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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

राजा अमरसिंह

अन्न पानि नहिं ग्रासहीं, दिन दिन बाढे अङ्ग ।
नारि पुरुष दोउ हरषिया, चडे, सवाया रङ्ग ॥
महादेव तेहि अवसर, जात रहे कैलास ।
नीमा पग धरि बूझही, पूजी मनकी आश ॥
तू नीमा बड भागिनी, पूर्व जन्म तप कीन्ह ।
तोरें घर प्रभु आइया, हँसि प्रभु दर्शन दीन्ह ॥
अक्षय वृक्ष फल पायके, सुख सम्पत्ति परिवार ।
दे भाँवर बर पूजले, गावें मङ्गल चार, ॥
धरमदास बर पावल, आपन रह्यो निनार ।
साहब कबीर जूको मङ्गल, गावें सुरति सम्हार ॥

तात्पर्य — जब कबीर साहब पहले चँदबारेमें प्रगट हुए थे जिसका कि, विवरण में पहिले कर आया हूँ, उस समय पहले कबीर साहब चन्दन साहूकार की स्त्रीको मिलें उस स्त्रीके भी कोई सन्तान नहीं थी । तब चन्दन साहूकारने अपनी दासीके हाथोंसे फिर उसी तालाबमें फिकवा दिया । उसके पीछे लक्ष्मणा ब्राह्मणीको मिले जैसा कि, अनुरागसागरमें दिखा है । इसके बाद नीमा और नीरू जुलाहेके घर आये । उस समय शिवजी महाराज कैलाशको जाते थे, वे नीमाके समीप जाकर कहने लगे—ऐ नीमा ! तू धन्य है ! बड़ी भाग्यवती है कि, स्वयम् साहब तेरे घर आये ।

यह सब वार्ता धर्मदास साहब और रामानन्द स्वामी इत्यादि सभी हंस लोग कहते चले आ रहे हैं यही बात गरीबदासजीने भी कही है; वे सब सर्वज्ञता के बलसे कहते आते हैं । ये बातें देखने तथा पढ़ने सुननेकी नहीं हैं । कबीर साहब जब जैसे काशीके लहर तालाबमें प्रगट हुए थे उसी तरह चँदबारेके तालाबमें तथा नरहर ब्राह्मण और लक्ष्मणा ब्राह्मणीके घर गये । चँदबारे तालाबकी वही शोभा थी जो काशीके लहर तालाबकी थी । इसी प्रकार कबीर साहब नरहर ब्राह्मणके घरमें जाकर रहे ।

महाराजा वीरसिंह ।

पृ. ३०० में लिख चुके हैं कि, कबीर साहबकी अन्त्येष्टि किया हिन्दू-रीतिके अनुसार करनेके लिये वीर सिंहजी वधेले मगहरके पठानसे लडने पहुँचे थे उन्हें कैसे बोध हुआ इस विषयपर वीरसिंह बोध एक ग्रन्थ है जो कबीर सागर नं० ४ बोधसागरमें सामिल है, उसके कुछ-बचनोंको वहीं उद्धृत करते हैं —

धर्मदास वचन ।

चौ० – धर्म दास पूछै 'अर्थार्ई । साहब मोहिं कहो समुझाई ॥
वीरसिंह राय कीन्ह तुम' सेवा । दयाकरी' कहिये गुखदेवा ।
वीरसिंह देव बड ज्ञानी' । कैसे साहब सेवा ठानी ॥
सो वृत्तान्त कहो मोहि स्वामी । दया करी कहिये सुखधामी' ॥

सद्गुरुवचन ।

धर्मदास भल वृक्षेउ वात्प । तुमसे वरणि कहो विख्याता ॥
तनमन धनको मोह न लावै' । सो' जिव हमरे संग सिध्दावै ॥
प्रथमहि चलै भक्त पहुँजाई' । सकल सन्त जहँ भक्ति कराई ॥
नामदेव भक्तिहि' मन लावा । सैन' औ धना जाट तहँ आवा ॥
रंका' बंका' सदन कसाई । पद्मावति' दीपक तहँ लाई ॥
छूटे' तान चंदेवा दीन्हा । ठाढ़े भगत तहँ गावन लीन्हा ॥
नामदेव लोटन कर' भाई । हात ताल रविदास' बजाई ॥
धना मृदङ्ग पद्म' उँजियारा । जुड़े सन्त सब भगत अपारा ॥
धर्मदास तहँवों हम गयऊ । राम राम सबही मिलि कहेऊ ।
तब हम एक वचन कहि लीना । सकल भगतकाको मन दीना ॥
नामदेव केहि पूर्णहि ध्यावो । भक्ति करो काको मन लावो ॥

नामदेव वचन ।

नामदेव कह सन्त भुलाये । दूजा पुरुष कहाँ ठहराये ॥
हरिहर ब्रह्मा है बड़ देवा । करे सकल जग तिनकी सेवा ॥
यह प्रभु आदि मध्य औ अन्ता । शीश मुड़ाय जीव कहे सन्ता ।

सद्गुरु वचन ।

हरि ब्रह्मा शिव शक्ति जपाई । इनकी उत्तपति कहों बुझाई ।
बिना भेद भूले सब ज्ञानी । ताते काल बाँधि जिव तानी ॥
अजर अमर है देश दुहेला । सो वहि कहिये पर्मे सुहेला ॥
ताका मर्म सिद्ध नहीं जाना । कृत्रिम करता ते मन माना ॥

साखी – कृत्रिम रङ्ग सब भेदिया, वह पुरुष नीनार ॥
तीनलोक पर अलख है, पुरुष ताहिके पार ॥


१ चितलाई, २ किमिकीनी, ३ करिके दया, ४ बडा अभिमानी, ५ बहुनामी, ६ अरु, ७ जो, ८ गयऊ, ९ करन, १० सेना, ११ राका, १२ बाका, १३ पद्मावती, १४ ले, १५ चौहटे १६ सब । यह पाठ भेद हैं । १७ करे, १८ रैदास, १९ पद, ऐसा अनेक जगह पाठ भेद तथा उलटा पलटा है पाठक समन्वयके साथ पढ़ें ।

चौ० – बीरसिंह देव बघेला राजा । बैठे आनि महल चढ़ि छाजा ॥
राजा नजर सबनपै कीन्हा । सब बडे भाव भक्ति चित दीन्हा ॥
गावैं भक्त अनन्त व्यवहारा । एक भक्त कस बैठा न्यारा ॥
टोपी एक अनूपम दीन्है । माला तिलक कूवरी लीहे ॥
श्वेत स्वरूप भक्तिकी काया । महा अनन्द रूप छबि छाया ॥

राजाबीरसिंह वचन ।

राजा छरीदार हँकराई । नामदेव कहैं आनि बुलाई ॥
वेगसो छरीदार चलि आये । नामदेव राजा बुलवाये ॥

नामदेव वचन ।

नामदेव पूंछे चितलाई । राव सँग कोई और हे भाई ॥
छरीदार पुनि वचन सुनाइ । कोई नहिं रावके भाई ॥
नामदेव छड़ी हाथमें लियऊ । चलै चले राजापै गयऊ ॥
राजा देख ठाढ़ तब भयऊ । कर गहिंके आशन बैठयऊ ॥

राजाबीरसिंह वचन ।

सा० – भक्ति करो गोविन्दकी, एक चित ध्यान लगाय ॥
श्वेत स्वरूपी भक्त यक, सो कस न्यार रहाय ॥

भावारथ—कबीर साहिब धर्मदासजीसे कह रहे हैं कि, एकवार नामदेव लोटन, रबिदास आदि हरिकीर्तन करते हुए ज्ञानचर्चा कर रहे थे, महाराज वीर सिंहजी भी ऊपर बैठे सुन रहे थे कि, मैं भी वहाँ पहुँच गया पर मैं सबसे अलग बैठा हुआ था इसी पर राजाको सन्देह हुआ था, इसी संदेहको मिटानेके लिये राजा ने छड़ीदारके हाथ नामदेवजीको बुलाया एवं यही प्रश्न किया ।

नामदेव वचन ।

चौ० – राजा सुनहु वचन एक मोरा । हम तुम हरिहर ब्रह्मा दोरा ॥
ता हरि भक्ति करै बहु धासी । कहे एक पुरुष और अविनासी ॥
माला भेष ले साधु शरीरा । डीरा जोलाहा दास कबीरा ॥
कृत्रिम कहे सकल सब देवा । कहीं सौंच नहिं देखूं सेवा ॥
ऐसे कहत कबीर जुलाहा । झूठ दिबाना मन हम आहा ॥

साखी – जुलाहा निन्दत सबनको, बन्दत कोही नाहिं ।
झूठ कहत हर ब्रह्मा, कह निर्गुण यक आहिं ॥