कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
शाहंजाह इबराहीम अहम श्रेष्ठ मन्शूर और शिवली
की और कर रहे हैं कि, मनुष्योंको सत्यपन्थसे भटका दें इस कारण कबीर साहबने पहलेहीसे प्रबंध कर दिया है कि कुछ गाड़िया पुस्तकोंकी दिल्ली नगरमें गड़वादी हैं जो नियत समय पर निकलेंगी वे शुद्ध तथा निर्दोष हैं । वही प्रचलित होगी जिनमें कुछभी दोष न होगा । उपरोक्त पुस्तकें सर्वथाही निर्दोष और अनुपम हैं । उन ग्रन्थोंके पढ़ने सुननेसे यमके कपट निरर्थक हो जावेंगे । केवल चारसौ वर्षोंने कबीर साहबकी वाणीकी यह दशा होने लगी तो ऐसी अवस्थामें इतिहास तथा अन्यान्य पुस्तकोंकी क्या गणना है ! जो अत्यन्त प्राचीन पुस्तकें थीं सब दूषित हो गईं, वे तनिक भी शुद्ध नहीं रहیں । सब ग्रन्थ कट कुट हो गये हैं पर स्वसंवेद अशुद्ध नहीं होता क्योंकि, सब औपधर्म्यके ग्रंथोंके श्रोता वक्ता मर गये । परन्तु स्वंवेदके श्रोता वक्ता कदापि नहीं मरते, सदैव जीवित रहते हैं । स्वसंवेद जब मृत्युके समीप पहुँचता है तो फिर उसमें जी डाला जाता है जिससे हरा भरा हो जाता है । स्वसंवेदकी शिक्षा उत्पत्ति कालसे लेकर आजतक बराबर चली आती है । परन्तु उस पर चलनेवाले थोड़े होते हैं । उसका कारण ये है कि, १-कालपुरुष मुंह २ से बोलता हुआ संसारको भटकाता है जीवोंकी बुद्धिको नष्ट करता हुआ अन्तःकरणको अशुद्ध कर देता है । २-यह जीव पशुवत् कर्मकी तृष्णाको नहीं छोड़ता है, मांस खाता है, निषेध कर्मोंको करता है । उसमें ऐसा लुब्ध हो जाता है कि, उनको छोड़ना उसे अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है । ३-इस संसारकी मान बड़ाई तथा लज्जा आदि भी इस जीवको नहीं छोड़ते । ४-प्रत्येक पुरुषकी बुद्धिपर बैठकर काल पुरुष अपनी प्रभुताई कर रहा है । ५-कबीर साहबकी दयादृष्टि हो पर उसके गुरुकी दया न हो तो भी कार्य्य नहीं चलता दोनोंकी ही दयादृष्टि होनी चाहिये । जिस समय गुरु दया करते हैं तो कबीर साहबकी उस पर पूरी दयादृष्टि हो जाती है फिर उसके उद्धार होनेमें कोई भी कसर नहीं रह जाती । सत्ययुग द्वापर त्रेता और कलियुगके हंसोंके लिये युगानुरूप सत्यपुरुषका शास्त्र रहा है, जिससे सहजही में जीव सत्यपुरुषके उपदेशोंको समझले । जिस किसीने इन चारों युगोंमें सत्यपुरुषका कहना न माना उसे दुखसागरमें मग्न होना पड़ा पर जिसने कथन माना उसका उद्धार हो गया कालका उनपर कुछ भी प्रभाव न चला । सत्यपुरुषका शास्त्र युगानुसारी भाषामें रहता है कलियुग के जीवोंको जैसा चाहिये उसी भाषामें सत्यपुरुषका शास्त्र मौजूद है इसीसे अग्नित जीवोंका उद्धार हो गया है इबराहीम अद्वम आदिको इसी युगकी भाषामें उपदेश मिला था ।
भिन्न पन्थोंके संस्थापक शिष्य गण ।
नानक शाह साहब
नानकशाह साहब कबीर साहबके खास चेलोंमें थे। उनको सत्य गुरुने पञ्जाब प्रान्तकी गुरुवाई प्रदान की थी, उसका जन्म मौजा तिलोंडी जिला लाहौर (पञ्जाबदेशमें) हुआ था। सम्बत् १५२६ विक्रमीमें कालू नामक खत्रीके गृहमें उनका जन्म हुआ। लड़कपनसेही श्रेष्ठताके चिन्ह परिलक्षित थे। जब उनका वयस सोलह वर्षका हुआ तब माताने एक दिवस बीस रुपये देकर कहा कि, इन रुपयोंसे उत्तम सौदा कर लाओ। नानक साहब उन रुपयोंको लेकर चले, आगे एक मण्डली साधुओंकी मिली इसको देखकर इनका हृदय स्वच्छ हुआ सोचा कि, साधुओंको खिलानेसे बहुत अच्छा सौदा हो सकता है वह बीस रुपया जो पासमें था उससे भण्डारा करके उस स्थानपर सब साधुओंको खिला घरको चले गये। फिर जब नानक साहबकी वयस (आयु) अठ्ठाईस वर्षकी हुई तब सम्बत् १५५३ विक्रमीमें उन्होंने बेईनदीके भीतर गोता मारा। तब उस समय आपको जिन्दा बाबा मिले, दूध उपदेश देकर अपना शब्द भली भाँति दृढ़ाया नदीके बाहर निकले तो पञ्जाब देशमें उनकी महिमा फैली। उनके शिष्योंकी लाम लग गई।
नानकशाह साहब तो अपने जीवन भर गुरुके आज्ञाकारी ही होकर सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश किया करते थे। पर नानकशाहके पीछे इस पन्थके लोग कबीर गुरुसे फिर गये इस कारण सत्यपुरुषकी भक्ति और स्वसंवेदकी शिक्षा छूट गई। काल पुरुषकी भक्तिको और लोग झुक पड़े। गुरुके विरुद्ध होनेपर अनेक काल तक उनके पास कोई ग्रंथ नहीं रहा। गुरु अर्जुनजीने सन्तोंकी बाणी एकत्रित करके एक ग्रंथ प्रस्तुत किया जो अबतक उनके पास उपस्थित है। अब वे लोग कबीर साहबको तो अपना गुरु स्वीकार नहीं करते, वरन् अन्यान्य भक्तोंके समान एक भक्त जानते हैं। इस कारण अनेक प्रमाणोंको एकत्रित करता हूँ कि, नानक देवके कबीर साहिबही गुरु थे।
इतिहासिक प्रमाण १—एच. एम. एलफिन्स्टन साहब जो अंग्रेजी इतिहास लिखनेवालोंमें नामी और बहुत बड़े इतिहास लेखक हो गये हैं वह अपने भारतके इतिहासमें इस प्रकार लिखते हुए नानकशाहके विषयमें साक्षी देते हैं कि नानक शाह कबीर साहबके शिष्योंमेंसे एक शिष्य थे। परन्तु उन्होंने अपने लेखमें कोई पृथक् वृत्तान्त कबीर साहबके विषयमें नहीं लिखा है, इसका
कारण यह है कि, उसके अनुगामियोंमेंसे किसीने भारतके देशी इतिहासमें कोई भाग नहीं लिखा ।
एलफिन्स्टन साहबके भारत इतिहासके १२ वें जिल्दके प्रथम भागके ६७८ पृष्ठमें देखो—वह सिक्खोंके विषयमें इस प्रकार लिखते हैं कि, इस धर्मके आचार्य नानक पन्द्रहवीं शताब्दीके अन्तमें प्रगट हुये थे । वे कबीर साहबके शिष्य थे । अतएव वह एक प्रकारके हिन्दू एक ईश्वरवादी थे । परन्तु उनके धर्मका मुख्य अभिप्राय सबको एक धर्ममें मिलाकर भेदभाव मिटानेका था ।
द्वितीय प्रमाण २—भारतके इतिहासका संक्षेप, जिसको कौलास चन्द्र मच्छना बी. ए. और देवेन्द्रनाथ राय बी. ए. आफ एल. एम. एस. कालेज भवानी-पुरने लिखा है । वह इस प्रकार है, देखो भारतके इतिहासके एकसौ पाँच पृष्ठ में ।
रामानन्दके बारह शिष्योंमें कबीर साहब बड़ेही सुप्रख्यात हुये । उन्होंने बीजकका निर्माण किया । पण्डितोंके लिये शास्त्र तथा वेदके आशयको गूढ़ बताया । नानक साहबने सर्व धार्मिक युक्तियाँ कबीर साहबसे सीखी थीं ।
फिर देखो उसी पुस्तकके एकसौ आठ पृष्ठमें नानकशाहने सिक्खधर्म, पन्द्रहवीं शताब्दीमें स्थापित किया । उन्होंने सर्व धार्मिक रीतियाँ कबीर साहब से प्राप्त कीं ।
तृतीय प्रमाण ३—एच. एच. विलसन साहब अपनी दरसनामक किताबमें तीसरे प्रकरण पृष्ठ ६९ में हिन्दुओंके धर्मके विषयमें लिखते हुए कबीरपंथियोंके विषयमें लिखते हैं कि, कबीर साहबकी शिक्षाका प्रभाव उनके मुख्य २ शिष्योंपर बहुत पड़ा । वो उनकी अनुपस्थितिमें उससे भी बढ़कर सिद्ध हुआ । क्योंकि सर्व पन्थोंको इस पन्थकी शाखायें कह सकते हैं । गुरु नानक, साहब जो हिन्दुओं में एक विशेष धर्मके आचार्य हुये हैं, प्रायः अपने धार्मिक ध्यानमें कबीर साहबका ही प्रायः अनुकरण किया है ।
चतुर्थ प्रमाण ४—ग्रन्थ लेखकके पहिले लिखेका व्याख्यान करनेके समय मालकाम साहबके लेखसे निम्नलिखित अनुवाद किया है । “प्रख्यात तथा सुप्रसिद्ध कबीरके विषयका नानकने अनुकरण किया है । कबीर पंथी कहते हैं, कि, नानकने कई सहस्र साखिया कबीर साहबके पुस्तकोंसे ली हैं ।” मालकाम साहबकी पुस्तक भारतके इतिहासको देखो । वहां यह सब मिलेगा ।
पंचम प्रमाण ५—मोनियर विलियम साहब एक सुप्रसिद्ध अंग्रेज जिन्होंने स्वयम् भारतवर्षका भ्रमण किया है जो ब्लेयल कालेज आक्स फोर्डमें प्रोफेसर थे, अपनी पुस्तक भारतके धार्मिक ध्यान तथा आयुके छठे प्रकरणके १५८ पृष्ठमें लिखते हैं जो इस प्रकार आरम्भ होता है ।