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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

निरंजन गोष्ठी अनुरागसागरका प्रमाण

उमैंगि लहर अकासे जायी । उदधि आय चौरा नियरायी ॥
दरश हमार उदधि जब पाया । अति भय मान ठठक ठहराया ॥
छंद-रूप धारचो विप्रको तब, उदधि हम पहुँ आइया ।
चरन गहिके माथ नायो, मरम हम नहि पाइया ॥
जगन्नाथ हम मोर स्वामी, ताहिंते हम आइया ।
अपराध मेरो छमा कीजे, भेद अब हम पाइया ॥
सोरठा-तुम प्रभु दीनदयाल, रघुपति बोइल दिवाइये ।
वचन करो प्रतिपाल, कर जोरे विनती करें ॥

पाँचवाँ प्रकरण ।

समुद्रके कोपका कारण ।

समुद्रके हरिमन्दिर तोड़नेका यह कारण था कि, जब कि, रामचन्द्रका अवतार हुआ था उस समय श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रपर जबरदस्ती किया था और सेतुबंध पुल बाँधकर पार उतरे थे । इसी कारण समुद्र आप पर रुष्ट था और आपसे बदला लेनेके निमित्त उद्यत हुआ था । रामावतार और कृष्णावतारमें तो बदला ले नहीं सका, पर जगन्नाथके अवतारमें अपना बदला लेनेके निमित्त तत्पर हुआ और उसके बदले द्वारका पुरीको डुबा दिया । इस प्रकार किसीका बदला नहीं छूटता, चाहे किसी जन्ममें बदला अवश्यही देना पड़ता है ।

कीन्हेउ गमन लंक रघुवीरा । उदधि बांध उतरे रनधीरा ॥
जो कोई करे जोरावरि आई । अलख निरंजन बोइल दिवाई ॥
मोपर दया करहु तुम स्वामी । लेऊँ ओइल सुन अंतर्यामी ॥
कबीर वचन ।

बोइल तुम्हार उदधि हम चीन्हा । बोरहु नगर द्वारका दीन्हा ॥
यह सुनि उदधि धरे तब पाई । चरन टेकके चले हरषाई ॥
उदधि उमंग लहर तब धायी । बोरचो नगर द्वारका जायी ॥

छठवाँ प्रकरण ।

भ्रम विमोचन ।

कबीर साहबके जगन्नाथमें छुआछूत मिटाने का कौतुक करना ।
जब ठाकुरजीका मन्दिर बनकर पूरा होगया, तब कृष्णजीने अपने पंडेको स्वप्नमें कहा कि, ऐ पंडो ! कबीर साहबने मेरा मंदिर स्थापित करा दिया ।

महापाप, कुत्तेके वचानेका महापुण्य

अब तुमलोग आकर मेरी पूजा करो । स्वप्न देखने पर पंडा घरसे चलकर पहले समुद्रतट पर कबीर चौतरेपर गया । वहाँ उसने कबीर साहबको बैठा देखा उस समय सत्यगुरुका वेष जिन्दाका था वैष्णव वेष नहीं था । जिन्दा वेषके साधु प्रायः मुसलमानोंमें होते हैं, इस कारण वह वेष देखकर उस ब्राह्मणने अपने मनमें भ्रम किया कि, प्रथम मैंने म्लेच्छका ही दर्शन किया, ठाकुरका दर्शन नहीं मिला । ऐसा संशय करके वह पण्डा तो ठाकुरके मन्दिरको चला गया । इधर कबीर साहबने उसके मनकी समस्त बातें जान लीं । जब वह पण्डा ठाकुरके मण्डपमें आया, तब उसका वहाँ विचित्र कौतुक दिखलायी दिया । ठाकुरका समस्त मंदिर कबीर साहबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । जिस ओर वह ब्राह्मण देखता उधर वहीं कबीर साहबकी मूर्तिको उपस्थित पाता है ठाकुरकी मूर्ति कहीं दिखलाईही नहीं देती । वह ब्राह्मण अक्षत और पूष्प लिये चकित होकर खड़ा रह गया कि, मैं किसकी पूजा करूँ, ठाकुर तो कहीं दिखलाई नहीं देते, समस्त मंदिर कबीर साहबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । वह अपने मनमें सोचने लगा कि, इसका क्या कारण है ? अन्तमें उसने अपने दोषको जान लिया कि, मैंने जो कबीर साहब को म्लेच्छ समझा था । इस कारणही मुझको यह दंड मिला है । यह सोच समझकर वह ब्राह्मण कबीर साहबकी स्तुति करने और अपने अपराधके लिये क्षमा प्रार्थना करने लगा । जब पण्डाने सत्यगुरुकी अत्यंत स्तुति की और अत्यंत नम्रता-पूर्वक अपने दोषोंके निमित्त क्षमा प्रार्थना किया, तब आप दयालु हुए और अपनी सब मूर्तियोंको समेट लिया, केवल एक मूर्ति रह गयी और ठाकुरकी मूर्ति दिखाई देने लगी । तब कबीर साहबने उस ब्राह्मणसे कहा कि, ऐ पंडा ! अब मेरी आज्ञा है कि, तुम ठाकुरको पूजो, पर इस बातका ध्यान रखना कि, आजके दिनसे इस जगन्नाथपुरी में छूत न रहेगी और जाति-पातिका भेद तनिक भी नहीं रहेगा । प्रत्येक जाति एक दूसरे जातिके साथ निधड़क भोजन करेगी । सो अब तक पुरुषोत्तम पुरीमें वही नियम प्रचलित है । सब जातिके लोग एक स्थानपर भोजन करते हैं, कोई किसीके जूठेका कुछभी ध्यान नहीं करता । इतनी बात कहकर कबीर साहब तो वहाँसे अन्तर्धान हो गये, और जगन्नाथकी पूजा संसारमें प्रचलित हुई ।

मंडप काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहँवा कियऊ ॥
तब हरि पंडन स्वपन जनावा । दास कबीर मोहि पहुँ आवा ॥
आसन सागर तीर बनायी । उदधि उमंग नीर तहँ आयी ॥
दरस कबीर उदधि हटि गयऊ । यहि विधि मंडप मोर बचयऊ ॥

पंडा उदधि तीर चलि आये । करि अस्नान मंडप चल जाये ॥
चौरातीर पहुँचे जब पण्डा । मोहि देखि मन धरे पखंडा ॥
पंडन अस पाखंड लगायी । प्रथम दरस मलेच्छ दिखायी ॥
हरिके दर्शन मैं नहि पावा । प्रथमहि हम चौरा लग आवा ॥
तब हम कौतुक एक बनाये । कहों वचन नहि राखु छिपाये ॥
मंडप पूजन पंडा गयऊ । तहवों एक चरित अस भयऊ ॥
जहँ लग मूरति मंडप माहीं । भये कबीर रूप धर ताहीं ॥
हरि मूरति कहँ पंडा देखा । भये कबीर रूप धर भेखा ॥
अच्छत पुहुप ले विप्र भुलाई । नहि ठाकुर कहँ पूजहुँ भाई ॥
देखि चरित्र विप्र सिर नाया । हे स्वामी तुम मरम न पाया ॥
पंडा वचन ।

हम तुम काहि नहीं मन लाया । ताते मोहि चरित्र दिखाया ॥
छमा अपराध करो प्रभु मोरा । विनती करें दौड़ कर जोरा ॥

कबीर वचन ।

छन्द— वचन एक मैं कहों तोसो, विप्र सुन तैं कान दे ।
पूज ठाकुर दीन्ह आयसु, भाव दुविधा छाड़ दे ॥
भ्रम भोजन करे जो जिव, अंग हीन हो साहिको ।
करे भोजन छूत राखे, सीस उलटे वाहिको ॥

सोरठा—चौरां करि व्यवहार, भ्रम विमोचन ज्ञान दूढे ।
तहँते कियो पसार, धर्मदास सुनु कानदे ॥

सातवाँ प्रकरण ।

स्वामी रामानुजाचार्य और जगन्नाथपुरी ।

वैष्णवाचार्य रामानुज स्वामी जब उत्पन्न हुए और अपना धर्म पृथ्वीपर प्रचलित किया, तब दक्षिण देशमें उनके धर्मका अच्छा प्रचार हुआ । जब आप पुरुषोत्तमपुरमें गये और यह इच्छा की कि, इस जगन्नाथपुरीमें आचार चलाऊँ । तब रामानुज स्वामीसे जगन्नाथजीने स्वप्नमें कहा कि, मेरी पुरीमें तुम्हारा आचार नहीं चलेगा, तुम इस ध्यानको अपने मनसे निकाल दो, परन्तु रामानुज-स्वामीने इस विचारको नहीं त्यागा । जब एक रातके समय रामानुज-स्वामी सोगये तब जगन्नाथजीने उनको जगन्नाथपुरीसे उठाकर श्रीरंगपुरीमें धर दिया । जब प्रातःकाल स्वामीजी उठे तब देखा कि, मैं श्रीरंगपुरीमें आन