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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

दूसरा दुष्टांत

कथितो ज्ञानध्यानेषु बीजमंत्रसुसंग्रहः ।

राजीवलोचनश्चेह यत्कबीरः स चोच्यते ॥

जो (क) ज्ञान और ध्यानका देनेवाला है । (ब) बीज मंत्रोंका मुख्य-स्वरूप है । (र) कमलरूप है उनको शब्द कहते हैं उसीको कबीर कहते हैं ।

कुरुते नित्य ज्ञानं च विमला निर्मला मतिः ।

रमणीयः सदाचारो यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) उसका ज्ञान सदैव स्थिर और नित्य है । (ब) वैराग्य होता है । (र) ऋद्धि और सिद्धि पवित्रता देनेवाला है । एक स्वरूपसे बहता है, उसको कबीर कहते हैं ।

कः कलौ केवलः सार्थो विद्वेषपरिकीर्तितः ।

ऋद्धि शुभसमासेन यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) कलियुगमें जीवोंके साथ है । (ब) बोधरूप होकर पापोंका नाश करता है । (र) सबके हृदयोंमें मिल रहा है । उसको कबीर कहते हैं ।

कः कलौ सर्वकल्याणं विवेकज्ञानसंहितम् ।

रागयुताहृता वार्ता यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) कलियुगमें जीवोंको कल्याण देता है । (ब) विवेक तथा ज्ञानके साथ संयुक्त हो रहा है । (र) प्रेमके साथ सबमें रम रहा है । उसको कबीर कहते हैं ।

कविः पुराणः वपुषो विदेहो देहवान्सुधीः ।

गुरुयोगी सुराणां च यः कबीरः स चोच्यते ॥

(क) जो है सो स्वयम् चैतन्यस्वरूप है उसका आरम्भ तथा अन्त कुछ नहीं । विदेहसे भी दूर है और उसके साथ भी है । (र) ज्ञान स्वरूप है समस्त देवताओंको गुरु है उसको कबीर कहते हैं ।

कबीनां प्रवरौ ज्ञाता धाता माता पितामहः ।

जनकः सर्वलोकानां यः कबीरः स चोच्यते ॥

कबीर नाम है अत्यन्त उत्तम श्रेष्ठ तथा सबका जाननेवाला है । सबका पिता है, पितोंका पिता है । समस्त संसारका रचयिता है । (र) सबका जाननेवाला है उसको कबीर कहते हैं ।

असद्भा इदमग्र आसीत् ततो वै सदजायत ।

तदात्मानं स्वयमकुरुत तस्मात्तत्सुकृतमुच्यते ॥

यह जगत् अपनी उत्पत्तिसे पूर्व अव्याकृत नामरूपवाला था, इसीसे यह

पैदा हुआ, उसने स्वयं अपनेको किया इस कारण उसे सुकृत कहते हैं। जब आत्माने अपना रूप पाया और निर्गुणसे सगुण हुवा, आपसे अपनेको प्रगट किया। इस कारण उसका नाम सुकृत है।

यहाँलो तो मैंने परसंवेद अथवा प्रकृत वेदका प्रमाण लिखा। अब जानना चाहिये कि, कुल प्रकृत वेद बराबर इस बातकी साक्षी देते हैं कि, ये कबीर ! तू ही समस्त संसारका सर्जनकर्ता तथा प्रबंध कर्ता है। अनन्त करोड़ ब्रह्माण्ड सब तेरी रचना है। एकोत्रके कुछ श्लोक जो मैंने लिखे हैं, वे एक सौ श्लोक पर्यन्त बराबर शिवजी कबीरके नामकी प्रशंसा करते गए हैं। पार्वतीजीका मन रख गए हैं। इसी प्रकार याज्ञवल्क्य और समस्त ऋषि मुनि आरम्भसे आजलों बराबर करते आए हैं। जबभी करते रहे तथा करेंगे।

ऋषीश्वरोंका वचन।

रामानन्द—कर्ता तुमही साधू हो, सत कबीर है देव।

तनमन हों तुमें अपि हौं, कुलदिक्षा तोहि देव ॥ [क. १० आ. ४३]

धर्मदास—बाजा बाजे रहितका, परा नगरमें शोर।

सद्गुरु खसम कबीर हैं, नजर न आवे और ॥ [क. १० आ. ४०]

गोरखनाथ—नौनाथ चौरासी सिद्ध, इनका अनहद ज्ञान।

अविचल घर कबीरका, यह गति विरला जान ॥

झोरी झण्डा कूबरी, शैली टोपी साथ।

दया भई जब कबीरकी, चढ़ाई गोरखनाथ [क. १० आ. ४]

नाभाजी—बानी अरब व खरबलौं, ग्रंथों को हज़ार।

कर्ता पुरुष कबीर है नाभे किया विचार ॥ [क. १० आ. ४९]

राग महला पहला।

नानकशाह—यक अर्ज गुफ्तम पेश तू दर गोश कुन करतार।

हक्का कबीर करीम तू वे ऐब परवरदिगार ॥

दुनियाँ मुकाम फानी तहकीक दिलदानी।

मन सर मूह इजराईल गिरफ्त दिलबीच नदानी ॥

जन पिसर बेरादर कसनेस्त दस्तमगीर।

आखिर बेयफ्तम कस नदारम चूंशब्द तकबीर ॥

शप्रोरोज गशतम दरहवा करदेमबदीख्याल।

गाहेन नेकी कारकरदम मन ईंचुनी अहवाल ॥

बदबस्तहमचू दखील शाफिल बेनजर बेबाक।

नानक बगोयदजीं तोरों पातरा चाकरा पाखाक ॥