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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

भगवान् विष्णुके विषयमें कबीरसाहिबके शब्द

योहन बपत्तिसम देता फिरता था । यह मनुष्य बनमें अधिक तथा नगरमें बहुत कम रहा करता था । इसकी शिक्षा तथा उपदेश प्रभाव शाली हैं । हीरोद बादशाहने उसको बंधनमें डाल दिया था, यह बड़ा उपदेशक था, एक स्त्रीको व्यभिचारके लिये उपदेश दिया, यह स्त्री उसकी बैरिन होगई, उसीकी सटसे योहन्ना मारा गया ।

मुहम्मद साहब ।

मुसलमान लोग मुहम्मद साहबको अन्तिम अनागतवक्ता समझते हैं । ये तीनों श्रेष्ठ भविष्यद्वक्ता हैं मूसा ईसा मुहम्मद इबराहीमकी संतान हैं मुसलमानोंकी पुस्तकमें लिखा है कि, इबराहीमसे लेकर मुहम्मदपर्यन्त इस घरानेमें चालीस सहस्र अनागतवक्ता होगए । कबीरजीके सांप्रदायी कहते हैं कि, मुहम्मद महादेवका अवतार है, महादेव भूत, प्रेत, जिन, परी, राक्षस, दैत्य इत्यादिका बादशाह है । देखो तवारीखमुहम्मदीमें । जब मुहम्मदसाहबने पृथ्वीपर अपना धर्म प्रचलित किया, उस समय सहस्रों जिन परी इत्यादि आपसे आप आकर मुहम्मद साहबके शिष्य होगए । सबोंने मुहम्मदी कलमः पढ़ा । यह मुहम्मद भूत प्रेतादिकके प्राचीन गुरु हैं । सुतरां तुलसीकृत रामायण बलकाण्डमें लिखा है, कि, जब शिवजीका विवाह राजा हिमालचलके घर हुवा, तब शिवजी जब विभूति रमाए सर्प इत्यादि गलेमें डाले बैलपर सवार होकर चले, उस समय ब्रह्मा, विष्णु, कुबेर, इन्द्र, वरुण आदिक देवता बड़े ठाठके साथ बन ठनकर बरातके साथ साथ चले । उस समय विष्णु महाराज जो बड़े हँसोड हैं हँसकर बोले कि, ए भाई ! समस्त देवताओ ! अपना अपना समाज लेकर पृथक् २ चलो । यह बात सुनकर समस्त देवतागण पृथक् २ होके चले । तब शिव अकेले रह गए । उस समय शिवजीने अपना शंख फूँका उसकी ध्वनि सुनतेही सहस्रों भूत प्रेत तथा जिन इत्यादि आनकर उनके चारों ओर एकत्रित होगए । शिवकी विचित्र बरात देखकर विष्णु तथा समस्त देवतागण हँसने लगे । पथमें बड़े बणे कौतुक होते चले । इसी प्रकार मुहम्मद साहबने जब मक्का नगरके बाहर जा, एक टीलेपर खड़े होकर हाँकें लगाई, तब सहस्रों जिन और परी इत्यादि आकर मुहम्मद साहबके शिष्य हुए । विष्णुके उपरान्त महादेव समस्त देवताओंकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं । सांसारिक वासनाओंपर आपकी श्रेष्ठ रुचि रहती है । महादेव तथा मुहम्मदका गुण एकही है । मार काट रक्तपात विनाश करनाही आपके धर्म हैं । सृष्टिके आरम्भमें शिवजीने भक्ति चलायी, मनुष्य जातिके गुरु बने, वही अन्तिम अनागतवक्ता हुए । संस्कृतमें महादेवजीका नाम महामदमय है ।

अर्थात् अत्यंत क्रोधी वही महासद अरबीमें मुहम्मद हुवा। यह महादेव वही है जिसने सृष्टिके आरंभकालमें पूजा तथा योगमुक्ति संसारमें प्रचलित की। भविष्य-पुराणमें इन्हें एक विप्रकुमार कहा है। जो कि, एक गोलोमके दूधमें पीजानेके कारण ऐसा बनना पड़ा था।

सत्यकबीर—आदिभक्त शिव योगी केली। राखी गुप्त न जगमें फेरी ॥

सांसारिक मनुष्योंको शिवजीने पूजा पाठकी वह युक्ति न बतलाई जिसको वे स्वयम् जानते हैं इसी प्रकार मुहम्मद साहबने अपना यथार्थ भेद किसी मुसलमान को न बतलाया, छिपा रक्खा।

मुहम्मद साहब अरबमें, शंकराचार्य भारतवर्षमें ये दोनों शिवजीके अवतार हैं। इसी शिव तथा विष्णुका धर्म समस्त पृथ्वीपर प्रचलित हुवा करता है। इन्हीं दोनोंका पूजन समस्त संसारमें होता है। ब्रह्माको कोई नहीं पूजता।

कबीर साहबका कथन है कि, एक लाख अस्सी सहस्र पीर पैगम्बर और सिद्ध साधु ऋषि मुनि होगाए हैं। जिन लोगोंने आकर पृथ्वीपर मनुष्योंको उपदेश दिया उनमेंसे कुछ महाशयोंका थोड़ा विवरण मैंने लिखा है। येही सब निरञ्जनके पुत्र तथा दोनों बातोंके माननेवाले हैं। कोई कोई महाशय जैन इत्यादिके समान हैं। जो वेदको नहीं मानते वे भी निरञ्जनके पञ्जेमें हैं। बाहर जानेका किसीको भी सामर्थ्य नहीं हो सकता।

इनमेंसे अनेक महाशय सदैव निर्गुण सगुणकी श्रेष्ठता प्रगट करते आए हैं। चार प्रकारकी मुक्ति और स्वर्ग नरकके दुःख सुख बतलाते आए हैं, इनमेंसे अनेकों को सत्य पुरुषकी भक्तिकी सुध रही है। इन लोगोंको छुटकारे और बंधनका ज्ञान तनिक नहीं बहुत कुछ हुवा है। समस्त मनुष्य वेद तथा पुस्तकोंको पढ़कर मस्त हो रहे। किसीने वेद और पुस्तकोंका वास्तविक तात्पर्य नहीं समझा, बहुत लोग अपनेको वेद और पुस्तकोंके विद्वान् समझते हैं। वह यथार्थमें व्यञ्जन और स्वर से भी अनभिज्ञ हैं। सभी मनुष्य स्वबुद्ध्यानुसार तथा अपने गुरुओंके शिक्षापर मनुष्योंको पथ बतलाते हुए सुकर्म सिखलाते चले आते हैं। परन्तु यह कोई नहीं बतलाता कि, यह पथ निरापत्ति है। यद्यपि समस्त उपदेशकोंका प्रण होता है सभी अपनी २ विद्या तथा बुद्धिके अनुसार लोगोंको मुक्तिका अभिलाषी बनाते हैं। जितने सिद्ध साधु और लिया भविष्यद्वक्ता पृथ्वीपर हुए तथा अब हैं सब निरञ्जन और विष्णु भगवानको परमेश्वर तथा निराकार बनाते आए हैं, पर विना तत्त्व समझे समस्त मनुष्य भटक भटककर चौरासीके बंधनमें पड़े। इनको क्या खबर कि, यथार्थ परमेश्वरकी सच्ची राह कौन है? अथवा किसके पूजनसे आवागमन