कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
इन्द्रकी कथा तपस्वीकी कथा
देवने ही मुहम्मदका औतार धारण कर मुसलमानी धर्म चला कर वाममार्गका प्रचार किया है। तंत्र शास्त्र और अघोर धर्ममें संसार प्रचलित किया है। महा-देव तमोगुणके रूप हैं तमोगुणी हैं। यही संसारका मूल है; तमोगुणसेही संसारका सब व्यवहार चल रहा है। इस मुसलमानी धर्मका आचार्य तमोगुण है।
मुसलमान कहते हैं कि,
كُلُّكَ لَأَنْفَعَنَّكَ
अर्थात्—कहता है कि, यदि न होता ऐ मुहम्मद तू, तो न उत्पन्न करता मैं पृथ्वी और आकाशको। प्रायः मुसलमान इस आयतसेही मुहम्मद पर बहुत अभिमान करते हैं। पर सन्तोंकी दृष्टिमें यह कुछ सार नहीं रखता वरन् अति तुच्छ और नीच है। क्योंकि, यह संसार यथार्थमें कुछ भी नहीं, मिथ्या भ्रममात्र है अविद्यासे इसकी उत्पत्ति है, असत्यही सत्य होकर दीख पड़ता है। अज्ञान कहो अथवा तमोगुण अथवा अविद्या सब एकही बात है। अज्ञानसे ही सृष्टि हुई है, अज्ञानकी कुछ श्रेष्ठता नहीं वरन् ज्ञानकी ही श्रेष्ठता है। निर्दयता और अत्याचार अज्ञानका चिन्ह है, तमोगुण बिना निर्दयता अत्याचार आदि आसुरी संपत्ति कुछ भी नहीं। इस (मुसलमानी) धर्मके लोग निमाज रोजा भी पढ़ते करते हैं नियत समय पर निमाज पढ़ना अपना धर्म जानते हैं, पर सब ऐसे निर्दई और कठोर हृदयके होते हैं कि हिंसा करना अपना मुख्य कर्तव्य समझ रखा है। फ़कीरोंमें भी बहुधा ऐसेही हिंसक हैं पर कोई कोई ऐसे भी होते हैं जो हिंसाको अधर्म समझते हैं। काजी और—मुल्ला बहका बहका कर, इस धर्मवालोंसे सब अधर्म करवाते हैं। उन्हींके कहनेसे इस धर्मके लोग ऐसी निर्दयता धारण किये हुये हैं कि, दया लाना अथवा दयाका संकल्प करना भी पाप समझते हैं।
जिस प्रकार हिंदुओंमें उसी प्रकार मुसलमानोंमें भी भजन, भक्ति, जप, तप आदि साधनोंकी बहुतसी युक्तियाँ हैं पर मुसलमान लोग सब धर्म कर्मको केवल जीवहिंसाके कारण मिट्टीमें मिला देते हैं, जीव हिंसा नहीं छोड़ते। यद्यपि इस धर्ममें भी बड़े २ प्रसिद्ध महात्मा तपस्वी, ईश्वर भक्त होगये हैं अब भी कोई कोई ऐसे हैं, जो दिनरात ईश्वरके भजनमेंही लगे रहते हैं, संसारसे कुछ भी सरो-
१ मैंने मुसलमानी पुस्तकोंमें देखा है और शरयी मुसलमान भी कहते हैं कि, जबह किये हुये पशुकी छटपटाहट और उसकी दुःखमय अवस्था को देखकर यदि किसी मुसलमानके मनमें दया आजावे तो वह उसी समय धर्मसे पतित होकर खुदाका गुनहगार बन जाता है। धन्य है ! ऐसे धर्म और खुदा तथा उसके प्रवर्तकों को।
कार नहीं रखते तो भी साधारणतः इस धर्मके लोग दया और नम्रतासे बहुत प्रयत्न करते हैं । इन लोगोंमें क्रोध और निर्दयता सब जातियोंसे अधिक है । यही प्रत्यक्ष प्रमाण है कि, इनका मुख्य धर्म कुरबानी आदि है जो तमोगुण और अविवेक अज्ञानता, निर्दयता बिना हो ही नहीं सकता ।
जबतक मुसलमान लोग तमोगुणका आसरा छोड़ सतोगुणका आसरा न लेंगे उसको अपना आधार न बनावेंगे, तबतक इनके अंतः—करण की शुद्धता न होगी, न इनको मोक्ष मार्गही मिलेगा वरन् ईश्वरके कोपमें पड़े रहकर नाना-प्रकारकी गर्भ आदिकी नर्क यन्त्रणा सहते हुये भौसारगमें गोता खाते रहेंगे ।
नम्रम् ।
यह इनसान है दर्द दिलके लिये । कि बेरहम रजवाँ न राजी किये ॥
न पावे कोई वह विहिस्ती दरखत । कि दिल जिसका होवे मखलूकसे सख्त ॥
यहाँ और वहाँ हूर गिलमाँ वही । वही मर्दी जन और मुसलमाँ वही ॥
वही नेमत और खवान अलवान है । वही नोश वखुद शौकतो शान है ॥
न पहचान पैगम्बरके पाक जो । यहाँ और वहाँ है गिफ्तार सो ॥
तुर्ब और तरागः बहानः । किया हम्बमें जमीन और जमाना किया ॥
गिरफ्तार लज्जात नफ़सानियाँ । यहाँ और वहाँ एक सेहो मियाँ ॥
भला ! यह भला है ? गला काटना । मिहर या क्रहर खूनका चाटना ॥
किसी जिस्म और सूरतमें जानदार हो । जहाँ दार उसका अमाँदार हो ॥
किसीकी वह ईजा से राजी नहीं । कि बेइल्म मुल्ला व काजी नहीं ॥
वह रहमान है सबका मिहरवाँ पिदर । वह हाजिरो नाज़िर है देखो जिधर ॥
वह बेचून सब जहाँ का ले हिसाब । खड़े होवें जब रक्बके आली जनाब ॥
न बदला छुटे कोई हो पीरो अमीर । कि है कौल यह सत्त साहब कबीर ॥
खुदावन्दकी बारगाह बेरया । जो हरकसके इनसाफ़ में दिल दिया ॥
रहीम जो रहमान् मशहूर है । हमेशः सो बेरहमीसे दूर है ॥
गला घोटना उसको भाता नहीं । छूरो वह गलेपर चलाता नहीं ॥
न छिड़कावता खून मुजविह ऊपर । नहीं गोश्त खाता न खाता ज़िगर ॥
न खूँखार ग्रफ़्फ़ार सितार है । क्या सो गुमाँ बेगुमाँ पार है ॥
जले गोश्त और पोस्त बदबूई हो । जो खुशबूय कहे खिला फ़ेअकल सो ॥
वह कौसा खुदा अक्षल से ऊँघता । जो बदबूको खुशबूय कर सृंघता ॥
जला करके कुरबान हो जाने जो । जो सृंघे वो खावे खुदा कौसा हो ? ॥
यह मूसाके मजहबकी बातें लिखा । जो मूसा धरम ईसा सोई कहा ॥