कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
२० अध्याय । आदि मंगल
शेखफरीदका भोजन - मुसलमानोंमें बड़े प्रतिष्ठित महात्मा हुये । बहुत दिनोंतक वृक्षकी पत्तियां खाकर तपस्या करते रहे । एक दिन अपनी माताके निकट गये । माताने पूछा, बेटा ! तू किस प्रकार भजन करता है ? उन्होंने उत्तर दिया कि, वृक्षोंकी पत्तियां खाकर रहता हूँ । माताने शेखजीके दो एकबाल पकड़के खींचे, तब वह सी ! सी !! करने लगे, माताने कहा, ऐ बेटा ! उनको इस प्रकार दुःख न होता होगा ? उस दिनसे शेखजीने वृक्षकी पत्तियां तोड़नी छोड़दी वे काठकी रोटियाँ बाँधे फिरा करते थे ।
शाहू बू अलीकलन्दरके - पांवमें कीड़े पड़ गये, कोई कीड़ा बाहर गिरता तो उसको उठाकर फिर रख लेते, कहते कि, ऐ भाई ! तू किधर जाता है, भूखा मरेगा, तेरा भोजन तो खुदानी यहाँही बनाया है ।
रघुकी दया - सुना था कि, महाराज ! रामचन्द्र रावणको मारकर अयोध्यामें आये । ऋषीश्वरोंसे पूछा कि, मैंने ऐसा कौनसा पुण्य किया था, जिसके बलसे बड़े बलवान शत्रुपर विजय प्राप्त की । ऋषीश्वरोंने उत्तर दिया कि, महाराज ! आपके प्रपिपामह महाराज रघु कहीं चले जाते थे, मार्गमें कुत्तेको तड़पते देखा, उसके शिरमें एक बड़ा कीड़ा पड़ गया था, जो कुत्तेके भेजाको नोच २ कर खाता था, इससे कुत्ता विकल होता था । राजाने वह कीड़ा उसके शिरसे निकाल दिया । कुत्ता सुखी हुआ, पर कीड़ा तड़प २ के मरने लगा । राजाने कीड़ेपर दया करके उसको अपनी जोंघ चौरकर उसमें रख लिया, कीड़ा जोंघमें जाकर सुखी हुआ । उस कीड़ाकी रक्षा करनेके कारण राजाको महान् पुण्य हुआ । उसीके प्रतापसे आपने शत्रुको जय किया ।
सुबुकुतगीनके शाहू होनेका कारण - इसीके अनुसार दूसरा दृष्टान्त लिखता हूँ । जो लेथबूज साहबके भारत इतिहासमें लिखा है कि अल्पतगीनका गुलाम सुबुकुतगीन था । एक दिन घोड़ेपर सवार हो शिकार खेलने गया । जंगलमें एक हरिणीको बच्चासहित देखकर विचार किया कि, बच्चेको जीवित पकड़कर ले चलूँ । घोड़ा बढ़ाकर जालसे बच्चेको पकड़ लिया, उसको लेकर बहुत दूर न गया होगा कि, पीछे फिरकर देखा कि, हरिणी बच्चेके लिये रोती चिल्लाती चली आती है । हरिणीकी इस दशाको देखकर सुबुकुतगीनके मनमें दया आई, बच्चेको छोड़ दिया । हरिणी बच्चा लेकर चली, जैसे जैसे आगे जाती थी पीछे फिर फिरकर देखती जाती थी, उसकी दृष्टिसे ऐसा प्रगट होता था कि, उपकारके बदले हृदयसे धन्यवाद और आशीर्वाद देती चली जाती है । उसी रातको सुबुकुतगीनने ऐसा स्वप्न देखा कि, एक फिरिस्ता उसके सिराने खड़ा होकर कहता है कि, सुबुकुत-
गीन ! तूने जो हरिनीके बच्चेपर दया की उसके पलटेमें तुझको गजनीकी बादशाहत मिली । चाहिये कि, इसी प्रकार सब जीवधारियोंपर दया करता रहे इसके पश्चात् थोड़ेही दिनोंमें सुबुकुतगीन गजनीका बादशाह होगा ।
महापाप — मुसल्मान कहते हैं कि, हम अपना जबह किया हुआ हलाल समझते हैं, यह उनका कहना एकदम झूठ है । मुर्दा मछलीको किसने जबह किया । मुर्गी बतखके अण्डे आदिकके खानेके लिये कौनसा कलमा उतरा । अपने मारीको हलाल खुदाकी मारीको हराम कहना काफिरका काम है, जीवितको मार डालना महापाप है, जबहकी उसके जीवित करनेकी शक्ति नहीं रखते ।
कुत्तेके बचानेका महापुण्य — किताब दोस्तोंके दूसरे बाबमें यह कहानी लिखी है कि, एक भला आदमी जङ्गलमें चला जाता था. उसने एक कुत्तेको देखा कि, प्यासका मारा मर रहा है । उसने अपने शरसे टोपी लेकर पगड़ीमें बांध पानी भरा कुत्तेको पिलाया, कुत्तेके प्राण बच गये इस पुण्यके प्रतापसे उस समयके पैगम्बरको आकाशवाणी हुई कि, उस पुरुषको इतना पुण्य हुआ है कि, उसका सब पाप नष्ट हो गया । ध्यान देने योग्य बात है, जब एक जीवके बचानेसे इतना पुण्य हुआ तो जान मारनेसे कितना भारी पाप होता होगा ।
यथा-भिहिशती दर्दमन्दा हैं बुजुर्ग । नहीं इन्साँ बा आदते गुर्ग ।।
वही आदम वही हैवान हशरात । वही है और नहीं कुछ दूसरी बात ।।
मुंसी मिश्रका सच्चा सिद्धान्त — मुंसी मिश्र नामका एक बड़ा पण्डित बनारसमें आया । उसने मछलीको अपनी ध्वजामें बांधकर खड़ा कर दिया विज्ञापन दे दिया कि, यदि कोई पण्डित वेदशास्त्रके अनुसार मांस आहारको निषेध ठहरा दे तो मैं उसका सेवक बन जाऊँ । बनारसके सब पण्डितोंने बहुत युक्तियाँ की पर वह परास्त नहीं हुआ । एक दिन पण्डित लोग विचार करके ठीक उसी समय जब कि, गङ्गामें स्नान कर रहा था, उसके पास गये । जाकर कहा कि, महाराज ! इस समय आप गङ्गामें खड़े हैं सत्य कहिये मांस खाना उचित है कि, अनुचित ? मिश्रने कहा कि, जब आप लोग वेदशास्त्रके आधारसे परास्त न कर सकते तो धर्मबद्ध करके परास्त करने आये हैं, अब मैं सत्य कहता हूँ कि, मांस खाना बड़ा भारी पाप है, इतना कह उसी समय पण्डितने मांस त्याग दिया कण्ठी बांधकर बैष्णव हो गया ।
घृणित दुर्गन्धि — मांस आहारी मनुष्य और पशुके शरीरसे ऐसी दुर्गन्धि निकलती है जिससे महाघृणा होती है ।
महात्मा और राजा — एक राजा आखेटको गया, बहुतसी शिकार मारकर
कितनेको जीवित पकड़कर ले चला । रास्तेमें एक महात्मा बैठे, हुआ था. बादशाह उसके निकट जा दण्डवत् करके प्रतिष्ठासे बैठ गया । फिर पूछा की महाराज ! कुछ सेवाकी आज्ञा हो. महात्मा उठा बादशाहकी मोछोंसे २-३ बालोंको पकड़कर उखाड़ लिया. बादशाहको बहुत दुःख हुआ. आज्ञा दी कि, इस फकीरको मार डालो । तब महात्माने कहा, ऐ बादशाह सबकी जान एक समान है. तूने इतने जीवोंको मारा कैद किया है, क्या उनको दुःख नहीं होता होगा ? उनका दुःख परमात्मा न सुनेगा ? इसी प्रकार महात्माने बादशाहको समझाया तो समझ गया, कठोरताके ऐसे कामको छोड़ दिया । उस दिनसे किसी जीवको दुःख न देनेका प्रण करके महात्माका शिष्य होगया ।
कबीर साहिब—भी अहिंसकोंके आशीर्वादमें सर्वशक्ति मानते हैं कि
सूखी अस्थिनको चुमे, जीव न सतावे कोय ।
ता पक्षीकी छाँहतर, क्यों न छत्रपति होय ॥
मांसमें शूरता नहीं—जो लोग ऐसा ध्यान करते हैं कि, मांस खाने और मदिराके सेवन करनेसे मनुष्यमें बल बढ़ता है, शूरता आती है, वे बहुत झूलमें हैं । उनको उचित है कि मुर्गा, बटेरे, बुलबुल आदिककी भयानक लड़ाई देखें मुर्गा और बटेरे लड़ते २ मर जाते हैं पर रणको नहीं छोड़ते । इस प्रकरणमें अबतक जो कुछ निरूपण किया गया है उसीका सार निम्नके गजलमें दिये देते हैं—
गजल—करेगा मिहर जो उसपर मिहर है । क्रहरके एवजमें बेझक क्रहर है ॥
बहर जांदारमें रुहे इलाही । वही रहमान म्यानैं जेरो जबर है ॥
किसीके खूनका बदला न छूटे । सभीके साथ दावर दाद गर है ॥
करम और फ़जल सबपर हैं उसीका । सिताना गैर जाँका पुरखतर है ॥
मिहरबां बाप सारे खल्कका वह । मुसीबत और बला जालिम उपर है ॥
हिसाबोंमें पड़े अमलोंके सारे । न छूटे राम ब्रह्मा विष्णु हर है ॥
न बे गुरज़ान कोई राह पावे । भटकता फिरता यह जीव दर बहर है ॥
है वे मुरशिदके जाहिल आदमी यह । न मर्दुम है वही बेदुमका खर है ॥
हशरके रोज़ खुश मज़लूम सारे । बहर जानिवसे जालिमको ज़रर है ॥
जो खाया गोश्त औरोंका भरजोर । न खा क्यों गोश्त अपना पेटभर है ॥
महासिब रूबरू मालूम होगा । तेरा आमाल नामा हाथ धर है ॥
जिसकी तरफसे दुनियामें है जब । खुदात आलाका वह भी एक नफ़र है ॥
वह भी बन्दा तू बन्दा हो न गन्दा । अता तुझको हुई तेगे ज़फ़र है ॥
दिया तुझको उसीने साजों सामों । तेरी खिदमतकीदी शमसो कमर है॥
जो करे न पसन्द यह जिक्र आजिज । सो जाहिलसे भी जाहिल ख्वारतर है॥
अपेयके पानका निषेध ।
अखाद्यके खानेके निषेधकी तरह अपेयके पानका भी निषेध है, अखाद्यके खानेका तरह अपेयके पानका निषेध किया गया है । अब मुख्य रूपसे इसी विषयका प्रतिपादन करते हैं —
स्वसंवेद—गौ जो विष्ठा भक्षणी, विप्र तमाखू भङ्ग ।
शस्त्र बँधे दर्शनी, यह कलयुगका रंग ॥
कलियुग काल पठाइया, भांग तमाखू फीम ।
ज्ञान ध्यानकी सुधि नहीं कहैं कबीरा तीम ॥
भाँग तमाखू छूतरा, अफीऊन और शराब ।
कबीर कौन करै बन्दगी, यह तो भये खराब ॥
भाँग तमाखू छूतरा, जन कबीर जो खाँहि ।
योग यज्ञ जपतप कियै, सबै रसातल जाँहि ॥
भाँग तमाखू छूतरा, सुरापान ले घँट ।
कहैं कबीर ता जीवकी, धर्मराय शिर कूट ॥
भाँग तमाखू छूतरा, जो इनसे करे पियार ।
कहैं कबीरा जीवसो, बहुत सहे शिर मार ॥
भाँग तमाखू छूतरा, परनिन्दा पर नारि ।
कहैं कबीर इनको तजै, तव पावै दीदार ॥
सुरापान अचवन करे, पिवै, तमाखू भंग ।
कहैं कबीरा रामजन, तामें ढंग कुढंग ॥
सुरापान अचवन करे, पिये तमाकू भंग ।
कहैं कबीरा रामजन, ताको करो न संग ॥
भाँग तमाखू फीमको, दौड़ि २ कर लेहि ।
कहैं कबीर हरि नामको, पीछेही पग देहि ॥
भाँग तमाखूके गौहक, राम नामके नाहि ।
कहैं कबीर जनमें मरे, लख चौरासी माहि ॥
राखें बरत एकादशी, करै अन्नका त्याग ।
भंग तमाखू ना तजै, कहैं कबीर अभाग ॥
हरिजनको सो है नहीं, हुक्का हाथके माहि ।
कहैं कबीरा रामजन, हुक्का पीवैं नाहिं ॥
हुक्का तो सोहैं नहीं, हरिदासनके हाथ ।
कहैं कबीरा हुक्का गहे, ताको छोड़ो साथ ॥
अमल अहारी आतमा, कबहुँ न पावे पार ।
कहैं कबीर विचारिके, त्यागे तत्व विचार ॥
अमलीके बैठो मत, एक पलकहूँ पास ।
संग दोष तोहि लागि है, कहैं कबीरा दास ॥
अमली हो बहु पापसे, समुझत नाहीं अन्ध ।
कहैं कबीर अमलीको, काल चढ़ावे कन्ध ॥
जहैं लग अमल हराम सब, दोऊ दीनके माहिं ।
कहैं कबीरा रामजन, अमली हूजे नाहिं ॥
भोंड़ी आवे बास मुख, हृदया होय मलीन ।
कहैं कबीरा राम जन, माँगि चिलम नहिं लीन ॥
मुखमें थूकन देइ नहिं, महर कोई जनि देहिं ।
कहैं कबीर यह चिलमको, जूँठ जगत मुख लेहिं ॥
छाजन भोजन हक्क है, अमल जो नाहक लेहिं ।
आप तो दोजख जात है, औरन दोजख देहिं ॥
आन अमल सब त्यागिके, राम अमल तब खाय ।
जन कबीर भाजन, भ्रम, औरन कछू सुहाय ॥
राम अमलको छोड़िके, और अमल जो खाय ।
कहैं कबीर तेहि परिहरो, गुरुके शब्द समाय ॥
कबीर प्याला प्रेमका, अन्तर लिया लगाय ।
रोम रोममें रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥
दूसरे दूसरे प्रमाण ।
समस्त वैष्णव धर्मके लोग इसके सहमत हैं कि, मदिरा मत्सोंकी पीनेकी वस्तु है ।
जैन धर्मवाले भी ऐसेही मानते हुए कहते हैं । बौद्ध धर्मवाले भी इसको
वैसाही त्याज्य समझते हैं । इनके हिंदुओंके दूसरे संप्रदाय भी इसके छूने तक
दोष मानते हैं ।
महम्मदके धर्ममें भी सब प्रकारका नशा हराम है।
शराबीकी बुद्धि और अन्तःकरण अशुद्ध हो जाते हैं, उससे कदापि भजन नहीं हो सकता, यही कारण है कि, उसको ज्ञान नहीं मिलता।
पूरबके नीचोंकी सराब पीनेकी रीति—मछपोंकी, रीति है कि, मछ पीनेवाले इकट्ठे होते हैं मंडली बांधकर बैठ जाते हैं, शराबका प्याला हर एकके सामने रखा जाता है, सब लोग मदिराको अपनी उँगलीसे लगाकर माथेमें लगाते हैं, यह चन्दनका चिन्ह है पीछे राम राम कहके प्याला उठाते हैं, यह उस तोतेका चिन्ह हैं क्योंकि, तोता राम राम कहता है। तीसरे जब शराब पीकर उन्मत्त होते हैं, बक झक करते हैं ब्रह्मभूत लगे हुयेके समान चिन्ह प्रगट करते हैं। चौथे बेहोश होते हैं तो नालियों और गंदगियोंके जगह लेटते हैं, यह रीति पूरबदेशके नीच जातियोंमें मेरे सामने १८५९ में प्रचलित थी, इस समय कुछ खबर नहीं कि, है वा नहीं।
नरकका चिन्ह—शराबके अर्थसे प्रगट होता है कि, शराब वह चीज है जिसके पीनेसे बदमाशी और बरबादी प्रगट हो देशी बोलीमें भी इसको मछ कहते हैं, मछ नरकका चिन्ह है।
राक्षस—जब समुद्र मथा गया और शराब निकली यह राक्षसोंको दी गई, इसलिये जो मदिरा ग्रहण करता है वह राक्षस है।
टीटोटेलर (टेम्प्रेन्स) सोसायटी—अंग्रेजोंमें मछ त्यागियोंकी एक मण्डली है, जिसको टीटोटेलर सोसाइटी (Tetotalor Society) और टेम्प्रेन्स सोसाइटी भी कहते हैं। इस सोसायटीकी आज्ञा है कि, जो कोई इस सोसाइटीमें सम्मिलित हो, वह पहले सभी प्रकारके मादक पदार्थोंका त्यागकर इसी प्रकारका एक-रारनामा दाखिल करे कि, मैं आजसे किसी प्रकारका मादक पदार्थ न खाऊंगा, न खिलाऊंगा न दूंगा न दिलाऊंगा न बेचूंगा न बेचवाऊंगा। जो कोई इस प्रकारका प्रतिज्ञा पत्र देता है उसको सोसाइटीमें सम्मिलित करके एक परवाना देते हैं जिसको वह पुरुष अपने पास रखता है जिससे यह प्रमाणित हो कि, यह पुरुष टीटोटेलर सोसाइटीका मेम्बर है।
आधे मरे—मुझको याद आती है कि, मैं किसी लण्डनके अखबारमें पढ़ा था कि, लण्डन शहर नगरमें मछपोंकी गिनती हुई दो तीन वर्ष के बाद फिर जाँचकी गई तो जान पड़ा कि आधेके लगभग, मछप मर गये।
नशेके दोष—(१) नशेबाजका कोई विश्वास नहीं करता और न उसकी कुछ प्रतिष्ठा होती है न वह इस योग्य होता है। (२) नशाके सेवनसे
अन्तःकरण सब प्रकारके पापोंकी तरफ झुकता है। (३) नशेबाजोंके शरीरसे घृणित दुर्गन्धि आती है, मानो साक्षात् नरक जीवित होकर पृथिवीपर फिरता है। (४) नशेबाज दाम देकर लोक परलोककी अप्रतिष्ठा मोल लेता है। (५) तौरैतमें गिनतीकी किताबमें लिखा है कि, जो कोई स्त्री अथवा पुरुष शुद्ध हुआ चाहता है, तो उसे चाहिये कि, वह मदिरा तथा अंगूर आदिकके रससे अलग रहे (६) हूसिआ नबीकी किताबका ४ बाबकी ११ आयतको देखो, हरामकारी और शराब पीना अन्तःकरणकी चतुराई और बुद्धिको नष्ट कर देता है।
प्रतिष्ठित—लूकाकी इच्छीलका १ पहला बाब १५ आयतमें, यहिया नबीका हाल लिखा है कि, वह खुदावनकी नजरमें प्रतिष्ठित होगा जो अंगूरका रस तथा मद्य न पियेगा।
धिवकार तथा आफसोसके पात्र—एसिआ नबीकी किताबका ५ बाब २२ आयत देखो, उनपर धिवकार और आफसोस है जो शराब पीने और मादक पदार्थोंके सेवन करने तथा दूसरोंको सेवन करानेमें बली होते हैं।
अपराधी एसिआह नबीकी २८ बाब और ८ आयतमें देखो—मनुष्य नशासे पाप करते हैं, पाप करके दुखी होते हैं, डगमगाते हैं न्यायके स्थानमें अपराधी ठहरते हैं।
बुद्धिका नाशक—इस बात पर सभी जातियें सहमत हैं कि, बुद्धिही द्वारा लौकिक पारलौकिक सर्व प्रकारकी विद्या प्राप्त होती है, बुद्धिसेही कला कौशल आदि सर्व प्रकारकी चतुराइयाँ मिलती हैं, सांसारिक सुखसे लेकर मोक्ष तक सब सुख प्राप्त करानेवाली वस्तु बुद्धिही है। विचारना चाहिये कि मादक पदार्थोंसे जब बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है तो उसके सेवन करनेवालोंके लोक परलोकका क्या ठिकाणा ? मादक पदार्थके सेवनसे ऐसा अमूल्य पदार्थ बुद्धि नष्ट हो जाती है तो इससे बढ़कर दूसरा हराम क्या होगा ? इन्द्रियोंसे परे मन है, मनसे परे बुद्धि तथा बुद्धिसे परे आत्मा है आत्माके समीप रहनेवाली तथा समाचार देनेवाली बुद्धि नष्ट हो गई तो वहां के समाचार कौन कहेगा ? इस हेतु जब बुद्धि गई मृत्यु आई विपत्ति सिरपर पड़ी। क्योंकि भगवत्गीतामें लिखा है कि “बुद्धिभ्रंशात् पतिष्यति”।
मांसखोर मद्य नहीं पीते पर मद्य व मांस बिना नहीं रह सकते—मादक पदार्थोंका सेवन मांस आहारसे भी अधिक बुरा है क्योंकि प्रायः कितनेक मांस आहारी मांसको खाते हैं पर मद्य नहीं पीते। ऐसा कोई मद्यप नहीं जो मांस न
खाता हो । इस प्रकार सर्वमद्यप मांस आहारी हैं, यही एक प्रमाण है कि मद्यपान पापों और घृणित कर्मोंका सरदार है । देखो, मुसलमान लोग मांस तो खाते हैं पर शराबियोंसे घृणा रखते हैं, उनकी मुहफिलमें कोई शराबी बैठने नहीं पाता, ऐसेही संयमी और साधुओंकी सङ्गतिमें भी मद्यप नहीं जा सकते
सुलेमान—सुलेमानके इन्सालका २३ बाब, २० आयत देखो उसमें लिखा है कि, तू उन लोगोंके साथ न हो जो मद्यप हैं ।
फिर इसी बाबके ३० आयतसे ३३ आयत तक लिखा है कि, जो देर तक मद्य पीते हैं जो मद्यकी खोजमें रहते हैं उनके ऊपर तथा जब लाल लाल छटा और रंगोंको दीखलाती हुई मदिरा दीख पड़े उसका आकर्षण तुम्हारे अन्तःकरणमें हो तो उसकी तरफ दृष्टि मत डाल, ध्यान मत दे । क्योंकि वह साँपके मानिन्द काटती है, बिच्छूके समान डङ्क मारती है ।
अनेकोंका मांस खाया—जिस समय शराब खींचनेके वास्ते पदार्थोंको सड़ानेके लिये भिगोते हैं तो उसमेंसे अगणित जीव उत्पन्न होते हैं फिर उसको भट्ठी में डालकर मद्य खींचते हैं तो उसके साथ उन कीड़ोंकाभी रस खिंच जाता है । वे सब कीड़े भट्ठीमें मरकर गल जाते हैं । उन्ही जीवधारियोंके अंशसे मदिरा तैयार होती है । जिसने एक गिलास शराब पी लिया उसने करोड़ों जीवधारियोंका मांस खा लिया । मदिराके बनानेमें अनन्त जीवोंकी हिंसा होती है, इस कारण मदिरा बनानेवाले, बेचने वाले और पीनेवाले सभी समान पापी हैं उनसे अच्छे मनुष्य घृणा करते हैं ।
मुहम्मद साहबके अक्षर तथा मद्यकी गन्धसे सभी तप नष्ट—मुहम्मद साहबके समयमें दैत्योंके रहनेकी जगह खैबर थी मुहम्मद साहबने अलीसे कहा कि, ज़िबराईल मेरे पास इस्मआजम लाये थे वह मुझसे सीख जाओ वहाँके खजानेसे धन ले जाओ, यदि तुमसे कोई सामना करे तो उससे लड़ो डरो मत । क्योंकि, इस्मआजम जिसके पास होता है उसकी सर्वदा विजय होती है । अली इस्मआजमको सीखकर वहाँ गये पर विजय प्राप्ति नहीं हुई, क्योंकि, उस गढ़में एक महात्मा रहता था, जिसकी रक्षामें वहाँके रहनेवाले थे । उसी महात्माकी कुपासे कोई किला ले नहीं सकता था । जब हजरत अली किलाको न जीत सके तो मुहम्मद साहबने उन्हें स्वप्नमें उपदेश दिया कि, ऐ अली ! इस शहरमें एक फकीर रहता है उसे किसी न किसी उपायसे शराब खानेके निकट ले जा उसकी नाकमें शराबकी गन्ध आवेगी तो उसका माहात्म्य जाता रहेगा । जागने के बाद अलीने वैसाही किया, उस फकीरकी नाकमें मदकी गन्ध पहुँचतेही
उसका माहात्म्य जाता रहा, उसकी तपस्या और भजनका सब फल नष्ट हो गया। अलीने फिरसे गढ़पर चढ़ाई की, किलेको जीत लिया उस फकीरको भी कत्ल कर दिया। केवल शराबकी गन्धसे उसकी वर्षोंकी तपस्या और भजनका प्रभाव जाता रहा, जो नित्य मद्य पीते हैं उनकी क्या गति हो? यह बेही शोच लें।
फिरस्ते हारूत और मारूतकी शराबसे दुर्दशा—तफसीर अजीजीमें अबिन हरीरा व इब्र हातिम हाकिम, इब्र अब्बास व इब्र अबदुल्लाह और इब्र उम्र आदिकने कहा है कि, अदरीस पअम्बरके समय पापी लोग आसमान पर चढ़े फिरस्ते मनुष्योंसे घृणा करने लगे। खुदाने कहा कि, मनुष्योंमें काम और क्रोध भरा हुआ है, इस कारण उनका मन पापकी अर झुकता है, यहाँतक कि, यदि तुम पृथिवीपर भेजेजाओ तुममें कामक्रोध दिया जावे तो पाप करनेसे तुमभी नहीं बच सकोगे। फिरिस्तोंने खुदाके वचनपर विश्वास न किया कहा कि, हम पृथिवीमें जाकर किसी प्रकारका पाप न करेंगे। खुदाने कहा, तुम जपनेमेंसे ऐसे दो फिरिस्ते भेजो जिसके कि, बिगड़नेकी तुम्हें किसी प्रकारकी शंका न हो, फिरिस्तोंने अपनेमेंसे तपस्या और भजनमें सबसे अधिक प्रतिष्ठित हारूत और मारूत नामक फिरिस्ते खुदाके समक्ष उपस्थित किया। खुदाने उनको पृथिवीपर भेजा कि, तुम जाकर मनुष्योंको उपदेश करो, सावधान कोई पाप न करना। दोनों पृथिवीपर आये, मनुष्योंको उपदेश करने लगे। कुछ दिनोंके बाद एक महासुन्दरी पुंश्चली जुहरा नामक स्त्री पर दोनों आशक्त हो गये उससे अपने कामवृत्तिको प्रगट किया। उसने कहा कि, यदि तुम मुझे चाहते हो तो मेरी चार बातोंमेंसे किसी एकको स्वीकार करो। तब तुम्हारी इच्छा पूरी होगी। वह चार बातें यह हैं—प्रथम मेरे पतिको बद्ध करो, दूसरी—मेरे बुत्तको दण्डवत् करो, तीसरी—शराब पीओ, चौथी—मुझे इस्मआजम बतलाओ। उन्होंने सब तो महापाप समस्या पर मद्यका पीना सुगम समझकर पीलिया। जब मद्यका नशा चढ़ा तो उसकी प्रतिमाको भी दण्डवत् किया, उसके पतिको मारा, जोहराको इस्मआजम भी सिखला दिया। जुहरा तो इस्मआजमके बलसे आशमानको उड़ गई, पर खुदाने हारूत मारूतके पैरोंमें जंजीर बांधकर बाबुलके कुवेमें लटकवाय दिया। उनपर कयामतके दिन तक नित्य आगके कोड़े पड़ते रहेंगे, प्यासके मारे उनकी जिह्वा बाहर निकल आई है; जिह्वासे एक विलस्तके फासलेपर मीठे पानीका झरना बहता है, उनको वह पानी भी पीनेके लिये नहीं मिलता। वे दोनों शैतानोंको जादू सिखलाया करते हैं शैतान मनुष्योंको बहकाकर पाप लगाता है। शाह अबदुलअजीजे लिखा