कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पुनर्जन्म पर भारतीय दर्शन
ब्रह्मद्वेषी निःसन्तान हो । जो देवताओंकी निंदा करे वो रोगी हो । जो काशीमें मरे वो राजा हो । जो दूसरोंको विद्या पढ़ावे वो विद्वान हो । व्यभिचारिणी स्त्री निपूती हो । जो गर्भिणीके साथ सम्भोग करे वो नरकमें जावे । जो मदिरा पीवे सो मँदक हो । जो तीर्थकी निंदा करे सो पिड़िला हो । जो मास खावे वो राक्षस हो ।
इसी प्रकार सब जीव अपने पूर्वकर्मोंके अनुसार इस संसारमें वारंवार देह धर करके प्रगट होते हैं, उनका वैसाही आकार हो रहा है । इनके कर्म ही ने इनका स्वरूप बनाया है । अनगिनती जन्मोंके कर्म उनको साथ लगे हुए हैं वे ही उनका आकार बनाते हैं और वे ही उनको ईश्वर हैं ।
विचित्र आकार ।
७६—अब यहाँ मैं चौरासी लाख योनिके विचित्र विचित्र आकारोंको दिखाता हूँ । उनको देखकर जाना जायगा कि, मनुष्य क्या है ? पशु किसको कहते हैं ? यह सब मृतियाँ मनुष्य और पशु दोनोंही नहीं कही जा सकती । इनमें दोनों रङ्ग ढङ्ग पाये जाते हैं । अतः मानुषिक तथा पाशविक आत्मा कोई नहीं है, आत्मा तो एकही है पर कर्म चित्रकारने भाँति भाँतिके स्वरूप खींचे हैं । उनमेंसे कुछ जीवधारियोंका हाल यहाँ लिखा जाता है—
गजूवा—एक पक्षी है, उसका शरीर तो पक्षीकासा है और मुखड़ा मनुष्यका जैसा है । उसमें नर मादाकी पहचान नहीं होती । यह जानवर पवित्र समझा जाता है ॥ १ ॥
मनुष्यके शिरका सर्प—पर्वत अलियामें एक प्रकारका सर्प उत्पन्न होता है, उसका शिर मनुष्यका, सब शरीर सर्पकासा होता है ॥ २ ॥
संगपुस्त—सीतान् देशमें एक पक्षी उत्पन्न होता है उसको सङ्गपुस्त कहते हैं—उसका चेहरा आँख, नाक, मुँह, दाडी, मूँछ सब मनुष्यकासा होता है तथा बाकी सारा शरीर पक्षीकासा एवं पीठ पत्थरके समान कड़ी होती है ॥ ३ ॥
जल मनुष्य—एक टापूमें पानीके मनुष्य देखे गये । वे मँदकके समान तैरते फिरते थे, उनकी पूँछ गजभर लम्बी थी, उनकी दुमकी नोक, गुच्छेदार थी । इस प्रकार कहा जाता है कि, सौदागरोंका जहाज तूफानी चपेटमें कहींका कहीं चला गया, एक ऐसे टापूमें जा पहुँचा जहाँ उसे ऐसे मनुष्य मिले थे ॥ ४ ॥
मनकता—एक प्रकारकी मछली होती है, उसके देहके ऊपरका भाग अर्थात् कटिके ऊपर तो सुन्दरी स्त्रीकासा होता है, कटिके नीचे मछली कीसी होती है इसके सब शरीर पर बूंद होती हैं, उसके दो पर भी होते हैं ॥ ५ ॥
शेष यहूदी—एक पशुका नाम है, उसका चेहरा मनुष्योंकासा है, दाढी मूँछ आदि सब कुछ है, दो पर भी हैं उसके आकारसे ऐसा प्रतीत होता है कि, यह कोई श्रेष्ठ है ॥ ६ ॥
अजीबुलखिलकत्—पर्वत बुकीस पर एक पशु उत्पन्न होता है, यह बड़ा बलिष्ठ होता है। इसका चेहरा सुन्दर युवककासा होता है। इसके मूँछ दाढी कुछ नहीं है, इसके शिरपर गायकेसे दो सींगें हैं, बाकी शरीर शेरकासा है, कम्बर मोटी है, बाघकीसी पूँछ और डुमका सिरा गुच्छेदार है। उसकी पूँछमें तीन या चार जगहोंमें गिरह हैं वे काले हैं। उसके पिछले दोनों पाँव आदमीके, अगले दोनों पाँव बैलकेसे हैं, नीचेकी टांगें ऊँटकीसी हैं, दो पर पक्षियोंके समान हैं ॥ ७ ॥
जिस समय नौशेरओं बादशाहके राज्यका समय आया तब उसने ईरानी टापुओं तथा भूमिकी सनद बनाई। जब वह बना चुका तब उस नदीमेंसे एक विचित्र पशु उत्पन्न हुआ। उसने आवाज दी कहा कि, ऐ बादशाह! तू मेरे रूपका है इस कारण तेरी यह सनद बन गई। उस पशुकी गरदन चेहरा और सिर, सुन्दर नौयुवककासा था। दाढी मूँछ कुछ नहीं थीं। उसकी लटोंके घूँघर-वाले सुन्दर बाल कंधेतक लटक रहे थे। उसकी पीठपर पक्षीके समान दो पर थे। उसका सारा शरीर शेर बबरके समान था, उसके चमड़े पर शेरकी तरह दाग थे, शेरकीसी उसकी पूँछपर पूँछका सिरा गुच्छेदार केवड़ेके फूलके समान था ॥ ८ ॥
उनका—कोहकाफमें जो जर्मरदके रङ्गका पहाड़ है। वह समस्त संसारको घेरे है। उसपर एक पक्षी रहता है उसको उनका कहते हैं। यह पक्षी बड़ा बलिष्ठ है। इसकी ग्रीवा शिर और मुँह एक सुन्दरी स्त्रीकासा है। उसके शिरपर ऐसे पर रहते हैं मानों बादशाही मुकुट धरा है। शेष शरीरका भाग समस्त पक्षीके समान है। यह बृहत् पक्षी है। इसके शरीरमें अन्यान्य पक्षी अपना घोंसला बनाया करते हैं ॥ ९ ॥
दो शिरके मनुष्य—एक पर्वतमें दो शिरके मनुष्य होते हैं ॥ १० ॥
छातीमें शिर—एक स्थानमें ऐसे मनुष्य हैं, जिनका शिर छातीमें होता है उस जगह नारियलके वृक्ष बहुत होते हैं ॥ ११ ॥
घुटनेके नीचे कान—एक स्थानमें ऐसे मनुष्य होते हैं, जिनका कान घुटनोंके नीचेतक पहुँचता है ॥ १२ ॥
श्वान मुख मनुष्य—सिकन्दर बादशाहने एक टापूमें इस प्रकारक मनुष्य
देखे थे, जिनका मुँह ताजी कुत्तेकासा था बाकी शरीर मनुष्योंकासा है ॥१३॥
अश्वमुख—एक प्रकारके मनुष्य हैं जिनका मुँह घोड़ेकासा और देह आदमीकी होती है ॥ १४ ॥
पचास गजका मनुष्य—सिकन्दर बादशाहने एक मनुष्य देखा जो पचास गज ऊँचा था । उसके शिरमें गायके समान दो सींगें थीं, वह मनुष्योंको पकड़ पकड़ कर खाता था । सिकन्दरशाहने उसको तीरोंसे मार डाला ॥ १५ ॥
एक टांगके मनुष्य—एक प्रकारके मनुष्य हैं कि, उनके एकही पाँव एकही हाथ एकही कान और एकही आँख है । मानों वे एक मनुष्यके आधे हैं । अनगिनती प्रकारके बिचित्र आकारवाले जीवधारी हैं । जिनके देखने सुनने से मानुषिक बुद्धि चकराती है । चौरासी योनिके जीवोंमें अनगिनती रङ्ग ढङ्ग हैं । सबका स्वरूप तथा स्वभाव न्यारा न्यारा है । इस सृष्टिकी सीमा नहीं । इसका वर्णन असम्भव है । परमेश्वरकी सृष्टि और उसके कौतुकका भेद कौन पा सकता है ? सारे जीव अपने पूर्व कर्मोंके अनुसार यहाँ वहाँ आवागमन कर रहे हैं । नाचते फिरते हैं बड़ा बाजीगर सबको नचाता फिरता है ।
तात्पर्य—इन बातोंके लिखनेसे मेरा यह है कि बुद्धिमान लोग समझे बूझेंगे कि, मनुष्य किसको कहते हैं पशु कौन है । मनुष्यका केवल वही स्वरूप तथा स्वभाव है । जिसके द्वारा अपने यथार्थको जान ले, शेषके सारे पशु हैं । एकही आत्मा सबमें आवागमन करती है । केवल अपने कर्मों ने स्वरूप तथा स्वभाव बदल डाला है । मन वचन और कर्म करके जैसे कर्म जिस जीवसे होते हैं वैसेही स्वरूप और अवस्थामें पुनः देह धरकर प्रगट होते हैं । सहस्रों प्रकारके बन्दर मनुष्योंके रूपके हैं । जिनमें विवेक नहीं हो सकता कि, यह सब मनुष्य हैं अथवा बन्दर हैं । कितने मनुष्य जो जङ्गलोंमें रहते हैं वे बन्दर समझे जाते हैं परन्तु वास्तवमें वे मनुष्य हैं पर वे मनुष्यतासे पृथक् हैं । सहस्रों प्रकारकी मूर्तियाँ आधे मनुष्य तथा आधे पशु रूपमें हैं पृथिवी तथा आकाशोंमें भरी हुई हैं इस सृष्टिका अन्त नहीं है । देहोंका निर्माण भी कर्मोंनेही किया है इन सबके चित्र प्रथममें दिये हैं । पूर्वके उपदेशको निम्न लिखित नजममें कहते हैं—
जो देखे स्वसम्बेद सद्गुरु की साख । कहे आदमी योनि हैं चार लाख ॥
यह पहचान इनसानकी सारी जात । वही आदमी है जो हो वासिफात ॥
दरोग और बातिलका जिसमें तमीज । वही आदमी हैं सो हरदिल अजीज ॥
वह सरताज हरजुमरेः सिलकत तमाम । इसीके लिये सारे दारुसलाम ॥
जो झूठ और सच जाने इनसों वही । हैं बाकी सो हैवान या अबलही ॥