कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
मरुडजी महाराज
पड़े । तब दरियाखों उनके समीप आकर कहने लगा कि, आपपर इतने पत्थर पड़े पर आपने आहतक नहीं कि, मैंने तो केवल एक फूलकी पाँखुरी ही चलाई थी । इसके लगते आप हाय हाय करके गिर पड़े इसका कारण क्या है ? कमालजीने कहा कि, सुन दरियाखों ! तू शिष्य था मैं तेरा गुरु था । तूने परमेश्वरका भय न किया मेरी इतनी अप्रतिष्ठा की । मुझको पत्थरोंने इतना घायल नहीं किया जितना तेरे फूलने किया है । तूने संबारको पसंद किया उससे मित्रता की । अब तेरी मुक्ति न होगी, तू भूत होगा । इस बातपर दरियाखों पश्चाताप करने लगा तथा दुखी होकर क्षमाकी प्रार्थना की, परम कमालजीने उसे क्षमा नहीं किया । इधर नौवाब मुहम्मदशाहके शरीरमें आग लग गयी वह जलने मरने लगा । तब क्षमा २ कहता हुआ कमालजीके चरणोंपर गिरकर कहने लगा कि, मेरा अपराध क्षमा करो मुझको अपना शिष्य बनाओ ।
मुहम्मद शाहकी अत्यन्त नश्रुता तथा निवेदनको देख, कमालजी दयालु हुए । शाहके शरीरकी जलन मिट गई, वह कमालजीका शिष्य हो गया । जब स्वयम् नौवाब उनका शिष्य हुआ तब कमालजी भली भाँति उपदेश तथा शिक्षा देने लगे । उस समय कमालजीके बहुत सेवक तथा साठ शिष्य होगये पर दरियाखोंका अपराध क्षमा नहीं किया । तब फिर कमालजी मुहम्मदशाह और दरियाखों इत्यादि मनुष्यों सहित बनारसमें कबीर साहबके निकट गये । उन सबोंने सत्य-गुरुको दण्डवत् प्रणाम करके द्रव्य तथा मणि माणिक भेंट किया । वह देखकर सत्यगुरुने कहा कि, हे कमाल ! तू मेरा योग्य शिष्य नहीं है । कंकर पत्थर धन दौलत काहेको लाद लाया, हम साधु हैं । इन सब वस्तुओंसे हमें क्या काम है ? यह कहकर सब गरीबोंको बाँट दिया । उस समय दरियाखोंने सत्यगुरुके सामने दोहाई दी कि, मुझसे यह दोष होगया । वो मैंने क्षमा प्रार्थना की पर मेरा अपराध क्षमा नहीं होता । आप मेरा अपराध क्षमा कीजिये । कबीर साहबने दरियाखोंसे कहा कि, यदि मैं तेरा अपराध क्षमा करदूँ तो मेरे धर्ममें विभिन्नता आती है । क्योंकि, गुरुकी श्रेष्ठता मैंनेही स्थापित की है वो मर्यादा न रहेगी । मेरे नियममें बाधा उपस्थित होगी । इस कारण तू अपने सत्यगुरुसे क्षमा माँग । कमालजीको डाँट दिया कि, तू जो इस प्रकार श्राप देगा तो गुरुवाई योग्य न होगा । तूने उसको श्राप क्यों दिया ? तू इसका अपराध क्षमा कर । * कमालजीने दरियाखोंका अप-
- अहमदाबादमें कबीर पन्थियोंमें प्रसिद्ध है कि, कमाल साहबने दरियाखाँका अपराध क्षमा करते समय इस प्रकार कहा था कि, जब तुम्हारा कन्न फट जावेगा और गुम्मज दीख जायेगा उसी दिन भूतयोंनिसे मुक्त होंगे । कई वर्षोंसे दरियाखाँकी कन्न फट गई और गुम्मज तथा दीवारें आर पार दक्क गई हैं । इस घटनाके कारणसे लोगोंकी दन्तकथा प्रमाणित हुई है और लोगोंका विश्वास बहुत बढ़ा है । अहमदाबादमें कमाल टेकरा नामसे एक प्राचीन स्थान भी है—
राध क्षमा किया । सत्यगुरुने सबको दयादृष्टिसे देखा सबोंपर उसकी दया हुई सबोंने सत्यगुरुकी आज्ञा मानी एवं सभी प्रसन्नतापूर्वक बिदा होकर वहाँसे अपने स्थानको उछलते कूदते हुए चले आये तथा आज्ञाके अनुसार प्रचार करने लगे । गरीबदास ।
दिल्लीके पास हरियाना प्रान्तमें छोडियानी नामका एक गाँव है । उसीमें एक जाटके घर सम्बत् १७७४ विक्रमीमें गरीबदासजीका जन्म हुआ था । उन्होंने सम्बत् १७९७ विक्रमीमें कबीर साहबका दर्शन पाया था । सत्यगुरुके उपदेशसे गरीबदासजीका अंतःकरण शुद्ध हो गया था । उनकी जिह्वासे ज्ञानमयी वाणीकी झड़ी लग गई थी । उपदेश सुननेवालोंकी भीड़ अधिकाधिक होने लगी, अतएव अन्तमें पन्थ स्थापित हुआ, तो कबीर साहबके बारह पंथ कहे जाते हैं । गरीबदासजी उनमें अन्तिम पंथके आचार्य हैं । अपने ग्रंथमें गरीबदासजीने कबीर साहबकी बड़ी प्रशंसा लिखी है । कृतज्ञ शिष्यका कर्तव्य भी यही होना चाहिये । गरीबदासजी, गुरुकी श्रद्धा भक्ति तथा प्रेममें वैसेही दृढ़ थे । भादों सुदी दूज सम्बत् १८३५ विक्रमीमें, छोडियानीमें अचानक गुप्त हो गये । वहाँ अबभी उनकी समाधि बनी हुई है ; जिसके दर्शनके लिये सालमें कई एक बार मेला लगा करता है ।
ऐसा सुना जाता है कि, गोसाईं गरीबदासजी छोडियानीमें गुप्त होकर फिर राजपुतानामें प्रगट हुये । वहाँ एक दिन जंगलमें फिर रहे थे कि, जयपुर तथा जोधपुरके दोनों राजाओंको दर्शन प्राप्त हुआ । ये राजा उस समय शिकार खेलनेके लिये जंगलमें गये थे इनकी तेजस्विताको देखकर दोनों राजोंने विचार किया कि यह तो कोई बड़े श्रेष्ठ महात्मा हैं । दोनों राजोंने प्रार्थना की कि, महाराज ! हमें अपना शिष्य करलो । गोसाईं साहबने अस्वीकार किया कि हम किसीको अपना शिष्य नहीं बनाते । तब दोनों राजोंने बड़ा हठ किया कि, आप हमें अवश्यही अपना शिष्य बनालें । राजाओंने अत्यन्त विनीतभावसे विनय की कि उस समय गोसाईं गरीबदासजीने कहा कि, तीन नियमोंके स्वीकार करने पर तुम लोगोंको शिष्य करूँगा । प्रथम—अपना अपना आधा आधा राज्य मुझको दो । द्वितीय—अपनी अपनी लड़कीका डोला दो । तृतीय—मुझे पेट भर भोजन करा दो ।
यह बात सुनकर राजाने उत्तर दिया कि, महाराज ! हम अपना समस्त राज्य और अपनी सब लड़कियोंका डोला आपको देवेंगे परन्तु आपको पेट भर खिलानेकी प्रतिज्ञा हम नहीं कर सकते । फिर उनको बिना शिष्य किये ही वहाँसे अन्तर्धान होकर सहारनपुर नगरमें प्रगट हुये । पैंतीस वर्षतक सहारनपुरमें
रहे । भूमंड भक्त इत्यादिने आपसे बड़ा लाभ उठाया । गरीबदासजीने वहाँ अपने हाथसे एक बगीचा लगाया एवं अनेक लोगोंको कौतुक दिखाया । इसके पीछे जब उनकी मृत्यु हुई तब वहाँ उनकी समाधि तथा छतरी बन गई । उनकी बाटिका उनके सेवक भूमंड भक्तके आधीन रही । कुछ दिनोंके पीछे गोसाईं-जीकी बाटिकाके दोनों बेल मर गये, तब भूमंड भक्तने संकल्प किया कि अब बाटिकाको मैं बेच डालूंगा । जब भूमंड भक्तने ऐसी इच्छा की तब उसी रात गोसाईं गरीबदासजी स्वप्नमें मिले । भूमंड भक्तसे कहा कि तुम बाटिका न बेचो । तुमको आजसे आठवें दिवस अमुक सरायमें एक जोड़े बेल मिलेंगे । तुमको दोनों बेल मिल जावें तो तुम दोनों बेलोंको आरती करके लेआना ।
ऐसा हुआ कि नियत दिवस पर भूमंड भक्त उस सरायमें गये । अपने स्वप्नका वृत्तान्त अपने साथियोंसे पहलेही कह रक्खा था, इस कारण तीस चालीस मनुष्य यह कौतुक देखने उनके साथ सराय गये । जब सब आदमी सरायमें पहुँचे तब देखा तो लुझी पहने हुए एक मुसलमान एक जोड़ी नागौरी बेल लिये हुए खड़ा है । भूमंड भक्तने उसके समीप जाकर कहा कि, यह जोड़ी बेल मुझे दो, वह मुसलमान बोला कि यह जोड़ी तुम कैसे लोगे ? कोई चिन्ह बताओ, तब उक्त भक्तने उत्तर दिया कि, मैं आरती करके लूंगा । वह मुसलमान बेलोंकी जोड़ी सौंपकर चला गया । लोगोंके मनमें यह ध्यान नहीं हुआ कि, पूछें कि, वह मुसलमान कौन था कहाँसे आया, कहाँ चला गया, किसने यह बेल भेजा, कहाँसे ले आया, वह कौन है ? पीछे लोगों को यह बात स्मरण हुई कि, हम लोग बहुत भूले, यह न पूछा कि वह मुसलमान कौन था ! अस्तु भूमंड भक्त तो बेल लेकर चले आये, उनकी बगीची को सींचने लगे ।
सहारनपूरका रहनेवाला शेख बली नामक कलाल, हज्ज करने मक्का गया था जब वह पीछे आकर बम्बईमें उतरा तो वहाँ उसने गरीबदासजीको फिरते देख सलाम करके पूछा कि, महाराज ! आप सहारनपूर से चले आये ? गरीबदासजीने कहा कि, हाँ । उस शेख बलीको यह मालूम नहीं था कि, गोसाईंजी मर चुके हैं । जब शेख सहारनपूरमें आया तब लोगोंसे पूछा कि, गोसाईं गरीबदासजीका क्या हाल है ? तब लोगोंने उत्तर दिया कि, उनको स्वर्गवास हुये तीन बरस बीत गये । उनकी समाधि तथा छतरी बाटिकामें बनी हुई है । यह सुन शेख बली कलालने कहा कि, मैंने तो अभी उनको बम्बईमें फिरते देखा है मुझसे साक्षात् हुआ था । गोसाईंजी उसी स्वरूप, उसी अवस्था और उसी नामसे मुझको मिले, मुझसे भली प्रकार वार्तालाप हुआ । तीन वर्ष हो
चुके थे कि, सहारनपूरमें तो मर गये और बम्बईसे उसी समयमें जीवित होकर फिरने लगे। न जाने और कहाँ कहाँ सैर किया हो बेही जानते होंगे या उनके भक्त जानें दूसरेको क्या पता हो सकता है ?
हंस कबीर जैसे आदिमें थे वैसेही (अजर और अमर) लोकमें अब भी हैं कुछ भी विभिन्नता नहीं है। न उन्हें मृत्यु है, एवं न कभी आवागमन ही होता है न कभी विषय वासनाकी मृगतृष्णाही उनको फँसा सकती है।
गरीब दासजीके * ग्रन्थमें कबीर साहबके चेलोंका अंग।
साखी - गरीब-नानक तो निर्भय किया, वाह गुरु सतजान ।
अदली पुरुष पहचानिये, निर्गुण पद निर्वािन ॥
गरीब-दादूके सिरपर, सदा, अदली अदल कबीर ।
टक मारेमें जदि मिले, फिर सामरके तीर ॥
गरीब-नौलख नानकनावमें, दस लख गोरख तीर ॥
लाख दत्त सङ्गत सदा, पड़े चरण कबीर ॥ ३६ ॥
पारख अङ्गकी साखी।
गरीब-नौलख नानक नावमें, दसलख गोरख पास ।
अनन्त सन्त पदमें मिले, कोटि तरे रबिदास ॥ ३७ ॥
गरीब-रामानन्दसे लख गुरु, तारे चेले भाई ॥
चेलोंकी गिनती नहीं, पदमें रहे समाई ॥ ३२ ॥
गरीब-मीराबाई पद मिली, सद्गुरु पीर कबीर ।
सहित देह लौलीन हो, पाया नहीं शरीर ॥
गरीब-उत्पत्ति परलय जात है, अनन्त कोटि ब्रह्मण्ड ।
जोग जीत समझाय जब, उधरै काग भुसुण्ड ॥ ४८ ॥
गरीब-वसिष्ठ विश्वामित्रसे, आवैं जाँय अनेक ।
काग भुसुण्डके पलकमें, जो चाहे सो देख ॥ ४९ ॥
गरीब-ऐसे काग भुसुण्ड से, योगजीतके दास ।
चकवैं ज्ञान सुनायसे, दीन्हा पदमें वास ॥
गरीब शिवलीको सद्गुरु मिले, सँग भाई मन्शूर ॥
प्याला उतरा अर्श से, काढ़े कौन कुसूर ॥
अचल अङ्गकी साखी ३६२॥
गरीब-मुहम्मदके मुरशिद सही, कलमः रोजा दीन ॥
मुसलमान मानै नहीं, मुहम्मद केर यकीन ॥
गरीबदासजी कृत हिरम्बर बाघ देखो।
सर्वाङ्ग अङ्गकी साखी ॥ १० ॥
सा० — गरीब-सुलतानाके तीर लगा, बलख बुखारा त्याग ।
जिन्दाका चोला दिया, सद्गुरु सत्य बैराग ॥ ११ ॥
गरीब-बहुरङ्गी बिरियामहै, मिला नीरमें नीर ॥
गोरखके मस्तक गहे, अदली अदल कबीर ॥
गरीब-ऋषभ देवके आये, करुणामय करतार ।
नौ योगेश्वर पद रमें, जनक विदेह उरधार ॥
भागवतके ग्यारहवें स्कन्धके दूसरे अध्यायमें लिखा है कि, मनुकी संतानमें ऋषभदेव नामक एक राजा हुआ । उसके एकसौ पुत्र थे । उनमेंसे एकका नाम भरत था, जिसके भी नामसे यह भरतखण्ड प्रसिद्ध हुआ है । उन्हीं-मेंसे नौ परम योगीश्वर तथा ज्ञानी हो गये हैं । उन्हींने राजा जनकको ज्ञानोपदेश किया था । उन्हीं नौ योगेश्वरोंका वृत्तान्त गरीबदासजी लिखते हैं कि, ये नौ योगीश्वर राजा जनक सहित करुणामय कबीर साहबके कृपापात्र शिष्य होकर परमधामको सिधार गये । जिनकी कि, लोग आज कथाएँ गाते हैं ।
अचल अङ्गकी साखी २७॥
सा० — गरीब-नारद सनकादिक सही, बज्र दण्ड वैराग ॥
जोगजीत सद्गुरु मिले, उपजा अति अनुराग ॥ ५१ ॥
गरीब-दुर्वासा और गरुड़को, दीन्हा ज्ञान अपार ।
दृष्टि खुली निज ध्यानसे, फिर नहिं लगे लगाए ॥ १० ॥
मुहम्मदकी जो चली है, रूह, दरगह देखे दूबर दूह ।
पीर कबीरा जिन्दा ख्याल, मारग मंतर तारंग बाल ॥
ये कबीर साहिबके बारह पन्थोंमेंसे अन्तिम पन्थके आचार्य थे, ये सत्य-गुरुके हुक्मके मुताबिक जगह जगह उपदेश देते हुए वृन्दावन पहुंचकर लोगोंको सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश सुनाने लगे । वहाँके लोगोंने आपसे कहाकि, वैष्णवोंकी तरह भगवान्की पूजा करके फिर हमें उपदेश दोगे तो मानेंगे नहीं तो हमारे दिलोंमें आपके उपदेशके लिये स्थान नहीं है । गरीबदासजीने कहा कि, अब मैं हृदयमें ही ध्यान किया करता हूँ वही मेरी मूर्तिपूजा है । मैं, मूर्तिपूजाको बुरा नहीं । कह रहा हूँ मेरी श्रद्धा पूजामें है पर मैं इसे ज्ञानपूर्वक चाहता हूँ, पर भक्तिके दीवाने व्रजवासियोंने उनकी बातको स्वीकार नहीं किया आप भी व्रजवासियोंकी अचल भक्ति देखकर प्रसन्न हो स्थानान्तरित होगये । उनकी पारस अंगकी कुछ साखियोंको यहाँ उद्धृत करते हैं ।