कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
शरणगतके नियम
नहीं हो सकता। वह वैष्णव वह दूध तथा संखिया सब कुछ पी गया और चङ्गन रहा। संखियाने उसको किसी प्रकारकी क्षति नहीं पहुँचाई। उसके भीतर भोगता विष्णु था विष्णु उसको देखता था और वह विष्णुको देखता था। आप उस भोगसे अलग रहा। मीराकी भी तो यही बात थी। यह है मूर्तिपूजाका महत्त्व। फिर जो मूर्तियोंको कंकड़ पत्थर कहते हैं यह उनकी भूल है।
तीसरे महात्यागी तब होता है जब देहके अभिमानको छोड़े। जबतक देह का अभिमान न छूटे तबतक त्यागी नहीं। अभिमानही करके यह देह मिलता है और इसीसे स्थित हो रहा है। सहस्रों त्यागी हो गये परंतु देहका अभिमान न छोड़नेसे बन्धनमें रहे। बाहरसे तो उन्होंने सब छोड़ दिया पर भीतरसे न छोड़ सके न देहका अभिमान छूटा, देहका अभिमान छूटा तो तब जाने कि, किसी प्रकारकी आपत्ति तथा सहसाकी घटना संघटित हो तब स्थिरता न छूटे न किसी प्रकारकी घबड़ाहट हो। सुतरां ऋषि मुनिगण उजाड़ बनमें बसते हैं वहां उनको प्रत्येक प्रकारकी आपत्तियाँ आ घेरती हैं। शोर, सोंप, भेड़िये, रीछ और कानखजूर इत्यादि नानाप्रकारकी आपत्तियाँ दिखाई देती हैं। इस स्थानपर साधु अपने मनको बहुतही दृढ़ रखते हैं। कोई हिंसक जीव फाड़कर खाजावे तनिक भी नहीं समझते कि, यह मेरी देह है सब तपस्वियोंकी ऐसीही अवस्था होती है। जब भीतरी अथवा बाहरी अपने शरीरकी ओर ध्यान हुआ तब तो उनका कुछ भी त्याग नहीं। सुतरां सर्व त्यागियोंमें बड़े त्यागी शुक्देवजी थे जो कि, मायाके भयसे बारह वर्षतक माताके गर्भमें रहे थे, जब बाहर निकले तो उनको त्याग और वैराग रहा। उनका हाल बहुत प्रसिद्ध है जब राजा जनकके समीप गये तब उन्होंने एक कौतुक दिखाया कि, उनके समस्त नगरमें आग लगी सब कुंछ जलने लगा। राजा। जनक निभंय बैठे रहे और शुक्देवजी अपनी तूँबी लंगोटी लेने दौड़े। राजाने कहा कि बैठ किधर जाता है तू तो आपको बड़ा त्यागी समझता है अब लंगोटी और तूँबी लेने दौड़ा? मेरे राज्यका समस्त सामान जल रहा है मैं तनिक भी अधीर नहीं हुआ। तू कौनसा त्यागी है तुझे तो लंगोटी और तूँबीकी चिन्ता लगी हुई है। जिसकी तूँबी लंगोटीकी चिन्ता नहीं छूटी उसका देहका अभिमान कैसे छूट जायगा? अतः जबतक देहका अभिमान न छूटे, तबतक महात्यागी कैसे हुआ? यह सब प्रशंसा तथा गुण कबीर साहबहीके हैं दूसरेके नहीं हो सकते हैं। बनारस में कैसे कैसे कष्ट मिले परन्तु उनका तनिकभी ध्यान नहीं किया, न मनमें ही कुछ माना। महात्याग इसीका नाम है। सहस्रों साधु सन्तोंने अपनेको ईश्वरमें लीन कर दिया तो भी उनके मनमें देहका अभिमान और वासना रही ही, इस
कारण उनका भगवान्में लीन होना भी काममें न आया । जो लोग सत्यगुरुको पहचानकर भगवत्में लीन होते हैं वे धन्य हैं, उन्हींका भगवत्में लीन होना सफल है ।
वेद तीन भागोंमें विभक्त हुआ—कर्म, उपसाना, ज्ञान । कर्मोंमें दो भाग हुये—एक तो यज्ञ इत्यादि जो सांसारिक अर्थोंके लिये करते हैं, दूसरा योग जो अपनी मुक्तिके लिये करते हैं । इन कर्मोंद्वारा सांसारिक तथा पारलौकिक अभिप्राय सिद्ध होते हैं । जिसके जैसे पाप पुण्य होते हैं वैसेही अवस्थामें वे जाते हैं वैसेही उनका भोग मिलता है ।
दूसरी उपासना है । सांसारिक लोग उपासना करते हैं और उपासनाके निमित्त विष्णु, राम, कृष्ण, शिव, चण्डी, सूर्य और गणेश आदि देवता ठहराये गये हैं ।
तीसरा ज्ञान काण्ड है । उसमें जीव परमात्मा और सत्य पुरुषका विचार है, इसकी सात भूमिका हैं । ये समस्त कर्मकाण्डी उपासक और ज्ञानी अपनी अपनी सीमाको पहुँच जाते हैं ।
मीमांसक और जैन कर्महीसे मुक्ति समझते हैं परन्तु यह नहीं जानते कि, यह कर्म कहाँसे उत्पन्न हुआ कहाँतक पहुँच सकता है । यह विधि निषेद दोनों शाखा निरञ्जननिमित्त हैं । वहाँही तक पहुँचानेकी सामर्थ्य रखते हैं । इन कर्मों द्वारा स्वर्ग तथा नरक सब कुछ प्राप्त होता है । जहाँतक कर्मोंकी पहुँच है वहींतक कालपुरुष हस्तक्षेप करता है । कर्मोंका सुविशाल बन है उसमें यह जीव भूलकर अपने घरसे बाहर हो गया है । यह बन हिंसक जन्तुओंसे भरा हुआ है, सूर्य चन्द्र सितारे इत्यादि तनिक भी दिखाई नहीं देते । न कोई सड़क और न पगडण्डी है, जो पगडण्डी कहीं है सो पशुओंकी है मनुष्योंकी नहीं हो सकती । इस कारण इन कर्मोंके बनसे कोई बाहर हो नहीं सकता । कर्म करता है फिर २ कर्म करनेके लिये देह धारण करता है । इसको कुछ पता नहीं लगता कि, वह कौन कर्म है जिससे मेरे कर्मोंका बन्धन कटे । वह कर्म जिससे इसका बन्धन कटे केवल स्वसंवेदकी शिक्षा ही है । उससे तो यह जीव अज्ञान है । इन्हीं लौकिक कर्मोंसे सारी योनि ठहराई गई हैं ।
जैनी जिनका कि समस्त ध्यान कर्मोंपर है वे आठ प्रकारके कर्म कहते हैं वे कबीर सागर नं. ९ जैन धर्म बोधसे लिखे जाते हैं : १—ज्ञानावर्णी कर्म । २—दर्शनावर्णी कर्म । ३—वेदनी कर्म । ४—मोहिनी कर्म । ५—नाम कर्म । ६—आयु कर्म । ७—गौत कर्म । ८—अन्तराय कर्म । अब इन आठों कर्मों
का सुविस्तृत विवरण सुनो। आवरण नाम ढक्कनका है। १-ज्ञानावर्णी कर्म अर्थात्ज्ञानका ढाकेनवाला कर्म। इसके कारण ज्ञान नहीं होने पाता। यह ज्ञानके ऊपर परदा डाल देता है।
ज्ञान पाँच प्रकारका है। १-मतिज्ञान। २-श्रुति ज्ञान। ३-अवधि ज्ञान। ४-मनपरजय ज्ञान। ५-केवल ज्ञान। मति ज्ञान-बुद्धिका है। अर्थात् वह ज्ञान जो बुद्धि तथा सोचसे सम्बन्ध रखता है, इस मति ज्ञानमें समस्त संसारके हुनर तथा कारीगरियों आगई हैं। जिसको मतिज्ञान होता है वह कारीगरी और शिल्पकारीमें बड़ा चैतन्य रहता है। जिस किसीका मतिज्ञान आवर्णी कर्म उगता है, उसको गुणोंका पाण्डित्य प्राप्त नहीं होता। दूसरा श्रुति ज्ञान है, श्रुतिज्ञान समस्त शास्त्रोंके कण्ठस्थ करनेको कहते हैं। कुछ कागज तथा ग्रन्थ इत्यादि देखने की आवश्यकता न हो। सब बातें हृदयमें रहें। शास्त्रद्वारा तीनों कालोंकी बातों को जानता हो उसको श्रुति केवली अथवा श्रुतिज्ञानी कहते हैं। इस श्रुतिज्ञानको जो कर्म रोकले और न होने दे उसका श्रुतिज्ञान आवर्णी कर्मनाम होता है। तीसरा अवधिज्ञान है अवधिज्ञान उसको कहते हैं जिसके द्वारा लोग मनुष्योंके मनकी बातको जान लेते हैं। समस्त गुप्त बातोंको बतलात हैं और अस्तयर्मी कहलाते हैं। जो कर्म इस अवधिज्ञानपर परदा डाले और न होने दे उसको अवधि-ज्ञानावर्णी कहते हैं। चौथा मनप्रजय ज्ञान-मनप्रजय ज्ञान उसको कहते हैं कि, जो हृदयकी गतिको जाने। अर्थात् जहां हृदय दौड़े वह सब कुछ मालूम कर ले। हृदयकी समस्त चाल तथा स्थिरताको बूझले। जो कोई इस प्रकारकी विद्या रखता हो उसको मनप्रजय ज्ञानी जानते हैं। मनप्रजयज्ञानमें यह गुण है कि, जब जिसको यह ज्ञान उत्पन्न हो जाता है वो कभी नहीं जाता। मनप्रजय ज्ञानी अवश्य ही केवल ज्ञानका अधिकारी हो जाता है। पूर्वके तीन ज्ञानोंमें तो सन्देह रहता है क्योंकि वे होते हैं और जाते भी रहते हैं परन्तु मनप्रजयको स्थिरता तथा स्थिति है। मनप्रजयज्ञान अवधिज्ञानसे बहुत बढ़के है। जो कर्म इस मनप्रजय ज्ञानको छिपा लेता है और नहीं होन देता उसको मनप्रजय आवर्णी कर्म कहते हैं। पांचवीं केवल ज्ञान है? यह सबसे बढ़कर है। यह समस्त ज्ञानोंका राजा है, जैनी ऐसा मानते हैं कि, इस केवल ज्ञानसे कोई बात छिपी नहीं रहती। सबसे उच्चक्षेणी यही है। जैनके चौबीस तीर्थंकर सब केवल ज्ञानी हुए हैं। उनके अतिरिक्त और कितने दूसरे साधू भी केवल ज्ञान रखते हैं। इस केवल ज्ञानको जो छिपाये रखे और न प्रकाशित होनेदे उसका नाम केवल-ज्ञानावर्णी कर्म है। दूसरा दर्शनावर्णी कर्म है। जिसके कारण प्रत्यक्षमें दर्शन नहीं होता उसके परदेमें अलख