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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

हस्तावलंबिनी कंजरी

जिन्हें साक्षात् बुद्धि स्वरूप कहते हैं जिनकी कि, सन्तान सब मनुष्य हैं। सब ज्ञान उन्हींसे प्रगट हुआ है जब उन्हींको काल पुरुषने बहकादिया कि, सत्यपुरुष का दर्शन न पावें, तो क्या कालको यह सामर्थ्य न थी कि, राधास्वामीको बहका दे कि, तू अपने गुरुसे विमुख हो जा, जिससे तेरे साथ तेरे शिष्यगण भी मेरे जाल में फँस फँसकर जन्म मरण पावें।

यह राधास्वामी अपने ग्रंथमें अपनेको ही सत्यपुरुष मानते हैं। भलाजी ! यदि वे स्वयम् सत्यपुरुष थे तो पन्द्रह वर्षतक किसका भजन करते रहे, बिना गुरु के नाम किसने बतलाया ? किसने अभ्यास करना सिखाया ? उनके जितने लेख हैं, वे सब कबीर साहबके ग्रंथोंकी नकलें हैं, सिवाय इसको और कुछ नहीं; हां ! कहीं उनकी बनावट भी मिली हुई हैं। सत्यनाम तथा सार शब्दका उपदेश कबीर साहबके बिना और किसने दिया, अन्य कौन है कि, जो सत्यपुरुषकी भक्तिका समाचार देसके ? क्योंकि कबीर साहबको छोड़कर बाकी सब अनभिज्ञ हैं।

सत्यपुरुषके पुत्रोंमें सबसे पहला पुत्र निरञ्जन है। जिसने अपने आपको सत्यपुरुष बना, सत्यपुरुषका नाम छिपाया। इसके पीछे और भी बहुत हो गये हैं। वर्तमान कालमें विमुखोंमें प्रसिद्ध गुरुविमुख राधास्वामी जी महाराज हैं।

राय शालिग्राम' साहब राधास्वामीके शिष्य थे जो इस समय अपने स्वर्गवासी गुरुके स्थानापत्र हैं उन्होंने "सैर आलम् फिजा" नामक पुस्तकमें इस प्रकार लिखा है कि, मैं लाहृत स्थानपर पहुँचा, वहाँकी सब शोभा देखी, अदली कबीर मेरी आत्माको उस स्थानपर लेगये फिर गुरुकी आज्ञासे आगे चलते चलते सत्य लोकका नाका मिला। यह "सैर आलम् फिजा" राय शालिग्राम कृत संसारकी सैरका वृत्तान्त मैंने हस्तलिखितपुस्तकके रूपमें देखा था। उसमें तो इतनाही पता मिला। अस्तु, इतना भी धन्य है कि गुरुसे सर्वथा विमुख होनेपर भी चेला कृतज्ञ होकर इतना तो स्वीकार करता है। इस प्रकार कालपुरुषने सबकी बुद्धिपर आवरण डाल दिया है जिससे सब मनुष्य सत्यगुरुसे विमुख होकर कालके जालमें फँस गये हैं।

ये राधास्वामीजी सब गुरुविमुखोंसे बहुत बड़े हैं कारण कि, इन्होंने स्वयम् ही गुरुसे विमुखता की है। सबमें प्रथम श्रेणी निरञ्जनकी है कि, उसने सत्य पुरुषका नाम छिपाकर अपनेको स्वयम् ही सत्यपुरुष करके प्रगट किया, इसके अतिरिक्त जितने विमुख मनुष्य हैं। सभी निरञ्जनकी चालके और उसीके रूप

के हैं। सब विमुखों तथा अकृतज्ञोंका एक ही ढङ्ग है। सब अपने नाम तथा प्रभुता के इच्छुक हैं। कबीर साहबने धर्मदाससे कहा है कि, हे धर्मदास ! यदि तू मुझ को चाहता है तो तू अपनी मान बड़ाईको त्याग दे, इस संसारसे कोई सम्बन्ध मत रख। धर्मदासने वैसाही किया, जिससे वो सत्यगुरुका स्थानापन्न हो गया। उनके वंशको सत्यगुरुने गुरुवाई प्रदान की।

जितने गुरुविमुख तथा अकृतज्ञ हैं उनका छुटकारा होना जरा असम्भव है। आदिसे अन्ततक कभी भी गुरुकी अकृतज्ञता करेगा तो फिर कालके बंधनमें निश्चय ही पड़ेगा। उसकी कदापि मुक्ति न होगी, न कोई उसकी सहायता ही करेगा। यही बात इस साखीमें लिखी हुई है कि—

साखी—गुरु सीढीते ऊतरे, शब्द विहूना होय।

ताको काल घसीटि है, राखि सकै नहिं कोय ॥

इस कारण गुरुका धन्यवाद और स्तुति सदैव करना चाहिये। क्योंकि, गुरुको छोडते ही सार रहित होजाता है, इसी बातकी विस्तारके साथ इस नमन में कहते हैं—

हम'लके बीचमें झूला^१^। हुआ जब ताप'का शूल^२^ ॥
जले ज्यों^३^ घासका पूला^४^। गुरुका शुक्र^५^ क्यों भूला ॥
हमल मादर^६^में जब सोया। पडा दुःख दर्दसे रोया ॥
वहाँकी अव'ल क्यों खोया। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
वहाँ गुरुसे किया वादा^७^। सो भूला पापसे लादा ॥
यहाँ माँ वाप और दादा। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
य'हाँ दर हाथियाँ डोलें। जवा^८^नौ पर्वतां तौलें ॥
न उन^९^के नामको बोलें। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
किया दावा खुदा^१०^ई का। अमल हल्मो जुदाईका ॥
खबर बिन बे अदाईका। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
रहे महरूम^११^ सो सबसे। भुला एहसान गुरु जबसे ॥
त'नासुखमें पडा तबसे। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥
गुरुका आसरा करके। सरेआजिज गुरु चरणधरके ॥
गुन^१२^ह बख'शो मेहर^१३^करके। गुरुका शुक्र क्यों भूला ॥

१ पेट, २ घबडाकर हला, ३ जठराकी तापिस, ४ दर्द, ५ जैसे, ६ पूली, ७ मिहरबानी, ८ माता, ९ जान, १० इकरार, ११ इस लोकमें, १२ जीभसे, १३ भगवान्के, १४ ईश्वर होनेका, १५ जुदा, १६ आवागमन, १७ अपराध, १८ मुआफ करो, १९ दया।