कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सुकृत, अग्रनाम उग्रनाम, कबीर शब्दके अर्थ
करने लगा कि, हे सत्यगुरु ! मुझे अपनी भक्तिमें लगाओ । सत्यगुरु उसपर दयालु हुये उसको नाम दिया । जबसे उसने सत्यगुरुका उपदेश पाया तबसे तन मन धनसे भक्ति, साधुसेवा और भजन करने लगा । उसका समस्त विवरण कबीर साहबके ग्रन्थ यज्ञसमाजमें लिखा है । दूसरे स्थानोंमें भी कहीं कहीं लिखा है । जिस समय कबीर साहबने श्वपत्त सुदर्शनका उपदेश दिया, उस समय कौरव तथा पाण्डवोंके बीच बड़ा वैर उपस्थित था । दोनों समरके निमित्त रणभूमिमें एकत्रित हुये थे । दोनों ओरसे सैन्यकी चढ़ाई हुई । बड़ा महाभारत हुआ । इसमें कौरव ससैन्य मारे गये । पाण्डव कृष्णकी सहायतासे विजयी हुये । विजय प्राप्त करनेके पीछे राजा युधिष्ठिर राज्यासन पर बैठे, राजाने एक दिवस एक बड़ाही भयानक स्वप्न देखा । जैसा कि, कबीर साहबके ग्रन्थ उग्रगीतामें लिखा है, इस भयानक स्वप्न को राजाने इस प्रकार देखा कि, समस्त कौरव जो मेरे भाई थे उनका बिना शिरका धड़ रणभूमिमें दौड़ रहा है, वे सब मुझसे अपना बदलालेनेके निमित्त तैयार हैं । राजा युधिष्ठिरने ऐसा भयानक स्वप्न देखा कि उनको बड़ा भय उत्पन्न हुआ, बड़ेही शोकित हुये कि, अब हमको भाई मारनेके महापापसे नरकमें जाना पड़ेगा । इस भयसे कातर होकर युधिष्ठिर श्रीकृष्णके पास जाकर कहने लगे कि, हे महा-राज ! मैंने ऐसा भयानक स्वप्न देखा है जिससे कि, मेरा हृदय स्थिर नहीं है । बड़ा भय उत्पन्न हो रहा है । कृष्ण बोले, हे युधिष्ठिर ! भीमादिको ! सुनो, तुमने अपने भाइयोंकी हत्या की है, जिसका महापाप तुम लोगोंको हुआ है । इतना सुन कर युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन बोले कि, हे महाराज ! हम तो महाभारत करनेपर उद्यत नहीं थे । आपनेही गीताका ज्ञान सुनाकर हमें युद्धके निमित्त प्रस्तुत कराके हमारे भाइयोंको हमसे मरवाडाला, इसमें हमारा क्या दोष है ? हम तो आपके आज्ञाकारी थे । श्रीकृष्णने कहा कि वह समय वैसाही था । युधिष्ठिरने कहा कि, हे महाराज ! अब हम क्या करें ? जिससे हमारे पाप छूटे । तब श्रीकृष्ण ने कहा कि, पहले सर्व तीर्थोंका जल मँगवाओ उससे स्नान करो । तब राजाने समस्त तीर्थोंका जल मँगवाकर उससे स्नान किया । श्रीकृष्णने कहा कि, अब तुम हाथी-दान, घोड़ादान, गऊदान, कन्यादान, सुवर्णदान, चाँदीदान, पृथ्वीदान, अन्नदान इत्यादि धर्म करो । तब राजा युधिष्ठिरने समस्त कार्य दान पुण्य इत्यादि वेदकी आज्ञानुसार तथा श्रीकृष्णजीके आदेशानुसार किया । श्रीकृष्णजीने कहा कि, यज्ञ करो, देश देशान्तरोंमें पत्र भेजकर साधुओंको बुलवाकर भोजन कराओ । राजा युधिष्ठिरने ऐसाही किया । सर्वदेशोंसे साधुओंको बुलवाया । समस्त देशों के साधु एकत्रित हुये । श्रीकृष्णजीने एक घण्टा बौधकर लटका दिया कहा कि,
यह घण्ट जब सात बार आपसे आप बजे तब तुम जानो कि, यज्ञ पूर्ण होगई । राजाने श्रीकृष्णकी आज्ञानुसार सब प्रकारके दान पुण्य करके यज्ञ आरम्भ किया । इस यज्ञमें पच्चीस करोड़ ब्राह्मण आचारी एकत्रित हुये, सात करोड़ अस्सी सहस्र ऋषि, मुनि, सिद्ध साधु (षट् दर्शनके) उपस्थित हुये । पाण्डवोंने बड़े प्रेम तथा भक्ति सहित भोजन करवाया । सब प्रकारके दान पुण्य किये पर एक बारभी घण्ट न बजा । इससे पाण्डवोंके चित्तमें बड़ा सन्देह उत्पन्न हुआ । राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित कृष्णजीके पास जाकर पूछने लगे कि, हे महाराज ! हम लोगोंने तो आपकी आज्ञानुसार सब प्रकारके दान पुण्य किये, बत्तीस करोड़ अस्सी सहस्र साधु ब्राह्मण भोजन कर चुके, सबके ऊपर महाराजा आपने स्वयम् भोजन किया, अब इससे बढ़कर क्या रहा ? पर फिरभी आकाशी घण्ट एक बार भी नहीं बजा । इतनी बात सुनकर भगवान् बोले कि, हमारा सर्व परिश्रम व्यर्थ हुआ, धनका सर्व व्यय निष्फल हुआ, क्या उपाय करे कि, घण्ट बजे ? भगवानने, कहा कि, हे युधिष्ठिर ! तुम ध्यानसे सुनो । जब साधुओंको भोजन करा रहे थे, तब मैं अपनी ज्ञानचक्षुद्वारा उन सबोंको भली भाँति देख रहा था उनमें कोई साधु नहीं दिखाई दिया । उनमें साधु तो जहाँ कोई भी मनुष्य नहीं रहा था, सबके सब ढोंगर ढोर, कीड़े, मकोड़े, पशु, पक्षी इत्यादि बैठे भोजन कर रहे थे । हे युधिष्ठिर ! तुम्हारे यज्ञमें कोई भी साधु नहीं था । कोई सत्यगुरुका अंश तुम्हारे यज्ञमें भोजन करनेके निमित्त नहीं आया था । जबतक सत्यगुरुका अंश न आवे तुम्हारे यज्ञमें भोजन न करे तबतक आकाशी घण्ट नहीं बजेगा, तुम्हारी यज्ञ पूरी नहीं होगी । युधिष्ठिरने कहा कि, हे महाराज ! मैंने देश देशान्तरोंमें पत्र भेजकर, दुँदुवाकर बड़े बड़े सिद्ध साधु बुलवाये । बड़े बड़े तपस्वी आचारीगण आये, इनमें सत्यगुरुका अंश कोई नहीं था क्या ? हे महाराज ! ये सब तपस्वी लोग किसके अंश हैं ? वे सत्यगुरुके अंश किस देशमें रहते हैं ? कौन शास्त्र पढ़ते हैं ? किसकी भक्ति करते हैं ? यहाँ पर कबीर साहब कहते हैं कि, यह सब जो भेष बाना बनाकर रहते हैं, उनमें सहस्रों प्रकारके लोग हैं, उनमें जो मांस मछली इत्यादि खाते, मदिरा पीते, परस्त्रीगमन करते हैं, वे सब चाण्डाल हैं । वे नरकको जावेंगे । भगवा वस्त्र पहनकर स्त्रीगमन करते हैं उनकी ऐसी दशा होवेगी कि—“भगवा बसता बिन्द प्रकासा । सत्तर जन्म श्वान घर वासा ॥” जितने भी षट्दर्शन भेषके लोग एवं सर्व ब्राह्मण आदि हैं उनमें मनुष्यका लेश भी नहीं है । जो सत्यगुरुका अंश है वही मनुष्य है । श्री-कृष्णजी युधिष्ठिरसे कहते हैं कि, हे युधिष्ठिर ! तुम सत्यगुरुका अंश जो श्वपच
सुदर्शन है, काशी नगरीमें रहता है उसको ले आओ, जब वह आकर तुम्हारे गृहमें भोजन करेगा, उस समय तुम्हारी यज्ञ पूरी होगी सात बार आकाशी घण्ट बजेगा । बिना सुदर्शनके भोजन किये आसमानी घण्ट कदापि न बजेगा न यज्ञही पूरी होगी । तब युधिष्ठिरने कहा कि, हे महाराज ! भङ्गीको ऐसी बड़ाई कैसे मिली ? ऐसे बड़े बड़े महात्मा एकत्रित हुये, इनमें कोई इस योग्य नहीं ? यह क्या बात है ? श्रीकृष्णने कहा कि, हे युधिष्ठिर ! मेरा कहना मान ले श्वपच सुदर्शनको यहाँ लेआओ । पीछे भीमसेनको श्वपच सुदर्शनके बुलानेके लिये भेज दिया ।
भीमसेन सुदर्शनजीको बुलाने चले । काशी नगरीमें जा पहुँचे । दृढ़ते दृढ़ते श्वपच सुदर्शनका मकान पाया । जाकर सुदर्शन जीसे ! कृष्ण तथा युधिष्ठिरका समाचार पहुँचाया । भीमने कहा कि, हे सुदर्शनजी ! आपको कृष्ण तथा युधिष्ठिरने बुलाया है । आप मेरे साथ चलिये । हमारे यज्ञमें भोजन कीजिये, आपके भोजन करनेसे यदि घण्ट बज जायगा तो हमारी यज्ञ पूर्ण हो जायगी । राजा युधिष्ठिर आपपर बड़े प्रसन्न होंगे, एवं बड़ा अनुग्रह करेंगे । ऐसा सुनकर सुदर्शनजीने उत्तर दिया कि, हे भीमसेन ! तुम राजाके पासजाकर कहो कि, हम राजाके घरका भोजन न करेंगे ।
चौ०—भीम कहो राजासे जाई । राजा घर भोजन नहीं पाई ।
राजा वेश्या^१^ जात शिका^२^री । महा अक^३^र्मी विषय विक^४^ारी ॥
सतसठ दूत^५^ कर्म इन सङ्ग^६^। भोजन करत सत्य हो भङ्गा^७^ ।
राजा वेश्या छु^८^चे न कोई । इनके छुए^९^ पाप बड़ होई ॥
राजाद्वार^१०^ भोजन जो पावे । अरु वेश्या^११^ही छुये नरक महाँ जावे ॥
राजा धीमर वेश्यापा^१२^सी । इनके छुये यमपुर जासी^१३^ ॥
साखी—चार^१४^ जातिके दर्शन, दूरते कीजे जान^१५^ ।
इनके घर भोजन किये, पडे नरककी खान^१६^ ॥
इतनी बातके सुनतेही भीमसेन तो जल गये । मनमें सोचने लगे कि, यह नीच मुझको ऐसी बात कहता है । यदि मैं इसको एक गदा मारूँ तो यह पातालको चला जावे । जब भीमसेनने अपने मनमें यह विचार किया, तब श्वपच सुदर्शनजी महाराजने भीमसेनके अन्तःकरणकी बातोंको जानकर
१ करेंगे । २ रंठी । ३ जीर्वाहसक । ४ बुरे कर्म करनेवाले । ५ विषयी । ६ चुगलखोर । ७ सात । ८ नष्ट । ९ स्पर्श । १० स्पर्श किये । ११ राजेके घर । १२ वेश्याके । १३ एक, प्रकारके जीवहत्यारे । १४ जायेगा । १५ राजा, १४ धीमर, वेश्या और पाशी । १६ मत । १७ कुण्ड ।
कहा कि, हे राजाजी ! मैं अपने मकानके भीतरसे हो आता हूँ, तब आपके साथ चलूंगा, तबतक आप मेरी सुमिरिनी लेकर चले। शीघ्रही मैं आकर आपके साथ हो लूंगा। यह कहकर सुदर्शनजी तो भीतर चले गये। भीमसेन उनकी सुमिरिनी उठाने लगे तो न उठी। बड़ा बल लगाया पर उस जगह न छोड़ी; लज्जित होकर भीमसेन उसी जगह खड़े रहे। इतनेमें सुदर्शनजी भीतरसे बाहर आये। देखा कि, भीमजी लज्जित खड़े हैं। तब कहा कि, हे राजाजी ! मैंने आपसे कहा था कि, मेरी सुमिरिनी लेकर आप चलो पर आप खड़े रह गये, क्या कारण है। भीमसेनने उत्तर दिया कि, मुझसे सुमिरिनी नहीं उठी,। सुदर्शनजीने कहा कि, जब मेरी सुमिरिनी आपसे न उठी तो मैं आपके गदा मारनेसे पातालको क्यों कर चला जाता ? आप अब यहाँसे चले जाओ, मैं आपके घर भोजन करने न जाऊँगा। क्योंकि, तुमने भाइयों तथा संबंधियोंको मारकर गिरा दिया, यह महापाप किया है। यह बात सुनकर भीमसेन नितान्तही क्रुद्ध हुए। झुंझलाकर राजा युधिष्ठिरके पास लौट आये। श्वपच सुदर्शनका सर्व हाल कहकर भीमने कहा कि, वह तो बड़ा घमण्डी है। कड़ीबातें कहता हुआ कहता है कि, मैं राजा तथा कञ्जरीके मकानपर भोजन नहीं करता, उसकी सूरत देखनेको मेरा मन नहीं चाहता। हे महाराज ! मैंने आपका तथा श्रीकृष्ण भगवान्का भय किया नहीं तो बिना मारे न रहता। जो कड़ी बातें उसने कही वे मेरे सहन करने योग्य नहीं थीं। इतना सुन महाराज युधिष्ठिर भीम आदिको साथ ले श्रीकृष्णके समीप गये। जाकर कहा कि, हे महाराज ! आपने व्यर्थही ऐसे शूद्रके समीप भेजा। भला इतने सिद्ध, साधु, ऋषि, मुनि, एकत्रित हुए, उनमें सुदर्शन भङ्गीहीको आपने श्रेष्ठ क्यों ठहराया ? उसमें कौनसी बड़ाई है ? वह कैसे सबसे अच्छा है ? श्रीकृष्णचन्द्र बोले कि, हे युधिष्ठिर ! तुम श्वपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता तथा बड़ाईसे अनभिज्ञ हो; पर मैं भली भाँति जानता हूँ; बिना श्वपच सुदर्शनके भोजन करवाये तुम्हारी यज्ञ पूरी न होगी, न घंटाही बजेगा। भीमसेन बोले कि, हे कृष्णजी ! मैं इस बातका विश्वास न करूँगा, जबतक कि, आँखोंसे न देख लूँ। सात करोड़ अस्सी सहस्र ऋषि मुनियोंमें श्वपच सुदर्शन कैसे श्रेष्ठ ठहरा ? यह बात सुनकर कृष्णजी कहने लगे, हे भीम ! मैं तुम लोगोंको अवश्यही श्वपच सुदर्शनकी श्रेष्ठता दिखाऊँगा। जब तुम स्वच्छस्नुसे देखलेना तब विश्वास करना। हे युधिष्ठिर ! तुम स्वयम् सुदर्शनजीके बुलानेके निमित्त जाओ। अत्यन्त नम्रता पूर्वक मिलना। बड़ी मर्यादा तथा बड़े सम्मानपूर्वक श्रीमान् महाराज सुदर्शनजीको बुलालाना। सुदर्शनजी महा-
राज पधारनेसे तुम्हारी यज्ञ पूरी होगी । तुम अपनी दृष्टिसे सुदर्शनजीकी श्रेष्ठता देखोगे तो जानोगे कि, करोड़ों साधुओंमें तथा उनमें क्या विभिन्नता है ? क्या गुण तथा महत्त्व है ? श्रीकृष्णजीकी आज्ञानुसार राजा युधिष्ठिर स्वयम् सुदर्शनजीको बुलाने चले, बनारसमें पहुँच उससे भेंट करके निवेदन किया कि, हे भक्तजी ! आप दया करके मेरे साथ चलो, बिना आपके मेरी यज्ञ पूरी नहीं होती । आप कृष्णचन्द्रके बड़े भक्त हो । महाराज कृष्णचन्द्र आपके हृदयमें विराजमान हैं । भगवान्का मन आपहीसे प्रसन्न है । युधिष्ठिरकी ऐसी नम्रता तथा गिड़गिड़ाहटको देखकर श्वपच सुदर्शनजी दयालु होकर कहने लगे कि, हे युधिष्ठिर ! तुम्हारी नम्रतासे मैं नितान्तही आह्लादित हूँ, तुम्हारे साथ मैं चलूंगा । कारण यह कि, तुम प्रेमी भक्त हो । हे युधिष्ठिर ! तुम निश्चय जानो कि हम कृष्णके भक्त हैं हमारा सत्यगुरु सत्यलोकवासी है । हम उसके अंश हैं — कृष्ण उसीके अवतार हैं । हे युधिष्ठिर ! तुम कृष्णका विश्वास सदा करना क्योंकि, वो भक्तवत्सल है । स्वयम् कृष्ण ने तो तुम्हारे यज्ञमें भोजन किया फिर घंटा क्यों न बजा ? यदि मैं कृष्णका न भक्त होता तो वो मुझको बुलानेकी क्या आवश्यकता समझते, जब स्वयम् श्रीकृष्णके भोजनसे घण्टा नहीं बजा पर कृष्णके भक्तोंके भोजनसे घण्टा बज सकता है । हे युधिष्ठिर ! तुम्हारा प्रेम तथा तुम्हारी भक्ति देखकर मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ, परमार्थके निमित्त मुझको जाना आवश्यक है । यह कहकर सुदर्शनजी युधिष्ठिरके आगे हुये और युधिष्ठिर महाराज उनके पीछे होलिए । इसी प्रकार सुदर्शनको लिये महाराज युधिष्ठिर अपने मकान पर पहुँचे ।
जब श्वपच सुदर्शनजी राजा युधिष्ठिरके मकानमें प्रविष्ट हुये, राजाने रानी द्रौपदीको आज्ञा दी कि, स्वादिष्ट भोजन बनाओ, सन्मान तथा प्रतिष्ठा-पूर्वक सन्तको भोजन कराओ । उसी समय द्रौपदीने भोजन बनानेका प्रबंध किया । भौति भौतिके स्वादिष्ट भोजन बनाकर प्रस्तुत किये । अत्यंत मर्यादाके साथ सुदर्शनजीको आसनासीन कर मेवें तथा पकवानके थाल सामने धर दिये । सुदर्शनजीने जो सम्यक् प्रकारके स्वादोंसे विरक्त थे, सब खट्टा, मीठा आदि भोजन एक साथ मिला दिया । क्योंकि, आपको तो किसी प्रकारके स्वादकी कामनाही नहीं थी । सबको मिलाकर खाने लगे । तीन ग्रास खा चुके थे कि, रानी द्रौपदीके मनमें ऐसा ध्यान हुआ कि, फिर तो सुदर्शन नीच अज्ञानी है, भोजनके स्वादको वह क्या जाने ? मैंने कितनेही प्रकारके भोजन बनाये थे सो सब एकसाथ मिलाकर खाते हैं । नमक मिष्ठान आदिका स्वाद तनिक