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कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

११ अध्याय । पश्चिमकी पुस्तकें । मूसाकी पुस्तकें

सामने प्रत्यक्षमें उसका पागलपना तनिक भी जान नहीं पड़ा। पर जब उस-पर पागलपना सवार होता था, तब बड़े उपद्रव मचाया करता था। उन पागलोंमेंसे कोई आकर मेरे साथ भली भली बातें करता। प्रत्यक्षमें तनिक भी पागल मालूम नहीं होता था पर यथार्थमें वह पागल था। उन पागलोंकी सूरत देखकर उनकी अवस्थापर मुझे खेद हुआ। डॉक्टर साहब उनकी औषध करते थे। कुछ लाभ न होता था। क्योंकि, जिसपर उस बड़े वैद्यकी दया हो वही आरोग्य होकर उस घरसे बाहर निकाला जावे।

पागलोंके काम।

एक दिवस ऐसा हुआ कि, गरमियोंका दिन था। उस पागलखानेका जो जमादार था, वह अचेत सो रहा था। दिनके समय वह अकेला पड़ा था। उसका मुहँ खुला था। उसके दाँत दिखाई देते थे। उसी समय एक पागल उसी स्थानपर आ पहुँचा एवं कहने लगा कि, तू मेरे ऊपर हँसता तथा ठट्ठा करता है ! मैं तुझको मारूँगा यह कह एक कक्कड़ उस जमादारके मुहँ पर इस जोरसे मारा कि, उसी समय वह मर गया। उस पागलको तनिक भी सुध नहीं कि, मैंने बुरा काम किया अथवा भला। यदि उसको भले बुरेका ज्ञान होता तो वह ऐसा कार्य कदापि न करता। लोगोंकी जानमें तो उसने बुरा किया पर अपनी समझमें भला किया। कारण यह कि, उसने अपने बैरीको मारा जो उसपर हँसी ठट्ठा कर रहा था।

यहाँ इस उदाहरणसे मेरा तात्पर्य है कि, इस ब्रह्माण्डमें जितने जीव रहते हैं वे सब उन पागलोंके सदृश हैं जो जमादार और सिपाही हैं वे सब गुरु और पथप्रदर्शक हैं और राजकुमार वह है जो योगीसे जगदीश्वर हो गया है। वह भी उसी पागलखानेमें बंद है उस पागलपनेमें एक दूसरेको मारते मरते हैं। एक मनुष्य तो अचेत सो रहा है। दूसरा उसका दाँत निकला देखकर जानता है कि, वह उसके ऊपर ठट्ठा करता है। उसको अपना बैरी समझकर मारता तथा हत्या करता है। इसी प्रकार इस संसारके समस्त मनुष्य एक दूसरेके बैरी बन रहे हैं। एक धर्मका मनुष्य दूसरे धर्मवालोंको दुःख पहुँचाता है अपनेको भला तथा सच्चा जानता है। इस पागलखानेसे जिसको सत्ययुग बाहर निकले वे सुख पाते हैं। कबीर साहबने मुहम्मद साबको पाँच कलमे पढ़ाये। वे केवल चार कलमें संसारके निमित्त कहे बाकी एक उनके लिये कहा।

काम क्रोध लोभ मोह अहंकारादिकी कामनाओंसे यह पागलखाना भरा है। चारों अवस्था जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति तुरीया इनसे तुरीयातीत भिन्न हैं।

यह समस्त अवस्था जीवके बंधनके निमित्त ठहराई हैं । जबतक इन अवस्थाओंमें रहेगा तबतक बराबर फँसा रहेगा । कर्म, उपासना, योग और ज्ञान इत्यादि सब आज्ञानावस्थामें कर रहा है । जितने उसके कर्म धर्म हैं सब अचेतनावस्थाके कृत्य हैं । यह मनुष्य अपनी मुक्तिकी सहस्रों युक्तियाँ करता है । पर कोई सूरत छुटकारेकी दिखाई नहीं देती । मिथ्याको सत्य और सत्यको मिथ्या जान रहा है । अपने व्यर्थके विचारोंको सत्य तथा ठीक मान रहा है । कितने पीर पैगम्बर सिद्ध साधु ऐसे हुए कि, जिनको चौथे घरका समाचार तो मिला पर उसकी विद्या नहीं मिली इस कारण उन्होंने ब्रह्माण्डके भीतर रहना स्थिर किया । सांसारिक कामना पृथक् नहीं हुई । उनको विद्या प्राप्ति भी नहीं हुई । पर तीनों लोकोंके भीतरकी प्राप्ति हुई । उनको सृष्टिके उत्पन्न करनेका बल भी हो गया वे अपनेको सृष्टिका उत्पन्न करता मानने लगे और अपनी अल्पबुद्धिवश अपनेको उन्होंने परमेश्वर मान लिया पर यथार्थ भेदसे अनभिज्ञ रहे । 'अहं ब्रह्मास्मि' कहते रहे वे सब इसी जमादारकी तरह मारे गए । कारण यह कि, उनको इसका अण्डाकार घरेके भीतरही ज्ञान था उन्होंने न जाना कि, ईश्वर क्या वस्तु है और मैं क्या हूँ और जिन लोगोंने न पूर्ण विद्या पाई और ब्रह्माण्डसे पार होकर सत्यलोकको पहुँचे पूर्ण विद्यासे परिपूर्ण होगा । उनको कोई मार नहीं सकता । सहस्रों युक्तियाँ कीं पर फिर भी उनका बाल बाँका नहीं हुवा । वे न किसीके मारनेसे मरते हैं और न उत्पन्न होते हैं उनका जन्म मरण फिर कभी नहीं होता । उनका आवागमन एकबारगीही बंद हो जाता है । सिद्ध, साधु जिनमें वह विद्या नहीं वे अण्डाकार घरेके भीतर बंद हैं । वह राजकुमार जो पागलखानेमें बंद था, वह राजयोगीके समान है । वह राजकुमार जो नजरबंद था वह पागलखानेका बादशाह तो नहीं था । जैसे अन्यान्य पागल बंद थे वैसे ही वह बंद था । पर उसके मस्तकमें यह ध्यान था कि, मैं राजकुमार हूँ । भ्रान्त करके यह जीव ब्रह्मा जगत् इत्यादिका कौतुक देख रहा है । ज्ञानकी अवस्थामें न कुछ ब्रह्मा है न जगत्ही है । यह ब्रह्माण्ड और पिण्ड दोनों कुछ नहीं । उसके समस्त खेल और कौतुक और तमासे तथा जादूगरी हैं ।

अकालपुरुष एक महाप्रबल जादूगर है । जब वह भानमतीका पिटारा खोल देता है तब समस्त कौतुक प्रगट होने लगते हैं । जब वह अपना कौतुक समेट लेता है तब कुछ दिखाई नहीं देता सब शून्य हो जाता है ।