कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सोलह सुतकी उत्पत्ति
तासों कहेउ सुनू यह बानी । जो मैं कहूँ लेहु सो मानी ॥
ठीका पूरनेपरही लोककी प्राप्ति होती है ।
जबलौं ठीका पूर न आई । तब लग रहो नाम लौ लार्ई ॥
तुम तो देखा लोक हमारा । जीवनको उपदेशहु सारा ॥
जीवोंका उपदेश करनेका फल ।
एकहु जीव सरनागत लावे । सो जीव सत्यपुरुषको भावे ॥
जैसे गऊ बाघ मुख जायी । सो कपिलहिं कोई आय छुडायी ॥
ता नरको सब सुजस बखानें । गऊ छुडाय बाघते आनें ॥
जस कपिला कहैं केहरि त्रासा । ऐसे काल जीव कहैं त्रासा ॥
एकौ जीव जो भगति दिढ़ावे । कोटिक गऊ पुत्र सो पावे ॥
खेमसरी बचन ।
खेमसरि परी चरण पर आयी । हे साहिब मोहि लेहु बचायी ॥
मो पर दया करहु परगासा । अब नहिं परों कालक फाँसा ॥
सुकृत बचन ।
सुनु खेमसरि यह जम को देशा । बिना नाम नहीं मिटे अंदेसा ॥
पान प्रवान पुरुषकी डोरी । लेहिं जीव जप तिनका तोरी ॥
पुरुष नाम बीरा जो पावे । फिरके भवसागर नहिं आवे ॥
खेमसरी बचन ।
कहे खेमसरि परवाना दीजे । जमसों छोरि अपन करि लीजे ॥
और जीव हमरे ग्रह आहीं । नाम पान प्रभु दीजै ताहीं ॥
मोरे ग्रह अब धारिय पाऊ । मुक्ति संदेस जीवन समझाऊ ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रति ।
गयेउ तासु ग्रह भाव समागम । परेउ चरन नर नारि सुधा सम ।
खेमसरीबचन परिवार प्रति ।
खेमसरी सब कहि समझायी । जन्म सुफल कररे सब आयी ॥
जीवन मुक्ति चाहु जो भाई । सतगुरु शब्द गहो सो आई ॥
जमसो यही छुडावन हारे । निसचय मानो कहा हमारे ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रति ।
सब जीवन परतीत दिढ़ावा । खेमसरी सँग सब जिव आवा ॥
सब मिलकर विनय करते हैं ।
आय गहे सब चरण हमारा । साहिब मोर करो निस्तारा ॥
जाते जम नहिं मोहिं सतावे । जनम जनम दुख दुसह न भावे ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रति ।
अति अधीन देखेउ नर नारी । भासों हम अस बचन उचारी ॥
जो कोइ मनिहै सब्द हमारा । ता कहैं कोइ न रोकनहारा ॥
जो जिय माने मम उपदेसा । मेटों ताकर काल कलेसा ॥
पुरुष मान परवाना पावे । जमराजा तिहि निकट न आवे ॥
सुकृतबचन खेमसरी प्रति ।
आनहु साज आरती केरा । काल कष्ट मेटों जिय केरा ॥
खेमसरी बचन ।
कहे खेमसरि कहो बिलोई । कौन बस्तु लै आरति होई ॥
सुकृत बचन—आरतीका साज ।
छन्द—भाव आरती खेमसरि सुनु, तोहि कहीं समुझायके ।
मिष्ठान पान कपूर केरा, और अष्ट मेवा लायके ।
पांच बासन स्वेत बस्तर, कदलि पत्र आच्छन्दना ।
नारियल अरु पुहुप स्वेत चौका अरु चंदना ॥
सोरठा—यह आरति अनुमानि, आनु खेमसरि साज सब ।
पुंगीफल परमान शब्द अग चौका करे ॥
और वस्तु आनहु मुठि पावन । गो घृत उत्तम स्वेत सुहावन ॥
कबीर बचन धर्मदास प्रति ।
खेमसरि सुनि सिखापन माना । ततछन सब विस्तार सो आना ॥
सत चंदेवा दीन्हों तानी । आरति करनजुमत विधि ठानी ॥
पंच साधु तब इच्छा उपराजा । भगति भजन गुरु ज्ञान बिराजा ॥
हम चौकापर बैठक लयऊ । भजन अखंड शब्द धुन भयऊ ॥
भजन अखंड सब्द धुनि होई । दुनियाँ चाँप सके नहिं कोई ॥
सत्य सबद लै चौका साजा । जोति प्रकास अखंड विराजा ॥
सब्द अंक चौका अनुमाना । मोरत नरियर काल पराना ॥
जब भयो नरियर सिला संयोगा । काल सीस तब चम्पै रोगा ॥
नरियर मोरत बास उडायी । सत्य पुरुष कह जाति जनायी ॥
पाँच सब्द कहि तब दल फेरा । पुरुष नाम लीन्हो तिहिबेरा ॥
छन एक बैठे पुरुष तहैं आयी । सकल सभा उठि आरति लायी ॥
जब पुनि आरति दीन्ह मँडई । तिनका तोरे जल अँचवाई ॥
प्रथम खेमसरि लीन्हों पाना । पाछे और जीव सनमाना ॥
दीन्हेउ ध्यान अंग समझाई । ध्यान नामते हंस वचाई ॥
रहनि गहनि सब दीन्ह दिढाई । सुमिरत नाम हंस घर जाई ॥
छन्द—हंस द्वादश बोधि सतजुग, गयउ सुखसागर करी ।
सतपुरुष चरन सरोज परसेउ विहँसिके अंकमें भरी ॥
बूझ कुसल प्रसन्न बहु विधि, मूल जीवनके धनी ।
बंधु हरषित सकल सोभा, मेलि अति सुन्दर बनी ॥
सोरठा—सोभा बरनि न जाय, घरमनि हंसन कान्तिकर ।
रबि षोडस ससि काय, एकहंस उजियार जों ॥
कछुदिन कीन्हों लोक निवासा । देखेउ आय बहुरि निजदासा ॥
निसि दिन रहा गुप्त जग माहीं । मो कहँ कोइ जिव चीन्हत नाही ॥
जो जीवन पर बोध्यो जायी । तिन कहँ दीन्हो लोक पठाई ॥
सत्यलोक हंसन सुख वासा । सदा वसन्त पुरुषके पास ॥
सो देखे जो पहुँचे जाई । जिनयहि रचा सो कहाचिताई ॥
इति प्रमाण अनुरागसागरका ।
सहस्रों बार महाराज सत्यगुरु सत्य-सुकृत जी प्रगट होते हैं और जिस मनुष्यको सच्चा देखते उसको अपने लोकको ले जाते हैं । झूठा तो इस धर्म में ठहरताही नहीं, सहस्रों और लाखों बारका क्या हिसाब है । सत्य सुकृतजी महाराज प्रत्येक स्थानपर, प्रत्येक समय उपस्थित ही रहते हैं । जो सच्चा जीव हो वह आपको जहाँ चाहे वहाँही देखे । सच्चे प्रेम तथा साधु गुरुकी सेवासे आप प्रसन्न होते हैं और प्रत्येक जातिको सत्य पुरुषकी भक्ति प्रदान करके कालके जालसे छुडाते हैं । जो बड़ा भाग्यवान् होता है सो सत्यगुरुको पहुँचानता है । जो कालका जीव है सो कदापि पहुँचान नहीं सकता ; कारण यह कि उसको कालके गालमें जाना है ।
ग्यारहवाँ प्रकरण ।
त्रेतायुगमें कबीर साहबका पृथ्वीपर मनुष्योंको मुक्ति प्रदान कर-
नेके निमित्त आना, मुनीन्द्रजीके नामसे प्रख्यात
होना और धर्मराय निरंजनकी चिंता ।
जब सत्ययुग बीत चुका और त्रेतायुग लगा, तब फिर सत्यपुरुषकी आज्ञा