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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

५ अ० कबीर पन्थके धार्मिक नियम

अवतार हुआ। यद्यपि वहाँ कौशल्यका वर पाना अतिही सुगम था तो भी उन्होंने वात्सल्य भक्तिसे प्रेरित होकर भगवान् को पुत्र बनने काही वर माँगा क्योंकि, बिना अपने ध्येयके आगे विश्वके साक्षाज्यको, नरककी भयंकरका तपत साधन समझते हैं। येही भगवान् रामचन्द्रजी महाराज कबीर जी साहिबके परम इष्ट थे। स्वामी रामानन्दजीसे ये ही दो अक्षर कानमें पड़नेके बाद मंत्रका रूप आपसे पूछा तो आपने परिस्फुट शब्दोंमें समझाते हुए कह दिया कि, 'राम न कह्यो खुदाई' ऐ मुसलमानों! तुम रामका महत्त्व नहीं समझ सकते, किन्तु तुमभी भूलके साथ इस खुदा शब्दसे भी रामको ही याद कर रहे हो।

इसी बातको शब्द चारमें कह दिया है कि—'हिन्दू कहै मोहि राम पियारा, तुरक कहै रहिमाना। आपसमें दोउ लरि लरि मूये, मर्म कोई नहि जाना' हिन्दू कहते हैं कि, हमें राम प्यारा है तथा तुरक रहमानका प्यारा बताते हैं। दोनों आपसमें लड २ कर मर गये पर मर्मका पता न चला कि, रामको ही वो दयालु कहकर याद कर रहे हैं। इन्होंने और भी कितनी ही स्थलोंपर भगवान् रामका गुण गाया है जिसमें से कुछ एक यहीं उद्धृत करते हैं।

शब्द १३—राम तेरी माया दुन्दि मचावे ॥

गति मति वाकी समझि परे नहिं, सुरनर मुनिहिं नचावे ॥ १ ॥

कबीर साहिब कहते हैं कि, हे राम! तेरी माया ऊधम मचा रही है। या मैं तू का भेद कर रही है यदि यह न हो, तो मैं तू का भेद न रहे। उसकी चाल तथा ज्ञान विचार जाने नहीं जाते यह सुर नर मुनि सबको नचा रही है।

शब्द ८—वे रघुनाथ एकके सुमिरै जो सुमिरै सो अन्धा ॥ ७ ॥

बिना एक सत्यपुरुष रघुनाथके सुमिरन किये जो किसी दूसरेका स्मरण करता है वो अन्धा है भगवान् रामको छोड़कर किसीका भी स्मरण न करना चाहिये।

१—दो शब्द—प्रायःभमें कबीर मंशूरका अर्थ कबीर साहिबकी ज्योतिर्या कहा गया है। इस कारण इस ग्रन्थमें कबीर दर्शन या उससे सम्बन्ध रखनेवाले एवम् उसके परिपोषक विषयोंका ही संग्रह होना चाहिये। कबीर साहिबका जीवन चरित्र भक्तभालमें है। सनातन धर्मों उन्हें इस कराल कलिकालके भक्तोंमें एक उच्च कोटिका मानते हैं। इस नातेसे वे भी उनपर उतनीही श्रद्धा रखते हैं जितनी कि, उनके सम्प्रदायके लोग उनपर रखते हैं वे परम भक्त थे। इस कारण उनका महत्त्व ईश्वरसे भी अधिक वर्णन किया जाय तो सनातनियोंकी तो आनन्दकी ही बात है। क्योंकि उनके यहाँ तो "दासानुदासो भवितास्मि भूयः" का अधिक महत्त्व है।

ईश्वरके दास होनेसे पहले ईश्वरके दासोंमें अपना नाम लिखाना सबसे उत्तम मानते हैं। इस कारण उनका महत्त्व वर्णन तो सुखका ही कारण होगा किन्तु जो बात उनके वचनों तथा उनके मान्य साम्प्रदायिक ग्रन्थोंसे बिल्कुल विभिन्न हो उस बातको उनके प्रकाशमें मिश्रित करना सर्वथा अनुचित प्रतीत होता है।

शब्द १४—रामरा संशय गाठिन छूटे । ताते पकरि २ यम लूटे ॥ १ ॥

जो राम के उपासक नहीं हैं उनकी संशय की गांठ नहीं छूटती इस कारण सबको यह पकड़ २ कर लूटता है । इन दोनों शब्दोंसे कबीर साहिबने स्पष्ट शब्दोंमें कह दिया है कि, रामको छोड़ दूसरेका स्मरण करना अन्धोंका काम है, बिना उसका स्मरण किये संशयकी गांठ नहीं छूटती । हृदयकी कुन्डी नहीं खुलती रामका अनुभव या यथार्थ ज्ञान क्यों नहीं होती । इस पर कबीर साहेब कहते हैं कि—

स्मृति वेद पुराण पढ़ै सब, अनभव भाव न दरशै ।

लोहो हिरण्य होय धों कौसे, जो नहिं पारस परसै ॥

चाहे वेद स्मृति पुराण एवम् अनेक तरहके सम्प्रदायिक पोथा पढलो पर बिना अविचल प्रेम दृढ़ विश्वास और सच्चे गुरु रामका अनुभव हो नहीं सकता । वो सीताके लिये बन २ फिरनेवाला रावणका संहारक ही दीखेगा । पर जब पारसरूप गुरु मिल जायेंगे तो परसकर लोहे को पारसकर सोना बना लेंगे ।

उसी रामने सुप्रीवकी सख्य भक्तिके वश हो उसके बडे भाई बालिपर छलसे प्रहारकरके अपने बनाये कर्म नियमको, भी मर्यादा पुरुषोत्तमने अटल दिया कि, ए अंगद ! तू बापके बदलेके लिये उतावला न हो मैं तेरे बापका बदला स्वयं चुकाऊंगा । हुआ भी ऐसा ही । कृष्णावतारमें मर्यादा पुरुषोत्तमने कर्मफलकी मर्यादाको अनिवार्य दिखलाते हुए बालिके हाथके तीर से ही इच्छामय लीलाविग्रहका संवरण किया । भिलनी केवल निषादराज राक्षसराज और गीधराज आदि अनन्तोंको अपनाकर अपना नित्यधाम दिया जिसके रहनेवाले भगवानकी आज्ञासे संसारमें लोक कल्याणके लिये आकर भी निर्द्वन्द्व रहते हैं जैसे वहाँ अनुभव करते थे वैसाही यहाँ पर भी करते रहते हैं । श्रीकबीर साहेब बडे भी अपनानेवाले आप थे, कबीर साहिबमें जो भी कुछ कबीरपंथा था वो सब आपकी कृपाकाही फल था ।

पूर्णब्रह्म भगवान् कृष्ण ।

अब हम भगवान् कृष्णचन्द्रजीके कुछ वात्सल्य पूर्ण गुणोंको सुनाना चाहते हैं जो कि, अवतार लेकर एक भक्तिको देखते हैं, दूसरे वहाँ कुछ भी भेद भाव नहीं होते । कश्यप ऋषिके दिति अदिति नामकी दो स्त्रियाँ थीं । अदितिसे राजा इन्द्र उत्पन्न हुआ । वह देवतोंका बड़ा बलिष्ठ राजा हुवा । तब दितिने कश्यपजीसे निवेदन किया कि महाराज ! मेरे ऊपर भी दया करो कि, मेरा

भी इन्द्रके समान बलिष्ठ तथा प्रतापी पुत्र उत्पन्न हो तब कश्यपजीने कहा कि, तूभले कार्य कर तो तेरा पुत्र भी वैंसाही होगा और दिति भी सुकर्म करने लगी। तब दिति गर्भवती हुई जब उसको गर्भ रहा तब दितिका चेहरा तेजमय हो गया। यह स्वरूप देखकर अदितिने ईर्षा की और अपने पुत्रसे कहा कि, ए पुत्र। तेरा बैरी दितिके गर्भसे उत्पन्न हुवा चाहता है जो तुमसे सामना करेगा। तब इन्द्रने कहा कि, माता ! तू कोई चिंता न कर, मैं भली भाँति युक्ति करूँगा, तब इन्द्र एक छोटा अस्त्र लेकर और बहुत छोटा रूप धारण करके अपने योगबलसे दितिके पेटमें पैंठ गया, उस गर्भके बालकके सात टुकड़े किए और फिर उन सातमें भी और सात २ टुकड़े किए। जब उस बच्चेको दुःख हुआ तब रोने लगा। तब इन्द्रने कहा कि, ए भाई ! तुम मत रोओ, तुम सब उनचास मरुत् हो गए। जब दितिको मालूम हुवा कि, आदितिके कहनेसे इन्द्रने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया और मेरे गर्भके पुत्रके उनचास टुकड़े किए, तब उसने अदितिको शाप दिया कि, जैसे तेरे पुत्रने मेरे पुत्रको मारा काटा है उसी प्रकार तेरे पुत्रोंका भी विनाश हो और तू बंधनमें पड़े। जैसे बंधन तथा गर्भमें मेरे बच्चेको मारा तैसे बंधनमें तेरे बच्चे मारे जावें। वही अदिति देवकी हुई और कश्यप ऋषि वसुदेव हुए।

उन्हींके घर जब कि, पृथ्वीने जाकर पुकार किया कि, मेरे ऊपर पापी राक्षस और अनेक दैत्य इत्यादि होगए हैं मैं दुःखी हूँ। इस कारण इनके मारनेके निमित्त कृष्णावतार हुवा। समस्त राक्षसों तथा दैत्योंका विनाश किया। इसी प्रकार विष्णु अवतार पृथ्वीपर हुवा करता है और अवतार धरकर राक्षसोंका नाश करते हैं।

इन्होंने मुमुक्षुजनोंके कल्याणके लिये गीता जैसे शास्त्रका निर्माण किया जिसके छोटेसे रहस्यकी चिनगारियोंके सोले, मात्र ही सारे संप्रदायके रहस्य हैं। कबीर साहिबने इस गीता काही अनुवाद उग्रगीताके नामसे करके धर्मदासजी को सुनाया है। सौलभ्य गुण, जितना इस अवतारमें मिलता है उतना किसीभी में नहीं मिलता। उग्र गीतामें कहा है कि —सर्वव्यापक मैं हों भाई, मोहि बिन दूजा और न कोई” मैं सर्वव्यापक सत्य पुरुष हूँ, मैं ही एक हूँ मेरे बिना और कोई नहीं है। ये ही सत्य लोकके अधिपति हैं, राम आदि इन्हीके अनन्त नाम हैं, हंस कबीर इन्हींके लोकसे आते जाते हैं।

क्या इस रहस्यसे ईसाई अनभिज्ञ हैं ? अथवा मुहम्मद साहबके ग्रन्थोंका वृत्तान्त मुसलमान लोग नहीं जानते हैं ? सब जानते हैं। परन्तु इस मनुष्यके

मनमें विचार और चिन्ता नहीं है कि, उसपर विचार करके यथार्थ अवस्था से विज्ञ हो । न उनके मनमें दूढ़नेकी अभिलाषाही है ॥

विष्णुके उपकार ।

कितने मनुष्य ऐसा कहते हैं कि, हम तो विष्णुको परमेश्वर कदापि न मानेंगे और न उसकी कृतज्ञता स्वीकार करेंगे । भला विचारना चाहिए कि, यदि चूहा कहे कि, मैं शेर बबरसे सामना करूँगा उसकी कृतज्ञता न करूँगा । भला यह संभव है कि, चूहा शेर बबरसे विरुद्धता कर सके । ऐसेही ये मूर्ख मनुष्योंके ध्यान हैं कि, हम विष्णुकी आज्ञासे बाहर चरण रक्खेंगे । यह बात सर्वतोभावसे असंभव है कि, कोई मनुष्य मायाकी सेवासँ बाहर जासके । हों वह मनुष्य जो साधुगुरुकी सेवामें तन मन धन अर्पण करेगा वह विष्णुके वात्सल्यभावसे बंधनसे निकलेगा । जितने तनुपोषक और सांसारिक कांक्षासे भरे हैं कोई किसी धर्मका क्यों न हो सदैव विष्णुका सेवक रहेगा । क्योंकि, जितने धर्म पृथ्वीपर हैं वे सब बन्धनके कारण हैं कबीर साहबके शरण बिना अन्तमें समस्त जीवोंको विष्णुकी मायाके ग्रहमें प्रविष्ट कराते हैं । इस ब्रह्माण्डको चीरकर पार जानेकी किसीमें सामर्थ्य तथा बल नहीं जो कोई कुछ पावेगा सो सत्तगुरुकी सहायतासे पावेगा । दूसरी कोई युक्ति नहीं । सबके सब वेद और पुस्तकोंके बंधनमें पड़े हैं । केवल गुरुमुख पार उतरेंगे, मनमुख सब डूब मरेंगे । गुरुमुखके निमित्त भक्ति मुक्ति प्रस्तुत हैं । मनमुखके निमित्त सदैव का बंधन प्रस्तुत है । इस बातको समस्त संत महंत सदैवसे पुकारते चले आते हैं । गुरुमुखके निमित्त दोनों संसारमें विभ्राम है । समस्त ऋषि सिद्धि गुरुमुखके चरे हैं ।

मुखम्मस तरजीयबन्द ।

सरापा जीव करमोंसे लदा है । तमन्ना दीनवीमें पुर सदा है ॥

बहरदो एकसो शाहो गदा है । कहाँ दर ख्वाव विहमुक्ती पदा है ॥

यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।

है जैसी रूह वैसे ही फ़रिश्ते । बंधे सब जीव हैं आमालरिश्ते ॥

कुदूरत और आलायश आगश्तः । न कर होश इब्र आदम कालकुशतः ॥

यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।

यह कहने ही को हैं सब आदमेजाद । कियाशहवातने अकल उनकी बरबाद ॥

तअस्सुबमें हुए हैवान दिलशाद । यही सब जीवके बंधनकी बुनियाद ॥

यह जैसा जगत् है वैसा खुदा है ।

न सद्गुरु बिन वसह तदबीर छूटे । न अमाला कारिश्नः उसके टूटे ॥

जपो तपज्ञान ध्यान उसका सो लूटे । जिघर जावैं उधर धर कालकूटे ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

फिकरमें सब लगे खुद खावसुखरकी । न खिदमत और नपरस्तिशसाधुगुरुकी ॥
खबर क्योकर मिले उस धामधुरकी । फँसे सब फंदमें ठगजीव बुरकी ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

न तन मन धनसे हो जबसे निरासा । रहेगा तबतलक यह काल फाँसा ॥
करो जप तप महलमें होवे वासा । हवस जब तर्क हो मुक्ति हो पासा ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

हवस है दीनवी दिलमें यह जवतक । न पावै रस्तगारी जीव तब तक ॥
सभी आमाल इसके जाल अवतक । न हरगिज पहुँचे घरलासा नीरव तक ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

तअस्सुब छोड़कर कर अकलओ होश । यगानः मिल बेगानः कर फ़रामोश ॥
नसाएह पन्द सुन अज्ज सन्त करगोश । मदद गुरु साधु चल तु पार नौ कोश ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

जिधर जावे उमर जीवका मरण है । हरण दुःखद्वंद्व सतगुरुकी शरण है ॥
वही मुकता वही तारनतरन है । वह आजिज जीवकापोशन बेहतरन है ॥

यह जैसा जगत है वैसा खुदा है ।

इसका भाव वही है जिसका कि, निरूपण कर चुके हैं । उसीके सारको लेकर इस कवितामें कहा है कि दोनोंका एकही रूप है सत्य पुरुषसे भिन्न नहीं ।

अध्याय ८.

ब्रह्माजीकी कथा ।

यह ब्रह्मा समस्त संसारका रचयिता कहलाता है । इस ब्रह्मासे समस्त संसार है । यह रजोगुण अर्थात् प्रवृत्तिकी प्रतिमूर्ति हैं । बुद्धिरूप ब्रह्मा है । इससे समरत वेद और विद्या संसारमें प्रचलित हैं । इस ब्रह्माका स्थान लिङ्ग छः पत्तोंके कमल सो अधिष्ठान चक्रमें है । यह ब्रह्मा प्रवृत्तिकी कामनाको


यहाँ साहबके सांप्रदायिक कबीर ग्रन्थोंका सम्बन्ध छोड़कर ब्रह्मा और शिवजीपर देवी भागवतके धामक आधारपर लोग स्वतंत्र ही लिख पढ रहे हैं । यद्यपि यों यह ऐसे स्थलोंमें आवश्यक है । उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी । परन्तु मनुष्यकी अनन्त भावनाएँ होती हैं । न जाने किस भावनासे लिख दिया करते हैं । यह उनका ही अन्तःकरण जानता होगा । हम ऐसे विषयोंका कितनी ही बार सार्वजनिक समन्वय दिखा चुके हैं । जिन्हें ऐसे प्रकरणोंके रहस्यकी जिज्ञासा हो वो हमारे तिभिरभास्कर आदि ग्रन्थोंको देख लें । यहाँ दिखाना नहीं चाहते । अच्छा होता यदि इन कहानियोंके स्थानपर भक्ति ज्ञान वा स्वयं वेदकी इन्हींके विषयकी बातें होतीं ।