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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

गुरुकी कृपा

साखियोंमें लिखा है । यह धर्मदासजी और कबीर साहिबका संवाद भेद सारमें लिखा हुआ है जिसमें कि, अपने शरण होनेका उपदेश दिया है ।

शरणागतके नियम

१—प्रत्येक विधि और निषेध अपने गुरु और शास्त्रके अनुसार करे ।

२—तन मन धनसे ईश्वर गुरु तथा साधुओंकी सेवा करे ।

३—इस बातका पूर्ण निश्चय रखे कि, मेरा साहब मेरे पापों तथा अपराधोंको क्षमा करके मुझे मुक्तिप्रदान करेगा ।

४—सच्चे परमेश्वरके अतिरिक्त और किसीसे सहायता न मांगे । यहाँ तक कि, कौसीभी आपत्ति क्यों न आवे तो भी दूसरे किसीसे सहायता न मांगे ।

५—अपने सत्यगुरुकी मूर्त्तिका ध्यान करे ।

६—अपने आपको परमेश्वरके अर्पण कर दे । इस प्रकार सत्य हृदयसे कहें, “प्रभु ! जो तू चाहे कर, मेरा इसमें कुछ नहीं है ।”

मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर ।

तेरा तुझको सौंपता, क्या लागत है मोर ।

७—भजन न छोड़े, सर्वथाही साहबकी आज्ञाको निरखत रहे ।

अपनेको अर्कचन मानता हुआ भगवान्के दर्शनकी अभिलाषाओंको बढ़ाता जाय । गुरु और सत्यपुरुषमें कोई भेद न माने, सदा उसी प्रकार सम्मान करता रहे । अपना अधिक समय भगवान्की विनतीमेंही लगावे, यहाँ हम सत्यपुरुषके विनय करनेकी साखियोंको उद्धृत करते हैं —

विनती अंगकी साखी

कबीर—अव गुण मेरे बापजी, बछशो गरीब निवाज ।

जों हौं पूत कपूत हौं, तऊ पिताको लाज ॥

कबीर—अवगुण किये तो बहु किये, करत न मानी हार ।

भावेबन्दा खशिये, भावे गरदन मार ॥

कबीर भूल बिगाड़िया, नाकर मैला चित्त ।

साहब गुरुवा चाहिये, नफर बिगाड़े नित्त ॥

कबीर भूल बिगाड़िया, कर कर मैला चित्त ।

नफर भी ऐसा चाहिये, साहबसे राखे हित्त ॥

कबीर—साईं तेरे बहुत, गुड़ अवगुण कोई नाहिं ।

जो दिल खोजौं आपना, सब अवगुण मोहि माहिं ॥

कबीर—साहब तुम जनि बीसरो, लाख लोग मिलि जाहिं ।

हमसे तुमरे बहुत हैं, तुम सम हमरे नाहिं ॥

कबीर—तेरे बिन जोर जुल्म है, मेरा होय अकाज ।

बिरद तुम्हारे लाजसे, शरण पडेकी लाज ॥

कबीर—या मुखले बिनती करूँ, लाज आवत है मोहिं ।

तुम देखत अवगुण, किये, कैसे भाऊँ तोहिं ॥

कबीर—बनजारी बिनती करै, नरियल लीने हाथ ।

टांडा था सो लद गया, नायक नाहीं साथ ॥

कबीर तुम्हें विसारिके, किसकी शरणे जाय ।

शिव विरञ्जिच्च मुनि नारदा, हिरदय नाहिं समय ॥

कबीर—मूझमें गुण एकौ नहीं, जानू राय सिर मौर ।

तेरे नाम प्रतापते,, पाऊँ आदर ठौर ॥

कबीर—मैं अपराधी जनमका, नख सिख भरा विकार ।

तुम दाता दुखभञ्जना, मेरी करो उबार ॥

कबीर—सुरत करो मेरे साइयाँ, हम हैं भव जल माहिं ।

आपहिं हम बह जायँगे, जो नहिं पकडो वाहिं ॥

कबीर—और पुरुष सब कूप हैं, तू है सिन्धु समान ।

मोहिं टेके तव नामकी, सुनिये कृपानिधान ॥

कबीर—अवसर बीता अल्पतन, पीव रहा परदेश ।

कलङ्क उतारो रामजी, भानो भरम संदेश ॥

कबीर—साईं मेरा सावधान है, मैं ही भया अचेत ।

मनवच कर्म न हरि भजा, ताते निर्फल खेत ॥

कबीर—मन परतीत न प्रेम रस, ना कोई तन में ढङ्ग ।

ना जानू उस पीवसे, क्योंकर रहसी रङ्ग ॥

कबीर तुमतो शैल हौ, हलकी अपनी चाल ।

रङ्ग कुरङ्गी रङ्गया, और किया लगवार ॥

कबीर—जिनको साईं रंगदिया, कवहुँ न होय कुरङ्ग ।

दिन दिन बाणी आगरी, चढ सवाया रङ्ग ॥

कबीर—मेरा मन जो तुझसे, तेरा मन कहि और ।

कहैं कबीर कैसे बनै, एक चित्त दुई ठौर ॥

कबीर—ज्यों मेरा मन तोहि से, या तेरा जो होय ।

अहिरन ताती लोहि ज्यों, सन्धि लखे नहिं कोय ॥

कबीर—अबकी जो साईं मिले, सब दुख आंसू रोय ।

चरणो ऊपर शिर धरूँ, कहूँ जो कहना होय ॥

कबीर—साईं तो मिलेंगे, पूछेंगे कुशलात ।

आदि अन्तकी सब कहूँ, उर अन्तरकी बात ॥

कबीर—सिद्धक सबूरी वाहरा, कहा हज्ज को जाय ।

जिनका दिल सावित नहीं, तिनको कहाँ खुदाय ॥

कबीर—अन्तरयामी एक तू, आत्मको आधार ।

जो तुम छोड़ो हाथको, कौन उतारे पार ॥

कबीर—भवसागर भारा भया, गहरा अगम अगाह ।

तुम दयाल दया करो, तब पाऊँ कछु थाह ।

कबीर—साहब तुमहि दयाल हो, तुम लग मेरी दौर ।

जैसे काग जहाजको, सूझत और न ठौर ॥

कबीर—स्वास सुरतके मध्यही, न्यारा कभी न होय ।

ऐसा साक्षी रूप है, सुरति निरतितसे जोय ॥

कबीर—सद्गुरु बडे दयालू हैं, सन्तनके आधार ।

भवसागर आथाहमें, खेई उतारें पार ॥

कबीर—लेनेको हरिनाम है, देनेको अनदान ।

तरनेको आधीनता, बूडन को अभिमान ॥

अज्ञ सर्व जो मैं कहूँ, परम पुरुष उपदेश ।

कहै कबीर अब हरि मिलै, मानूँ साखि सँदेश ॥

शरणका तो यही अर्थ है कि, दूसरी ओर ध्यानहीं न हो । जब दूसरी ओर ध्यान होगा तो शरणागति अवश्यही मिथ्या ठहर जावेगी । इस संसारमें जितनी शरणागति तथा भक्ति हैं वो सभी व्यर्थ हैं । सबके ऊपर केवल एक सत्यपुरुषकी शरणमें मनुष्यको सुख मिलता है । इसके अतिरिक्त समस्त शरणागतियाँ झूठी हैं । उनमें अणुमात्रभी वास्तविकता नहीं है । इसी बातको कवितामें भी कहते हैं—

मुखम्मस तरजीअबन्द

अँधेरा छा गया वक्ते अशामें । हुआ खौफो खतर बस दश दिशामें ॥

पनः ले जा पनःकी खास जामें । नहीं आराम है अरजो समामें ॥

मुसाफिर जल्द चल सुल्तां सरामें

हैं फिरते चोर ठग रहजन लुटेरे । नहीं कोई बदरकः है सज्ज तेरे ॥

पडा जङ्गलमें सबदुःख दन्द घेरे । तु हो आनन्द सुन यह पन्थ मेरे ॥ मु० ॥

शरण कब्बीरके आराम पावे नहीं । कोइ और जो तुझको बचावे ॥
वही सत पन्थ मारगको बतावे । वही सत्पुर्षके घर लेके जावे ॥ मु० ॥
हिरण यक घेरले सदाह शिकारी । मुसीबत आपडी उस पर जो भारी ॥
बचावे कौन बिन खल्लाक बारी । हुई तदबीरसे जब जान आरी ॥ मु० ॥
पडीं सब गाय दर हस्ते कसाई । किसी जानिब नहीं खूये रहाई ॥
फिरी हर सिम्तमें यमकी दोहाई । जिधर जावे उधर धर भूनखाई ॥ मु० ॥
है तीनोंलोक में यमराज था । न पावे कोई सत्य नाम निशाना ॥
यह धोखेका बना कुल कारखाना । फँसे सब आनकर मुरगों व दाना ॥ मु० ॥
नहीं कहीं धर्म सब धोखा बनाया । सो हरजानिबमें जाल अपना लगाया ॥
जो लोक और वेदकी तालिम पाया । सो सब धर्मरायके फन्देमें आया ॥ मु० ॥
लगे सब लोग धोखेके धन्धे । न सूझे आँख अन्दर बाहर अन्धे ॥
करम और भरमके हैं बीच बन्धे । रिहाई होवे सद्गुरु शब्द सन्धे ॥ मु० ॥
सदा भूखे व नङ्गेको जो देता । कहूँ एहसान उसका सबपै केता ॥
तू अबभी जल्द तरकर चेत चेता । इस आजिजकी खबर हरदम् जो लेगा ॥

मुसाफिर जल्दचल सुल्तां सरामें

जो सब साखियों मने लिखी हैं मनुष्योंके लिये सत्यगुरुका उपदेश है ।
कबीर साहब उपदेश करते हैं कि, हे लोकों ! जब तुम सत्यगुरुके शरणमें आओ
तब यह ढङ्ग ग्रहण करो, इससे तुम सत्यगुरुके कृपापात्र बनकर सत्यलोक
पहुँचो । सत्यलोकमें पहुँचनेके वृत्तान्तको निम्नके दो झूलने और एक शब्दमें
निरूपण किया है ।

हंसोंका चलाना

कबीर साहबका झूलना दश मुकामी

चला जब लोकको शोक सब छोड़िके हंसका रूप सद्गुरु बनाई ।
शृङ्ग ज्यो कीटको पलटि शृङ्गी किया आपसम रङ्ग दै ले उड़ाई ॥
छोड़ नासूत मलकूतको पहुँचिया विष्णुकी ठाकुरी देख जाई ।
इन्द्र कुब्बेर जहाँ रम्भा निरत है देव तेतीस कोटिक रहाई ॥
छोड़ि वैकुण्ठको हंसा आगे चला शून्यमें ज्योति जहाँ जगमगाई ।
ज्योति परकाशमें निरख निःतत्वको आप निर्भय हो भय मिटाई ॥
अलख निर्गुण जेहि वेद स्तुति करें तीनहुँ देवको है पिताई ।
भगवान तिनके परे श्वेत मूरती धरे भगको आन तंगवा रहाई ॥

चार मुक्काम पर खण्ड सोलह कहें अण्डको छोड़ि वहाँ ते रहाई ।
सहस्र और द्वादशे रूह है संगमें करत किलोल अनहद बजाई ॥
तासुके वदनकी कौन महिमा कहूं भासती देह अति नूर छाई ।
महल कञ्चन बने माणिक तामें जड़ बैठि तहाँ कलस अखण्ड छोजे ॥
अचिन्तके परे स्थान सोहंका हंस छत्तीस तहाँ विराजे ।
नूरका महल और नूरकी भूमि है तहाँ आनन्द सो द्रन्द भाजे ॥
करत किलोल बहु भांतिसे सङ्ग येक हंस सोहं की जो समाजे ।
हंस जब जात षट्चक्रको भेदिके सात मुकाममें नजर फेरा ॥
सोहंके परे जो सूति इच्छा कही सहस्र बावन जहाँ हंस हेरा ।
रूपके राशिते रूप उनको बना नहीं उपमा दूजे बनेरा ॥
सुरतिसे मेटिके शब्दके टेक चढ़ि देखि मुक्काम अंकूरकेरा ।
सुन्नके बीचमें विमल बैठक तहाँ सहज स्थान है गैबकेरा ॥
नवें मुक्काम यह हंस जब पहुँचि या पलक विलम्ब वहाँ किया डेरा ।
तहाँ से डोर मकरतार जो लागिया ताहि चढ़ि हंस गो दे दूरेरा ॥
भये आनन्दसे फन्द सब छोडिके पहुँचा जहाँ सत्यलोक मेरा ।

दूसरा झूलना

जुलमत नासूत, मलकूत में फिरिश्ते, नूर जल्लालजबरूतमें जी ।
लाहूतमें नूर जम्माल पहचानिये, हक मकान हाहूतमें जी ॥
बका याहूत, साहूत, मुरशिद रहे, जोय अंकूरराहूतमें जी ।
कहत कबीर अविगत आहूतमें, खुद है खाविन्द जाहूतमें जी ॥

शब्द-सा'ई तेरा अर्शतख्त' है दूर ।

बिन मुरशिद' कोई भेद न पावे भटक भुये सम क्रूर ॥
चौदह तबक' खाबकी रचना आतिशकासा फूल ।
लाज छोड़ि जिन काज किया है भये चरणके धूल ॥
नासूतमें' माया खड़ी मलकूत गुण अस्थूल ।
जो कोई निजको समझि बूझे तामें नाहीं भूल ॥
जिबरूतमें जम जाल है लाहूत अच्छर मूर ।
हाहूतमें अचिन्त पुरुष है बजत अनहद तूर ॥
वेद पुराण कुरान गीता यहां लग खबर जहूर ।
सोहं इच्छा यहांसे आये सब घट व्यापक नूर ॥

सब जीवनको त्रास देखिके समरथ वचन कबूल ।

कहे कबीर हम खुदके अह्दी लाये हुकम हुजूर ॥

निम्न लिखित शब्दमें योग और वेदान्तका रहस्य अत्यन्त गंभीरताके साथ भरा हुआ है बड़ी ही उच्च कोटिका है...

  • यथा—यह जग पारख बिना भूलाना ।
    निर्गुण सर्गुण दोकर थापै अजपा धरि धरि ध्याना ॥
    निर्गुण वंश सरगुण गुण रहितम गुण विन कहा समाना ।
    द्वैत ब्रह्म सकल घट व्यापै त्रिगुणमें लपटाना ॥
    आवै जाय उपजे फिर विनसै जरि मरि कहाँ समाना ।
    सहस पाखुरी कमल विराजै मन मधुकर लपटाना ॥
    जलके सूखे कमल कुम्हलाना तब कहु कहाँ ठिकाना ।
    छओ चक्रवर्ति चार चतुर्दश वेद मती अरु ज्ञाना ॥
    बद्ध नालकी डोरी खींचें योगिन युगति वखाना ॥
    घरमें कर्ता लोग बोलत हैं पांचो तत्त्व नशाना ॥
    करे विचार सकल मिलि ऐसा भेष विविधि विधि बाना ।
    कहै कबीर कोई गुरुगम पावे पहुँचे ठौर ठिकाना ॥

अब यहां मैं कुछ बातें कबीर साहब तथा निरंजनकी वार्तालापकी लिखता हूँ । जिसमें पाठकगणोंको कालपुरुष तथा सत्यगुरुका विवेक हो जाय. क्योंकि, जब

  • यह संसार सच्चे गुरुके बिना भटकता फिरता है । अजपा गायत्रीका भजन ध्यान करने मात्रहीसे ब्रह्मवेत्ता बनकर निर्गुण सगुण दो भेद एकही ब्रह्मके कर डाले पर यह तो बता कि जब निर्गुणका पसारही सगुण है तो वो निर्गुण बिना गुणका होकर सगुण कैसे हो गया उसका निर्गुणपना कहाँ चला गया ? त्रिगुण प्रधानसे लिप्ट जानेके कारण ही ब्रह्मा द्वैत हुआ है वही जीव बन कर घट २ में रम रहा है वो शरीरके साथ जन्म मरण और आवागमन कर रहा है लिङ्गशरीरके भेद हो जाने पर तो कहाँ जाकर समावेगा यदि लय मानोगे तो । समाधिकालमें मनन करनेवाला जीव मूर्धके सहस्रदल कमल पर भारिकी तरह लिप्टता है अथवा अनेकों कणिकाओंवाले हृदय कमलमें ध्यान अवस्थामें मन स्थिर होकर भगवान्के स्वरूपका ध्यान करता है पर जब पानीके सूख जानेपर वो कमल कुम्हिला जायगा तब इस मनका कौनसा ठिकाना होगा । इतना पदार्थ काकूके अनुपममें कहकर अब स्पष्टरूपसे कहते हैं कि योगियोंने जो योगकी युक्ति बताई है उसके अनुसार वंकनाल (सुषुम्नाका सिरा) की डोरी (अपान) खींचकर छओ चक्रोंको भेदकर तथा चौदहवें स्थानमें पहुँच वहाँकी अलौकिक वेद मती और ज्ञान प्राप्त करके वहाँ पहुँच जाता है । यहाँ पांचों तत्त्व नष्ट हो जाते हैं जीव आत्मरूप हो अपनेको सब कुछ कहने लगता है तथा कर्ता भी अपनेको समझता है । इस लोकमें पहुँचनेकी तो सभी भेष तयारी करते हैं पर जिसे पारख गुरु मिलेंगे वही उस स्थानको पहुँचैगा दूसरा नहीं पहुँच सकता ।