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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

स्वसंवेदका सार, बिन्दी

विद्वान् और बुद्धिमान् बनना चाहता है उसको चाहिये कि, मूर्ख बन जावे । जो सांसारिक बुद्धिमत्ता और विद्वत्ता है वह परमात्माके निकट मूर्खता और निर्बुद्धिता है, परमात्मा अभिमानी पण्डितोंको विद्याकेही जालमें डरझा रखता है ।

जबूरमें अयूबके विषयमें—परमात्मा बुद्धिमानोंकी बुद्धिमत्ता असत्य कर देगा, वे स्वयं अपनी इच्छा पूर्ण नहीं कर सकेंगे । विद्याभिमानियोंको विद्याके जालमें फँसाए रखता है, जो टेढ़े तिरछे लोग हैं उनकी बुद्धिमानोंको शिरके बल उलटा देता है, वे लोग दिनके प्रकाशमें भी अंधेरेके समान अन्धे हो दूढ़ते फिरते हैं ।

फिक्रियाका सिद्धान्त—मुहम्मद साहबके बहततर पंथोंमेंसे फिक्रिया नामक पन्थका वचन है कि पुस्तकावलोकन आदि विद्याकी विशेष वृद्धि होते ही भक्ति और भजन नष्ट हो जाता है ।

शिष्टका वचन—किसीने कहा भी है कि,—

श्लोक—जातिविद्या महत्त्वं च रूपं यौवनमेव च ।

यत्र नैव प्रजायन्ते पञ्चैत भक्तकण्टकाः ॥

जाति, विद्या, रूप, मान, युवावस्था ये पांचों भक्तिके परम शत्रु हैं, जबतक इनसे निवृत्त न होगा तबतक भक्ति न कर सकेगा । इसी प्रकार पृथिवीके सारे विरक्त महात्मा कहते चले आते हैं । यदि मनुष्य भक्तिका कुछ भी अनुराग रखता हो तो विद्वान् होता हुआ भी विद्याका अभिमान छोड़ दे ।

विद्याभिमानियोंका आधार—दो बातों पर है एक पुस्तक अर्थात् दृष्टि ज्ञान और दूसरा उनका ज्ञान । दोनोंही असत्य हैं । क्योंकि, दोनों परिवर्तनशील हैं । दोनोंका कुछ भी विश्वास नहीं । बालकपनसे मृत्यु तक इनमें परिवर्तन हुआ करता है, इनपर भरोसा करना गुरुको न दूढ़ना महामूर्खता है । मनुष्य धर्मद्वेष और पक्षपात छोड़कर देखे विचारकर उचित व्यवहार करे तो निस्सन्देह इष्टको प्राप्त कर सकता है । पहले गुरुकी पहचान अवश्य है, जबतक गुरुको न पहचानेगा तबतक कोई कार्य पूरा नहीं हो सकता । बुद्धिमानों वही है जो सद्गुरुको पहचानकर उसके चरणका रज हो जावे अपने विचारको गुरुकी आज्ञानुसार काममें लावे ।

यह एक सीढ़ी है जो पृथिवीसे ऊपर आकाशमें लगाई है उसके चार दण्डे हैं, शरीयत (कर्म काण्ड) तरीकत (योग और उपासना) हकीकत (ज्ञान) और मारफत (विज्ञान) आदिक ।

जितने विद्याभिमानी संसारमें हैं सब शरीयत (कर्मकाण्ड) के दण्ड

पर खड़े हैं, आगे पग नहीं बढ़ा सकते। जिसके दण्डे पर सब सांसारिक तथा विद्याभिमानी खड़े हैं, वह क्या है? वह तो केवल अज्ञानी अन्धोंके लिये है।

कबीर साहबने कहा है—‘अन्धेको दरपण वेद पुराण’।

वेद, पुराण, किताब कुरान आदि ऐसे हैं; जैसे अन्धोंके सामने दरपण। ऐसाही इञ्जीलमें, पोलूस रसूलका पहला तमताऊसको खत देखो ८ और ९ आयत—हम जानते हैं कि, शरीयत (कर्मकाण्ड) अच्छा है, यदि उसकी रीति पर भली प्रकार वर्तवि किया जावे।

यह शरीयत (कर्मकाण्ड) सत्यवादियोंके लिये नहीं है वरन् शास्त्र विमुख, दुराचारी, अधर्मी पापी, माता पिताको बद्ध करनेवालों, अन्यथाचारियों, विषयी, मनुष्य विक्री करनेवालों झूठे, झूठी शपथ खानेवालों आदि काफ़िरोंके लिये है। इनके अतिरिक्त और भी जो सत्यपथसे विरुद्ध हों उनके लिये है। क्यों कि, दण्डव्यवस्था इसीमें है।

सभी विद्याभिमानी सन्तोंकी कृपा बिना शरीयत—कर्मकाण्ड—में बँधकर मनमुख हो गये। सन्त राजा हैं। पठित अपठित मनुष्य उनकी प्रजा हैं। राजाको कर देना तथा उसकी आज्ञाकारिता करना उचित है, जो न करेगा वह अवश्य कैंद होगा। संसारके सन्त गुरु शिक्षक हैं। जो रीतिसे गुरुकी सेवा न करेगा वह पदसे भ्रष्ट हो जावेगा। गुरु और ईश्वरका धन्यवाद करना आवश्यक है। जिसका गुरु नहीं है उसका ईश्वर भी नहीं है। गुरु और सन्तसे ईश्वर की प्राप्ति होती है। जिसका गुरु न हो वह एक अथवा दो ईश्वरोंकी भक्तिका दावा करे तो झूठा है, उसको द्वैत अथवा अद्वैत किसी प्रकारसे ईश्वरकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस प्रकार विद्याभिमानी अपने ऊपर आपत्ति उठाते हैं। इसके ऊपर एक दृष्टान्त है कि—

बुल्लेशाह और शरई—साई बुल्लेशाह साहब, विरक्त महात्मा, लाहोरके निकट कुसूर नामक कसबामें रहते थे। उनकी भजन भक्ति माहात्म्य समस्त पंजाबमें प्रसिद्ध है। उनके समयमें कुसूरमें एक बड़ा आलिम शरई रहता था। वह सर्वदा बुल्लेशाह साहबकी निन्दा किया करता था उनसे शत्रुता रखता था। उसने समस्त कुसूरके पठानोंको बहकाया कि, यह बुल्लेशाह बड़ा बेशरा है। उसकी बातोंको सुनकर सब पठान लोग शाह साहबके विरोधी हो गये। शाह साहब तो विरक्त थे, उनको मुसलमानी रोजा निमाजसे अथवा कर्मकाण्डसे क्या सरोकार था यह सब तो प्राकृतिक मनुष्योंके लिये हैं, विरक्त उसको क्यों मानने लगे? इस भेदसे प्राकृतिक जन अज्ञात हैं। वह मौलवी