कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
हजरत आदम
आवश्यकता होती है। जब कर्मका पाश होती है तब देहके साथ सब काम और बन्दना किया करती है। बिना देहके आत्मा कुछ कर नहीं सकती। दूसरे यह लिखा हुआ है कि, मुहम्मदकी आत्माको फानूसमें रक्खा। यह बात भी असम्भव है कि, पवित्रात्मा फानूसमें कैंद रहे, आत्मा कदापि कैंद नहीं हो सकती। यह कदापि सम्भव नहीं कि, पवित्रात्मा एक नियमित समय तक अधीन और बन्धनमें पड़ी रहकर बन्दना किया करे। आत्मा सदैव स्वतंत्र और स्वाधीन है इसको केवल इसके कर्मोंकी अपवित्रताही बन्धनमें डालती है। तीसरे यह लिखा है कि, मुहम्मदके चारों ओर सब आत्मायें फेरा दिया करती थीं। तीसरी यह कि, सब रूहें रसूल खुदाकीरूहके चारों ओर सत्तर सहस्र वर्ष पर्यन्त फिरा करती थीं। कोई आवश्यक नहीं कि, अन्यान्य आत्मायें मुहम्मदकी आत्माके चारों ओर घूमें। क्योंकि, उत्पत्तिके आरम्भमें किसी आत्मामें उँचाई निचाई नहीं होती। सब समान रूपकी पवित्र तथा स्वच्छ होती हैं। चौथे यह लिखा है कि, उत्पत्तिके पहले समस्त आत्माओंने मुहम्मदकी ओर देखा। मुहम्मदकी आत्माके अङ्गकी ओर सभीोंने जब देखा तब जिसकी दृष्टि जिस अङ्गपर पड़ी उसका स्वरूप तथा स्वभाव वैसा ही हो गया। देखो ग्रन्थ कबीर भानुप्रकाशमें मैं पहले लिख चुका हूँ।
यह बातभी बेजड़ जान पड़ती है। क्योंकि, आत्माके तो कोई अङ्ग नहीं। फिर आत्मायें देखेंगे क्या? पाँचवें लिखा है कि, उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्व सब आत्माओंका भाग्य स्थिर हुआ। मुहम्मद साहबकी आत्माकी ओर देखनेसे वे कैसे भले बुरे हो सकते हैं? उनका भाग्य तो पहले ही स्थिर हो चुका है, मुहम्मदकी आत्माकी ओर देखनेसे कोई लाभ तथा हानि नहीं है। छठवेंमें लिखा है कि, मुहम्मदकी आत्मा दश भागोंपर विभक्त हुई। जिससे पृथ्वी तथा आकाशादि सब कुछ बनाया गया। यह बात भी बुद्धिमें नहीं बैठती कि, पवित्र आत्माके भाग हो सके। पवित्रात्मा बांटी नहीं जाती, उसको कोई विभक्त नहीं कर सकता। खुदा अथवा बन्दा किसीमें सामर्थ्य नहीं कि, उसको बाँटे। इस आत्मामें लम्बाई चौड़ाई गहाराई इत्यादि कुछ नहीं यह भेदी भी नहीं जा सकती। इस कारण इन प्रमाणों द्वारा यह बात भलीप्रकार सिद्ध हो चुकी कि जिसे मुसलमान मुहम्मदी तेज कहते हैं वह कर्मोंसे शुद्ध नहीं था। पूर्वजन्मके कर्म तथा भलाई बुराईसे भरा हुआ था। वह मुहम्मदी तेज सूक्ष्म शरीर था। क्योंकि, दो प्रकारके शरीर हैं। एक स्थूलशरीर तथा दूसरा सूक्ष्म शरीर है। इसीको आधिभौतिक और अन्तर्वाहक देह भी कहते हैं। यह स्थूल और लिंगदेह
दोनों कर्मोंके बन्धन हैं, उनका सदैव आवागमन हुआ करता है। आधिभौतिकसे अन्तर्वाहक और अन्तर्वाहकसे अधिभौतिक हुआ करता है। इसी प्रकार इसका सदैव आवागमन हुआ करता है। इसस अब स्पष्ट प्रमाणित हो चुका कि जिसको मुहम्मदी पवित्रात्मा समझते हैं वह अपने पूर्वजन्मोंके कर्मोंसे अशुद्ध लिंग देही थी, अनगिनती जन्मोंके कर्मोंमें बराबर बँधी चली आती थी। कर्मका बन्धन देहके बिना नहीं हो सकता। कितने जन्म पूर्वसे मुहम्मदकी आत्मा आवागमन करती चली आती है एवं भविष्यको भी करेगी इसको भ्रम तथा भूलसे मनुष्य पवित्रात्मा समझते हैं।
३१-भाग्यानुसारी वस्तु-मुहम्मद साहबने अपनी उम्मतको यह सिखलाया कि, खुदाने सबके भाग्यको पृथ्वी और आकाशकी उत्पत्तिसे पचास सहस्र वर्ष पूर्वसे ही स्थापित किया है। यह वृत्तान्त मशकात बाबुलतकदीर अबदुल्लाह, इब्र मुसल्लमकी हदीस और उनके विश्वासमें यों लिखा है :—
وَالْقَدَرُ بِأَخْلَدٍ حَتَّى مِنْ اللَّهِ تَقَالِي
अर्थात् भलाई तथा बुराई भाग्यमें खुदाकी ओरसे होती है। इसी बातम मुसल्लमसे यह हदीस है।
قَالَ كُتِبَ عَلَى الْإِنْسِ أَدَمُ نَصِيبُهُ مِنَ الزَّانِ مَدَّةُ الْأَحَالَةِ
अर्थात् लिखा गया है खुदाकी ओरसे मनुष्यका भाग। व्यभिचारमें सो वह अवश्यही करेगा। फिर इसी बाबमें अबीदरबाका कथन है :—
اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ دَرَجَةٌ إِلَى كُلِّ عَبْدٍ مِنْ خَلْقِهِ مِنْ حُسْنِهِ مِنْ الْجَلِيلِ وَعِلْمِهِ وَمَجْدِهِ وَآثَارِهِ وَرِزْقِهِ
अर्थात् वन्दाके विषयमें पाँच बातोंमें खुदा निश्चित हो चुका है। मृत्यु, कर्म, स्थिति, फिरनेका स्थान, रोजी। इस विश्वासको हृदयस्थ करनेके निमित्त इतना आग्रह है कि, तकदीरसे विमुखता करनेवालोंसे मुसलमानका व्यवहार रखना भी अनुचित है। इसी विषयमें इब्रउम्रका कथन है। फरमाया हजरतने कि, तकदीरको न माननेवाले लोग मेरी उमतके मजूसी (एक फिरका) लोग हैं यदि वे रोगी हों तो उनका हाल भी न पूछो यदि वे मर जाय तो उनके शवके साथ भी मत जाओ।