कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ब्रह्माजीकी कथा शिवजी महाराजकी कथा
भारतमें इनका एक तरहका अभावसाही होता जा रहा है। रही सही क्रियाको आज कालके नास्तिक मिटाये डालते हैं।
नरमेध ।
जो पुरुषमेध यजु० के ३१ और बत्तीसके अध्यायमें आता है जिससे सच्चिदानन्द सत्यपुरुषका, पूजनादि होता है। इस कारण इसे पुरुषमेध कहते हैं यानी पुरुष सत्यपुरुष, सच्चिदानन्द नारायण, उसका जो मेध यानी पूजन तथा ध्यानद्वारा संगम तथा उसके उद्देश्यसे इन दोनों अध्यायोंका वैध ध्यान इसे पुरुष मेध कहते हैं, इसीका पथ्ययिवाची शब्द नरमेध भी है। जिसका कि यहाँ . योग दीख रहा है, इसी तरह जहाँ जो मेध आया है वहाँ उसीमें उच्च भावना करके पूजन आदि कर दिया गया है। जो कोई इनका बलिदान अर्थ समझते हैं यह उनकी बुद्धिका दोष है।
देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपति भगाय ॥ दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतन्नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचिन्नः स्वदतु ॥ य० अ० ३० मंत्र १ ॥ हे दीप्यमान सबके प्रेरक परमात्मन् ! इस वाजपेय नामक यज्ञको प्रवृत्त करो। यजमानको ऐश्वर्य लाभके निमित्त वा भजनीय अनुष्ठानके निमित्त प्रेरणा करो, दीप्यमान अन्नके पवित्र करनेवाले रश्मियोंके धारण करनेवाले सूर्यमण्डलमें वर्तमान सच्चिदानन्द सत्यपुरुष नारायण, हमारे अन्नको पवित्र करें। वाक्यके अधिपति प्रजापति हमारे हवि लक्षणरूप अन्नका आस्वादन करें यह आहुति भलीप्रकार गृहीत हो ॥
अश्वमेध ।
ईड्यश्चासिवन्द्यश्चवाजिन्नाशुश्चासि मेध्यश्च सप्ते ॥ अग्निष्टवा देर्वंसुभिः संजोषाः प्रीतंर्वहि वहतु जात वेदाः ॥ य० अ० २९ म० ३ ॥ और हे वेगवाले अश्व ! तुम ऋत्वियों करके स्तुति करने योग्य हो तथा शिर करके नमस्कार करने योग्य हो, शीघ्रही अश्वमेध यज्ञके योग्य होते हो और वसु देवताओंके सहित प्रीतिवाला अग्नि, प्रसन्न हुए तुझ हविबहनेवालेको देवताओंमें प्राप्त करावे ॥
इस यजुर्वेदमें यज्ञोंकी बहुत बातें हैं ३- ११-१२ अध्यायके मन्त्रोंको देखो। यजुर्वेद है ही यज्ञोंके लिये ? ।
गोमेध ।
अ्यविश्चमे अ्यवीचमे दित्यवाट्चमे दित्यौहीचमे पञ्चविश्चमे पञ्चावीचमे त्रिवत्सश्च त्रिवत्साचमे तुर्यवाट्चमे तुर्यौहीचमे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥
य० अ० १८ मं० २६ ॥ और मेरी प्रीतिके निमित्त डेढ वर्षवाला बछड़ा तथा डेढ वर्षवाली बछिया मेरे निमित्त दो वर्षवाला बैल तथा दो वर्षवाली गौ और मेरे निमित्त ढाई वर्षवाला बैल तथा ढाई वर्षवाली गौर एवं मेरे निमित्त तीन वर्षवाला बैल तथा तीन वर्षवाली गौ कल्पना करें । षष्ठवाट्चमे षष्ठाह-
चिमऽउक्षाचमे वशाचमेऽऋषभश्चमे वेहश्चमेऽनङ्गवांश्चमे धेनुश्चमे यज्ञेन
कल्पन्ताम् ॥ य० अ० १८ मं० २७ ॥ और मेरे निमित्त चार वर्षवाला बैल
तथा चार वर्षवाली गौ, मेरे निमित्त सेचनसमर्थ बैल तथा वन्ध्या गौ, मेरे
निमित्त अतिजवान बैल तथा गर्भघातिनी गौ, मेरे शकट वहनेमें समर्थ बैल तथा
नवीन ब्याई हुई गौ, पूजन करके देवता कल्पना करें ॥
बारह मासके देवताओंके निमित्त भिन्न २ यज्ञ बनाये हैं उन समस्त पशुओं
को उनदेवोंकी प्यारी वस्तु समझकर पूजते हैं ताकि, हृदयमें दया बनी रहे ।
उष्ट्रमेध ।
इसमूर्णयिं वरुणस्य नाभि त्वचं पशूनां द्विपदां त्रतुष्पदाम् ॥ त्वष्ट्रः
प्रजानां प्रथमं जनित्रमग्ने माहिःॐसीः परमेव्योमन् । उष्ट्रमारण्यमनुते दिशामि
तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद ॥ उष्ट्रन्तेशुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं तेशुगृच्छतु ॥ य०
अ० १३ मं० ५० ॥ हे अग्ने ! उत्कृष्टस्थानमें स्थित इस ऊर्णवाला, वरुणकी
नाभि अर्थात् सन्तानोंके समान प्रिय मनुष्यों और चौपायों दोनों प्रकारके
पशुओंकी कंबलोंसे एवं आच्छादक होनेसे त्वचाकी तरह रक्षा करनेवाला
प्रजापतिकी प्रजाओंके मध्यमें प्रथममें उत्पन्न हुए अविको मत पीडा दो बनके
उष्ट्र तुमको उपदेश करता हूं शरीर उसके द्वारा पुष्ट करते हुए तुम यहाँ स्थित
हो तुम्हारी ज्वाला बनवाले ऊँटपूजनसे तुमें भूख प्राप्तहो, जिससे हम द्वेष
करें उसको तुम्हारी ज्वाला प्राप्त हो ॥ ५ ॥
मेषमेध ।
ऋग्वेदाष्टक (४- अध्याय-१) सूक्त (८) मंत्रमें लिखा है कि, तीन
सौ भैंसोंका बलिप्रदान हुआ ।
जीवोंके पूजन एवम् शाखा आदिके पूजनका जिन घृणित वेदोंमें उल्लेख
किया गया है वो एकात्मभावसे विस्तारपूर्वक है । उनके लिखनेसे अनावश्यक
विस्तार बढ़ता है । न मुझे बातकी कोई आवश्यकता है । मुक्ति पानेवालोंके देखने
के निमित्त तथा न्यायप्रिय मनुष्योंके हितार्थ थोड़ा सा आवश्यक विवरण इस
स्थानपर कर दिया गया है । वेदोंमें भाँति २ के पशु तथा पक्षी आदिके सत्कार
आत्मभावसे लिखे हुए हैं । उन सबको मैं छोड़े जाता हूं । केवल आवश्यक बातों