कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
शवपत्र सुदर्शन पांडवोंका सुदर्शनकी श्रेष्ठता दिखाना
कराऊँ । सत्यगुरु तो सर्व त्यागी हैं मुवर्ण तथा चाँदी आदिसे कोई सम्बन्ध नहीं रखते, न किसी वस्तुकी उनको इच्छा है ? तब राजा और रानी दोनों नङ्गे पाव होकर घासका पोला अपने सिरपर धरकर एक अगौछी अपने २ गलमें डाल, आकर सत्यगुरुके चरणोंपर गिर हाथ बांधकर निवेदन करने लगे कि, आप मेरे अपराधको क्षमा करो । कबीर साहबने राजा रानीका बड़ा भारी सम्मान करके कहा कि, हे राजा ! साधुओंके खेल तथा कौतुक जाने नहीं जा सकते, सांसारिक के विचारमें आ नहीं सकते । आप अत्यन्त नम्रतापूर्वक साधु तथा गुरुकी सेवा किया करो । यह कलिकाल महा कठिन समय है, इसमें लोग साधु तथा गुरुकी सेवा नहीं कर सकते । आप किसी बातका ध्यान न करो, यही नहीं सत्यगुरुने राजाके सब अपराध क्षमा कर दिये, राजा सकुटुम्ब कबीर साहबका सेवक बन गया । राजा तथा रानी बिदा होगये तब ब्राह्मण काजी तथा मुल्ला आदि झुके, कबीर साहबको दण्डवत् प्रणाम करके धन्य कबीर ! धन्य कबीर !! कहते हुए बड़ी नम्रताके साथ उनसे मिलने लगे । उस समय जितने कबीर साहबके सेवक शिष्य थे जिनका विश्वास सद्गुरुको कञ्जरीके साथ देखकर ठीला हो गया था, उनका विश्वास पुनः स्थिर होगया, वे सत्यगुरुकी प्रशंसा तथा गुणानुवाद करने लगे, अपनी मूर्खता तथा अदूरदर्शितापर खेद और दुःख करने लगे, अपने बुरे सन्देह करने पर पश्चात्ताप करने लगे बड़ेही लज्जित हुए ।
वह कौतुक जो होलीके दिवस काशीमें कबीर साहबने किया आज दिवस-पर्यन्त होलीके दिवसोंमें पूर्वके मनुष्य हँसी ठठठा करते हुए कबीर बोलते हैं । कञ्जरी सत्यगुरुकी कृपासे हंस कबीरके साथ मिलकर परम धामको पहुँच गई, जिसका सत्यगुरु हाथ पकड़े फिर उसका बुरा नहीं हो सकता ।
भक्त मीराबाई ।
मीराबाईका यह वृत्तात्त भगतमालमें लिखा है कि, मारवाड़ देशके राजाकी पुत्री थी, मीराकी माता ठाकुर पूजन किया करती थी एक दिवस किसी की बरात आई तो दुल्हा देखनेको सब चले, मीराकी माता अटारीपर चढ़ी देख रही थी । छोटी बालिका मीरा भी अपनी माताके साथ दुल्हा देखनेको गई । मीराने अपनी मातासे पूछा कि, हे माता ! मेरा दुल्हा कहाँ है ? तब मीराकी माँने हँसकर कहा कि, तेरा दुल्हा तो गिरधरलाल है । उसी दिनसे मीराको गिरधरलालसे बड़ा प्रेम हुआ । गिरधरलालकी मूर्तिको एक पेटारीमें रखकर बड़े चावसे पूजने लगी । गिरधरलालमें पूर्ण आसक्त होगई । मीराका उदयपुरके राना के साथ विवाह हुआ । विवाहके पीछे दुरागवन (गर्वने) में अपने घर (श्वशुरा-
लय) गई। मीराका पूर्ण प्रेम तो गिरधरलालसे था ही इस कारण साधुओंकी सेवा करना तथा गाना नाचना यही उसका मुख्य काम था। मीराकी यह दशा देखकर राना उदयपुरने बहुत मना किया कि, मीरा ! तू मेरी पत्नी होकर साधुओं में न जायाकर, इसमें मेरी नाम हँसाई होती है। यद्यपि रानाजीने बहुतेरा मना किया पर मीराने एक भी नहीं मानी साधुओंके पास आने जानेसे नहीं रुकी। अन्तमें रानाने मीराकी भक्तिसे घबराकर विषका प्याला भेजा एवं कहलाया कि, यह ठाकुरका चरणामृत है, तू पी तेरा कल्याण होजायगा। मीरा उसे प्रसन्नतापूर्वक * पीगई, वह (विष) अमृत होगया, अब तो मीरा और भी अधिक प्रेम और उत्साहसे नाचने गाने लगी, भगवान्की भक्ति करने लगी। फिर रानाने साँप भेजा वह साँप जब मीराके समीप पहुँचा उसने गलेमें डाल दिया जिससे वह फूलकी माला बनगया। फिर रानाने शेर छोड़ा वह भी मीराके सामने माथा टेके कर चला गया। मीराने देखा कि, अब मुझको रानाके घर रहना उचित नहीं है तब तीर्थके निमित्त निकल गई। मीराके जानेके पीछे उदयपुरके देशमें काल पड़ गया, लोग भूखसे मरने लगे, रानाने मीराको बुलाना चाहा, अपने कारबारियोंको भेजा कि, मीराको कह सुनकर ले आवें। कारबारियोंने बहुत कुछ कहा पर मीराने एकभी न सुना और कहा कि, अब मुझे भगवान् गिरधर लालके चरणोंको छोड़कर कहीं भी जाना नहीं चाहिये।
इस मीराने भक्ति तथा प्रेमका कर्तव्य पूर्णतया पालन किया। इसलिये उसको कबीर गुरु मिले। वह सत्यगुरुका हंस होकर जब परमधामको चली उस समय वह सशरीर विलोपित हो गई। किसीको तनिक भी सुधि नहीं मिली कि, मीरा कहाँ चली गई। श्रीकृष्णकी उपासना करनेमें जो परम प्रेम प्रगट किया तो उसको सत्यगुरु मिल गये और उसका काम पूरा हो गया। जिसको पति माना था अपने शरीरको भी उसीमें मिला दिया।
- मीराने विषका प्याला पीते समय जो भजन गाया था, पाठकगणके विनोदके लिये यहाँ लिखता हूँ—रानाजी जहर दियो मैं जानी ॥ जिन हरि मेरो नाम निबेज्यो; छन्यो दूध अरु पानी। जब लगि कंचन कसियत नाही होत न बाहिर वानी ॥ अपने कुलको परदा करियो, हम अवला वीरानी ॥ श्वपच भक्त धारौं तन मन, जैहों हौं हरि हाथ बिकानी ॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर, सन्त चरण लपटानी ॥ १ ॥ हमारे मन राधा श्याम वसी ॥ कोई कहे मीरा भई बावरी, कोई कहे कुलनासी ॥ खोलिके घूँघट पारिकैं गाती, हरि ढिग नाचत गली ॥ बुन्दावनकी कुंजगलिनमें भाल, तिलक उर लसी ॥ विषको प्याला रानाजी भेज्यो, पीवत मीरा हँसी ॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर, भक्तिमार्गमें फँसी ॥
सोरठा—मीरा यह पद गाय, विष प्याला पी हरि भज्यो।
गयो सो गरल विहाब, नशा न कीन्हयो नैकहू ॥
शाह सिकन्दर लोदीकी दीक्षा ।
शाहसिकन्दरने कबीर साहबके अनेक कौतुक देखे। जब उसको निश्चय होगया कि, यह कबीर साहब पृथ्वी तथा आकाशके बीच सच्चे गुरु हैं दूसरा कोई नहीं, तब वह सत्यगुरुकी शरण लेकर संसार सागरके पार उतर गया । शाह सिकन्दर तो पहलेही कौतुक पर विश्वास कर चुका था। फिर उसने इतने कौतुक देखे तब उसका विश्वास और भी दृढ़ हो गया । उसको भली भाँति मालूम हो चुका कि, कबीरही स्वयम् सत्यपुरुष परमात्मा हैं । सिवा कबीरके दूसरा कोई नहीं है इस बादशाहका विश्वास जैसा सच्चा हुआ वैसाही उसको फल मिला अर्थात् सत्यगुरु का प्यारा भक्त हुआ सच्चे धामका अधिकारी हुवा । कमाल बोधमें लिखा हुवा है कि —
रमैनी — शाह सिकन्दर शरना^१^ लीना । चौकाकर^२^ परवाना^३^ दीना ॥
भय मुरीद^४^ कबीरके आई । ताते सद्गुरु नाम फिराई ॥
शाह सिकन्दर दिल्ली आये । मुल्ला काजी वचन सुनाये ॥
शेख तक्री है शाहको पीरा । सब मिली कियो उन्हींसे जोरा^५^ ॥
ऐसा इल्म शाहको दीना । मुरीद तुम्हारे बहका^६^ लीना ॥
चले हैं काजी शाह दबार । शाहसे पूछे ज्ञान विचारा ॥
काजी मुल्ला वचन ।
कहो शाह तुम कह मत^७^ पाई । कैसे अपना इसिम फिराई ॥
चार बिहिश्त^८^ अल्ला फ़रमाये । उनको छोड़ आगे कहँ जावे ॥
दीनका मारग अहदसे^९^ पाई । सो तुम कैसे दीन मिटाई ।
दीन दुनीका^१०^ तुम सरदारू । कैसे भई अकिल तुमारू^११^ ॥
काफ़िरके^१२^ मुरीद तुम होई । दीनके घर कहँ टट परोई ॥
शाह सिकन्दर वचन ।
शाह कहे काजी और मुलाना । झूठी दीन दुनी फरमाना^१३^ ॥
दीनका जो घर उरे ले आई । बिन जाने तुम असल बताई ॥
किन वैकुण्ठ बिहिश्त बनाई । वेद कितेब^१४^ कहाँ ते आई ॥
कहो खुदाय कौन घर बासा । तन^१५^ छूटे कहँ होये निवासा ॥
साखी — सुने सुने तुम सब कहो, नहिं देखा दीदार^१६^ ।
पीर औलिया देखि सब, सद्गुरु^१७^ खेल अपार^१८^ ॥
१ शरण, २ चौकापूर्वकदीक्षा देकर, ३ सत्यलोकका ओडार, ४ सेवक, ५ आग्रह, ६ भुला, ७ बुद्धि, ८ स्वर्ग । ९ शर्त, १० संसार, ११ तुम्हारी, १२ ईश्वर, न माननेवाले, १३ कथन, १४ किताब, १५ शरीर, १६ दर्शन, १७ कबीर, १८ अनगिनत,
रमैनी – जमुना तीर पे आसन मारी । बैठे पीर मुरीद^१^ दोऊ पारी ॥
काजी मुल्ला लियउ बुलाई । शेख तक्की तहवां चलि आई ॥
शेख कहै तुम जुल्म जो कीन्हा । फेर मुरीद मेरा क्यों लीन्हा ॥
शेख कहै मुने मतिधीरा । जुल्म कीन्ह तुम दास कबीरा ॥
काजी कह तुम क्या मतपावा । शाहको सदा^२^ कौन सिखलावा ॥
निराकार जो कितेब बखाना । नूर^३^ जोति बाको सब जाना ॥
यही है खुद कि, और निनारा^४^ । ताको हमसे कहो विचारा ॥
साखी – शाहको किमि^५^ समझायो, सबहि दीन सरदार ॥
दोनों राह^६^ कैसे मिटे, यह कुछ बात अपार ॥
कबीर बचन ।
रमैनी – निरंकार है खुदका कीना । इनको तीन लोक जो दीना ॥
इन्हों रचे हैं वेद कितेबा । बिहिश्त वैकुण्ठ इन्हींको सेवा ॥
हमतो इल्म^७^ फ़कीरी बालें । समरथ^८^ नाम लिये जग डोलें ॥
साखी – निराकार निरगुण कहि, राजि रहा संसार ।
पीर पैगम्बर यहाँ रहे, समरथ नूर निनार ॥
कलमा कहूँ तो कल पड़े, विन कलमे कल नांहि ।
जो कलमेसे कलभये, सो कलमा तिस मांहि ॥
कमालजी ।
कबीर साहिबने कमालजीसे कहा कि, हे कमाल ! तुम पश्चिम देशके मनुष्योंको शिक्षा दो । तब कमालजी काशीसे चलकर अहमदाबाद पहुंचे । उस समय अहमदाबादका नवाब मुहम्मद शाहवली बादशाह था । इसके दीवानका नाम दरिया खान था । इसे कमालजीने सत्यपुरुषकी भक्तिमें लगाकर अपना शिष्य कर लिया, कमालजीका शिष्य होगया । ये यहीं निवास करने लगे । ये दिव्य वक्तव्य दिया करते थे, जिन्हें सुनकर वहांवाले इनके वैरी होगये यहांतक कि, वहांका हाकीम भी इनसे द्वेष करने लगा, लोग पत्थर मारने लगे । बादशाहने अपने मंत्रीसे भी कहा कि, तू भी पत्थर मार, उस समय वजीरने उत्तर दिया कि, यह तो मेरे गुरु हैं मैं इनपर पत्थर मारूँ ? यह कैसे हो सकता है, नौवाबने दरिया खांको खूब धमकाया कि, यदि तू पत्थर न मारेगा तो तुझे मंत्रीकी पदवीसे पृथक् कर दूंगा । नौवाबने बहुत धमकाया । उस समय दरियाखाने फूलकी एक पत्ती तोड़कर कमालजीपर चलाई । जब वह उनको लगी तो वे हा हा करके गिर