कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
१२ अध्याय : विश्वास
देखो ज्ञानगुदरीके अन्तमें ।
श्रद्धा चँवर^१^ प्रेमके धूपा । नौतम^२^ सूरत साहबका रूपा ॥
गुदरी पैर आप अलेखा । जिन यह प्रगट चलाई भेखा^३^ ॥
साहब कबीर बक्स^४^ जब दीन्हा^५^ । सुरनर मुनि सब गुदरी^६^ लीना ॥
देखो ग्रंथ भवतारण धर्मदास वचन ।
संशय^७^ किए एकही ओरा^८^ । तुमही थे कि, है कोई औरा^९^ ॥
सत्य सत्य सा मोसे कहिए । संशय रहत^१०^ सोई पद^११^ गहिए^१२^ ॥
सत्य कबीर वचन ।
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । सकल भेद^१३^ मैं कीन्ह प्रकासा^१४^ ॥
जौन^१५^ परतीत होय जिव^१६^ तोरा । भवको मेट संग रहो मोरा ॥
धरमदास तुम छोड़ो माया । अस्थिर^१७^ अमर अखण्डित काया^१८^ ॥
भक्ति मुक्ति उपजी^१९^ है जासों । प्रेमको लगन^२०^ लगाओ तासों ॥
साखी—अब तो वह ठौर^२१^ बतावहुँ^२२^, निर्मल ठौर निनार^२३^ ।
सबसे पर^२४^ सबसे ऊपर^२५^, जहाँ एक ओंकार ॥
चौपाई—पुरुष कहो तो पुरुषौ^२६^ नहीं । पुरुष भया^२७^ मायाके माहीं ॥
शब्द कहो तो शब्दौ^२८^ नहीं । शब्द भया मायाके माहीं ॥
द्वै विन होय न ओम् आवाजा^२९^ । कहिए कहासु^३०^ काज अकाजा ॥
नाम कहो तो नाम न ताका^३१^ । नाम राय काल है जाका ॥
है अनाम^३२^ अक्षरके माँही । निह अक्षर कोई जानत नहीं ॥
धर्मदास तहाँ बास हमारा । काल अकाल न पावे पारा^३३^ ॥
ताकी भक्ति करै जो कोई । भवते^३४^ छूटे जन्म न होई ॥
साखी—भवतारन^३५^ भरमै^३६^ नहीं, यही परताप^३७^ हमार ।
निश्चय करिके मानि^३८^ है, तो उतरे भवनिधि पार^३९^ ॥
धर्मदास वचन ।
हे स्वामी यह अकथ^४०^ कहानी । आगे सुनी न काहू^४१^ जानी ॥
जहाँ वहाँ तुम समरथदाता^४२^ । मोको जान^४३^ परी^४४^ यह बाता ॥
१ चमर, बीजना, २ नूतन, ३ भेष, पन्थ, ४ दान, ५ दिया, ६ ज्ञान गुदरी, ७ सन्देश, ८ तरफ, ९ दूसरा, १० हीन, ११ स्थान, १२ स्वीकार करिये, १३ हाल, १४ जाहिर, १५ जो, १६ दिल । १७ स्थिर, १८ शरीर, १९ पैदा हुई, २० लौ, २१ जगह, २२ बताओ हूँ, २३ निराला, २४ परे, २५ शिरमोर, २६ पुरुष भी, २७ हुआ, २८ शब्द भी, २९ शब्द, क्या, ३० जिसका, ३१ नाम बिना, ३२ बिना, ३३ थाह, ३४ संसारसे, ३५ संसारके पार करनेमें, ३६ भूले, ३७ प्रताप, ३८ मानेगा, ३९ किनारे पर, ४० नहीं कहीं जानेवाली, ४१ किसीने भी, ४२ सामर्थ्यवान् ४३ मालूम, ४४ हुई, ।
नाम कबीर धरयो सो काहे^१^ । कारण कौन देह धरि आए ॥
देहधरे^२^ सबही दुख पाया । तुमका काहेन व्यापी माया ॥
सत्य कबीर वचन ।
हो धर्मदास कहो तुम साचा । मिथ्या^३^ नहीं तुम्हारे बाचा^४^ ॥
तुमहो अंसवंस पति राजा । तुम्हारे मोह करनेके काजा ॥
आदि अनादि समीपै^५^ मोरा । अब मैं कारज करिहौँ^६^ तोरा^७^ ॥
वहोंसे तुमको दीन्ह^८^ पठाई । यहाँ आनके लागी काई^९^ ॥
कालपुरुष राख्यो^१०^ विलम्हाई^११^ । जो सब सृष्टि बनाए खाई ॥
जग जीवनसे तुम हो न्यारा । तुम्हारे काज^१२^ लीन्ह^१३^ औतारा ॥
और कारज मोरे कछु नाहीं । रहूं निरन्तर^१४^ जगके माँही ॥
मोहि न व्यापी^१५^ जगकी माया । कहन सुननको है यह काया^१६^ ॥
देह नहीं और दरसे^१७^ देही । रहूं सदा जहाँ पुरुष विदेही^१८^ ॥
यह गतिको नहि जानै कोई । धरमदास तुम राखौ गोई^१९^ ॥
आदि पुरुष निह अच्छर जानो । देही धरि मैं प्रगट बखानो^२०^ ॥
गुप्त^२१^ रहूं नाहीं लिखपाया^२२^ । सो मैं जगमें आन चिताया ॥
जुगन जुगन आयो संसारा । रहूं निरन्तर प्रगट पसारा ॥
सत्ययुग सत्य सुकृत वही खेरा । त्रेतानाम मुनिन्दर^२३^ मेरा ॥
द्रापर करुणामय^२४^ नामधराया । कलियुगनाम कबीर कहाया ॥
चारों युगमें चारों नावन^२५^ । माया रहित रहूं सब ठावन^२६^ ॥
सो जग पहचाने नहि भाई । सुर नर मुनि रहे मुखगाई^२७^ ॥
बीजक शब्द ।
नरको नहि परतीत^२८^ हमारी ॥
झूठे बनज^२९^ कियो झूठे सँग, पूंजी सबन मिल हारी ॥
षट्दर्शन^३०^ मिल पंथ चलायो, तिरदेवा^३१^ अधिकारी ॥
राजा देश बड़ो परपञ्ची^३२^, रैयत^३३^ रहत उजारी^३४^ ॥
१ क्या, २ शरीर धारण किये पीछे, ३ हे झूठ, ४ वचन, ५ समीपी, ६ करुणा, ७ तेंरा, ८ दिया, ९ माया । १० रखा, ११ विरमा, १२ लिये, १३ लिया, १४ हमेशा, १५ लगी, १६ शरीर, १७ प्दीबे, १८ सत्यपुरुष, १९ छिपा, २० कहो, २१ छिपा, २२ देख, २३ मुनीन्द्र, २४ करुणाके खजाने, २५ नामोसे, २६ जगह, २७ कह रहे हैं, २८ विश्वास, २९ व्यापार, ३० जोगी, जंग, सवेग, सन्यासी, दरवेश और ब्राह्मण, ३१ ब्रह्मा, विष्णु, महेश, ३२ बखेडी, ३३ प्रजा, ३४ ऊजड, ।
उतते' इत इतते' उत राखन, यमकी साट सँवारी ॥
जीवनकपि' डोर बाँधे बाजीगर, अपनी खुशी परारी' ।
यही टेटरुं उतपत' परलयको', विषया' सभैं बिकारा' ॥
जैसे श्वान अपावन' राजी, तेवन' लागी संसारी ।
अजहूँ'' लेऊँ छोड़ाय कालसे, जो करसुरत'' सम्हारी'' ॥
प्रतिज्ञा अङ्गकी साखी ।
कबीर- शब्द'' हमारा आदिका'', इनसे बली न कोय ।
आगा पीछा सो करे, जो बलहीन'' होय ॥
कबीर- घर घर हम सबसे कहा, शब्द न सुने हमार ।
ते भवसागर बुडहीं'', लख चौरासी धार ॥
कबीर- हङ्ग त्वङ्गके बीचमें, मेरा नाम कबीर ।
जीव मुक्तावन'' कारण'', अविगत'' दासकबीर ॥
कबीर- झहां करतमन'' था, धरती'' हती न नीर ।
उतपत परलय नाहती, तबके कथी'' कबीर ॥
हम कर्ता सब सृष्टिके, हम पर दूसरा नाहिं ।
कहैं कबीर हमें चीन्हे'', नहिंपरे चौरासी माहिं'' (बीजक६२९)
कबीर- लोहा चुम्बक प्रीति, जस'' लोहा लेत उठाय ।
ऐसा शब्द कबीरका, कालसे लेत छुड़ाय ॥
कबीर- यह संसारको, समझायो सौबार, ।
पूँछ जो पकड़ी भेड़की, उतरा चाहे पार ।
कबीर- मैं कलिका कोतवाल'' हूँ, लेहहो शब्द हमार ।
जो या शब्दको मानि है उतरै भवजल पार ॥
कबीर- शब्द उपदेश जो मैं कहूँ, जो गोई माने सन्त ।
कहैं कबीर बचावके, ताही'' मिलावन'' कन्त'' ॥
कबीर- हिन्दू तुर्कके बीचमें, मेरा नाम कबीर ।
जीव मुक्तावन कारणे, अविगत धरा शरीर ॥
१ इससे उस जोनमें, २ उससे इस योनमें, ३ बन्दर, ४ पड़ा हुआ, ५ उत्पत्ति, ६ प्रलय,
७ विषय रूप रस आदि, ८ परिवर्तनशील, ९ अपवित्र हाड़ आदि, १० तँसेही, ११ अवभी,
१२ याद, १३ सावधान । १४ रामनाम, १५ अनादि, १६ कमजोर, १७ डूवेंगे, १८ मुक्तकराने
१९ लिये, २० विचारनेमें न आये, २१ कृत्य, २२ पृथ्वी, २३ कहीं, २४ जाने, २५ भीतर,
२६ जँसी, २७ रखवाला, २८ उसीको २९ मिलाने, ३० मालिक,
कबीर- जाय मिल्यो परिवारमें, सुखसागरके तीर ।
वरण पलट हंसा किया, सद्गुरु शब्द कबीर ॥
प्रेम पि^१^ छौरी तानके, सुख मन्दिरमें सोय ।
घर कबीरको पायके, कहा मुक्तिको रोय ॥
कबीर- बहुत गुरु भए, जगतमें, कोई न लागे तीर ।
वै गुरु वह^२^ जायगे, जाग्रत^३^ गुरु कबीर ॥
कबीर- पीर पैगम्बर औलिया, धर धर मरे शरीर ।
अजर अम्बर^४^ पलटे नहीं, ताका नाम कबीर ॥
मैं कबीर । बिचलों^५^ नहीं, शब्द मोर^६^ समरर्थ^७^ ।
ताको लोक पठाइहों, जो चढ़े शब्दके रथ^८^ ॥
कबीर- ओंकार निश्चय किया, यह कर्ता मत^९^ चान ।
साँचा शब्द कबीरका, परदेमें^१०^ पहचान ।
अनन्त कोटि ब्रह्मण्डका, एक रती नहि भार ।
साहब पुरुष कबीर है, कुलका सर्जनहार^११^ ॥ [क. वी. ६३८]
इसी प्रकार समस्त सूक्ष्म वेदमें कबीर साहबकी प्रशंसा भरी हुई है, भली भाँति खोल खोल पुकार पुकार बारम्बार कबीर साहबने कहा है कि, मैं स्वयम् सत्यपुरुष हूँ, स्वयम् मैं ही सृष्टिका रचयिता तथा समस्त जगत्का स्वामी हूँ, मेरे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है । जो कोई मुझको पहचानेगा वो भव-सागरके पार हो जावेगा ।
वेदमें कबीर ।
आशुः शिशानो वृषभो न भीभो, घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम्, संकन्दनो निमिष ए कबीरः शतं सेना अजयत् साकमिन्द्रः ॥ य० अ० १७-३६ ॥
हे कबीर ! आप चारों ओरसे अविगत शब्द रूप हो । देहसे रहित रूप विदेह हो, विना शरीरके हो, समस्त पवित्रावतार आपके हैं, सैकड़ों बार प्रकट होते हो सबके ज्ञान रूप और परम विजयी हो यही मन्त्र सामवेदमें भी आया है, यहाँ इसका जो अर्थ है वही वहाँ भी अर्थ है ।
सुकृत नाम ।
अधज्मोऽधवादिवो बृहतो राचनादधि अया वर्धस्व,
तन्वा गिरा ममाजाता सुकृतो पृण ॥ सा. १. ८. ॥ प्र. १ ॥
१ चादर, २ पानीसे खिंचे, ३ जगता हुआ, ४ अमर, ५ चलायमान, ६ मेरा, ७ भक्तिवाला,
८ रथ, ९ न, १० दिलके भीतर, ११ रचनेवाला ।