करते थे । रामानन्द तो कबीर साहबकी प्रशंसा किया करते और कबीरसाहब अपने गुरुके गुण गाया करते थे ।

उस समय गोरखनाथ योगी जो बड़ाही बलिष्ठ सिद्ध था वह प्रायः रामानन्द स्वामीसे आकर वाद विवाद किया करता था, एकबार उसका सामना कबीर साहबसे हुआ । कबीर साहबका गोरखनाथके साथ बड़ाही वाद विवाद हुआ । दोनोंही ओरसे अनेक कौतुक दिखलाई दिए । जो लोगोमें प्रसिद्ध हैं । अन्तमें गोरखनाथ परास्त हुआ । और अपनी सेली और टोपी कबीर साहबके चरणोंपर चढ़ा दंडवत् प्रणाम करके एक ओरको चलता बना ।

अध्याय ॥ ४ ॥

सिकन्दर लोदी बादशाहका काशीमें आना कबीर साहबका वहाँ बुलाया जाना उनके दर्शनसे बादशाहके शरीरकी जलन दूर होना सुलतानका उनपर विश्वास लाना—

सम्बत् १५४५ विक्रमीमें बहलूलका पुत्र सिकंदर लोदी काशी नगरमें पहुँचा, बादशाहके शरीरमें जलनका रोग था । वह भी ऐसा कि, उससे उसका शरीर रात दिन जला करता था । उस रोगसे उसे तनिक भी चैन नहीं मिलता था । तब लोगोसे उसने पूछा कि, इस नगरमें कोई ऐसा भी है जो मुझे इस रोगसे मुक्त कर सके ? तब वे लोग जो कबीर साहबसे द्रष्ट रखते थे बोले कि, यहाँ कबीर नामक एक फकीर है । यदि वह आवे तो श्रीमान् आरोग्य हो सकते हैं (ऐसा कहनेका उनका तात्पर्य यह था, इस बहानेसे कबीरको बादशाहके सामने बुलवाकर मरवा डालें, जब लोगोंने बादशाहसे ऐसा कहा तब बादशाह ने आज्ञादी कि, तुरन्त कबीर साहबको बुला लाओ विलम्ब होने न पावे । शाही आज्ञा पातेही भूत्यगण दौड़े और कबीर साहबसे आकर कहा कि, आपको बादशाह बुलाते हैं शीघ्र चलो । कबीर साहब बादशाहके सामने आए । बादशाह आपका दर्शन पातेही उसी समय रोगमुक्त होगया । शरीर ठंडा हो गया, बड़ा सुख पाया । तब बादशाह सिंहासनसे उठ खड़ा हुवा । बड़ी प्रतिष्ठाके साथ

कबीर साहबको अपने बराबर बिठालिया ॥ यह कौतुक देखकर वैरियोंके दाँत खट्टे हो गए, जिह्वा बंद हो गई । उस समय ब्राह्मण और काजी जो कबीर साहबसे द्वेष रखते थे बादशाहसे फरियाद करने लगे कि, यह कबीर बड़ा काफिर है । हिन्दू तथा मुसलमान दोनों दीनोंके विरुद्ध है, अपनेको परमेश्वर कहता है । प्रत्यक्षमें पुकारता फिरता है कि, मैं समस्त संसारका रचयिता हूँ सदैव कुफ़्ही बकता रहता है । ये बातें सुनकर बादशाहने पूछा कि, ऐ कबीर ! क्या यह बात सत्य है कि, आप अपनेको परमेश्वर कहते हो ? देखो गरीबदासजीकी वाणीमें (कबीरचरित्र बोध पृ.३३)

गरीबदास वचन ।

शाह सिकन्दर बोलता, कह कबीर तू कौन ।
गरीबदास गुज़रै नहीं, कैसे बैठा मौन ॥

उत्तर कबीर साहबका ।

हम ही अलख अल्लाह हैं, कुतुब गौस गुरु पीर ।
गरीबदास मालिक धनी, हमरो नाम कबीर ॥
मैं कबीर सर्वज्ञ हूँ, सकल हमारी जात ।
गरीबदास पिंडदानमें, युगन युगन सँग साथ ॥
शाह सिकंदर देखकर, बहुत भए मिसकीन ।
गरीबदास गति शेरकी, थरकीं दोनों दीन ॥

जब कबीर साहबने प्रत्यक्षमें इस बातको कहा एवं सर्व साधारणके सामने शाही इजलासमें अपनेको परमेश्वर होनेका दावा किया । खुल्लेमखुल्ला कहा कि, मैं समस्त सृष्टिका रचयिता हूँ । तब बादशाहने एक गाय मँगवाई और अपने सामने हलाल करवाकर कबीर साहबसे कहा कि, यदि आप परमेश्वर हों तो इस गायको जिला दीजिये ।

गरीबदास वचन ।

गऊ पकड़ बिसमिल करे, दरगह खंड वजूद ।
गरीबदास उस गऊका, पिए जोलाहा दूध ॥
चुटकी तारी थाप दे, गऊ जिलाई वेग ।
गरीबदास दूहन लगे, दूध भरी है देग ॥

शाहने गायको हलाल करवा कबीर साहबसे कहा कि, इसे जीवित करिये तब कबीर साहबने उस गायके थापी दी तथा चुटकी मारी—उसी समय वह गाय उठ खड़ी हुई । उसका सब घाव तथा दर्द मिट गया । उसके स्तन दूधसे भर